मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजाता है और दूसरे संयोग इसका स्थान ले लेते हैं। जो अनन्त है, वह है भूतकी गति । जब बाहरी गतिके कारण भूतके एक विशिष्ट संयोगका आविर्भाव होता है और गतिहीके कारण जबतक उसका अन्तर्धान नहीं होता, तबतक इसके अस्तित्वके प्रश्नको भावात्मकरूपसे ही हल किया जा सकता है । यही कारण है कि यदि कोई बुधग्रहको दिखाकर हमसे पूछे कि उसका अस्तित्व है या नहीं ? तो हम निःसंकोच यह उत्तर देंगे कि ‘हाँ’ है । इसका अर्थ यह है कि स्पष्ट वस्तुओंके सम्बन्धमें हम युवेरवेगके ही नियमका अनुसरण करेंगे । इस राज्यमें ‘हाँ’ ‘हाँ’ है और ‘नहीं’ ‘नहीं’ का ही संकेत लागू होता है । लेकिन इस नियमका राज्य अबाध नहीं है । जब कोई वस्तु उत्पत्तिकी अवस्थामें है तो उसका उत्तर देनेमें कुछ संकोच नहीं होता । जब किसी मनुष्यके सरके बाल काफी उड़े देखे जाते हैं, तो कहा जाता है कि वह गंजा है । लेकिन वह कब पूरा गंजा हो जायगा, ठीक उस मुहूर्त्तका निश्चय नहीं किया जा सकता । ‘किसी विशिष्ट प्रश्नका कि अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, ‘हाँ’ या ‘ना’ में ही उत्तर दिया जा सकता है । लेकिन जब कोई वस्तु परिवर्तनकी स्थितिमें है, किसी विशेष गुणका उसमें संयोग या वियोग हो रहा हो, तब इसका उत्तर दिया जा सकता है—‘हाँ’ ‘नहीं’ है तथा ‘नहीं’ है ‘हाँ’ । वेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता । यह एतराज किया जा सकता है कि जिस गुणका वियोग हो रहा है उसका अभी अन्तर्धान नहीं हुआ और जिस गुणका संयोग हो रहा है, अभी [L