मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै । साथ ही भाव, अभाव एक दूसरेके ऊपर निर्भर है—इसका दो अर्थ हो सकता है । एक तो यह कि अभाव किसी वस्तुका और किसी अधिकरणमे होता है, अर्थात् प्रतियोगिनिरूपक ( जिसका अभाव हो ) और दूसरा अनुयोगी, ( जैसे 'भूतले घटो नास्ति' 'भूतलमे घट नहीं है' ) । भूतलका तथा घटका ज्ञान हुए बिना घटाभावका ज्ञान नही हो सकता । अभाव अधिकरणस्वरूप है, इस दृष्टिसे अनुयोगिस्वरूप तो अभाव कहा जा सकता है, परंतु अभाव और प्रतियोगी भी कभी एक हो जाते हो, ऐसी बात नहीं है । इसके अतिरिक्त अभाव तो अवश्य ही अनुयोगी-प्रतियोगीकी अपेक्षा रखता है, परंतु भाव इस प्रकार अभावकी अपेक्षा नहीं रखता । निरुपाख्य असत्त्व इससे भी अधिक अव्यवहार्य है । चुम्बकके उत्तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव एवं बिजलीकी धनात्मक-ऋणात्मक दो धाराएँ परस्पर विरोधी होनेपर भी भावरूप हैं । उनका जुट सकना सम्भव है, परंतु इसी तरह भाव-अभाव, सत्-असत्का जुटना असम्भव है । उपर्युक्त विरोध सत्त्व, रज, तमके विरोध- जैसा है, जो कि विरोध होनेपर भी समन्वित होकर कार्यारम्भक होते हैं । इस प्रकार भाव-अभाव, सत्-असत्का समन्वय होकर कार्यारम्भकता सम्भव नही है । कहा जाता है कि 'प्रकृतिके दृश्यगत घटनाओके मूलमे भूतकी गति है । इसका विरोध स्पष्ट है । यदि कोई पूछे कि कोई गतिशील पदार्थ किसी विशेष समयपर किसी स्थानपर है या नही, तो युवेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता कि 'हाँ' 'हाँ' है और 'नहीं' 'नहीं' है । गतिशील पदार्थ एक बिन्दुपर है भी और नही भी है । इसका विचार इसी संकेतसे किया जा सकता है कि 'हाँ' 'नहीं' है और 'नहीं' 'हाँ' । गतिशील पदार्थ 'विरोधके तर्क' की अकाट्य दलील है और जो इस तर्कको नहीं मानता, उसको जैनोके साथ कहना पड़ेगा कि गति इन्द्रियोका भ्रममात्र है । जो ऐसा नहीं मानते उन्हे या तो युवेरवेगके तर्कशास्त्रके बुनियादी नियमको मानकर गतिका त्याग करना पड़ेगा अथवा गतिको मानकर इस बुनियादी नियमका परिहार करना होगा ।' पहले ही कहा जा चुका है कि प्रकृतिकी दृश्यगत घटनाओकी बुनियादी बात है भूतकी गति । लेकिन गति एक विरोध है । इसका विचार द्वन्द्वमानके नियमसे किया जाना चाहिये अर्थात् इस संकेतसे कि 'हाँ' नहीं है और 'नहीं' 'हाँ' है । इसलिये यह मानना पड़ेगा कि दृश्यगत घटनाओके सम्बन्धमे हम विरोधी तर्कके राज्यमे हैं । लेकिन गतिशील भूतके अणुओके संयोगसे वस्तुओकी सृष्टि होती है । यह संयोग कम या अधिक क्षणस्थायी होकर तिरोहित हो