भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 820

मार्क्स-दर्शन [५०७]

उत्पत्तिके लिये पूर्वकायका तिरोधान आवश्यक होता है। इसीलिये बीजावस्थाका तिरोभाव नान्तरीयक रूपसे होता है। अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका उदाहरण भी ऐसा ही है। जैसे आम्रादि बीजसे आम्रादि वृक्षकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही मनुष्य, पशु आदि बीजोसे ही मनुष्य, पशु आदि देहोंकी उत्पत्ति होती है। अवयव- परिवर्तनादिद्वारा गोलाङ्गूल, मनुष्य आदिके विकासकी कल्पना सर्वथा अप्रमाणित है। उसमें मुख्य आपत्ति यह है कि उन-उन प्राणियोंकी परम्परा स्वतन्त्ररूपसे आज भी प्रचलित है, आज वैसा कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता। न तो पूँछ घिसनेसे आज कोई मनुष्य बनता है और न मनुष्यसे आगे कोई विकसित वर्ण दिखायी देता है। न कोई मनुष्यका अङ्ग बढ़ रहा है और न कोई घट रहा है। यों परिणामवादमें कार्याके रूपमें भिन्नता और कारणात्मना अभिन्नताका सिद्धान्त मान्य है ही। इसका तत्त्व भेदाभेद-विवेचनमें आ चुका है। हीगेलके दृष्टान्तोंसे भाव-अभाव, सत्-असत्का विरोध मिट नहीं सकता। जमा-उधार, लेना-देना, ऋण-धन, पूर्व-पश्चिम आदिमें भाव, अभावकी अपेक्षा बुद्धिजन्य कल्पनामात्र है। उनकी सम्पत्ति या रास्तेके एक स्थानमें ऋण-धन ओर पूर्व-पश्चिमकी एकता हो सकती है, परंतु क्या इसी तरह उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्धसे, उसी रूपमें, उसी घटका भाव और उसीका अभाव साथ-साथ रह सकता है? क्या इसी तरह मित्रापुत्र और वन्ध्यातनयका सह अस्तित्व हो सकता है? वस्तुस्थिति यह है—'क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वा- नधिकरणत्व' ही असत् है। अर्थात् जो किसी भी उपाधि या अधिकरणमें सत्त्वेन प्रतीत न हो वही असत् है। जो प्रातिभासिक रजतादि कहीं शुक्तिकादिमें सत्त्वेन प्रतीत होता है, वह शुक्ति रजतादि प्रातिभासिक सत् है। कारण ब्रह्ममें सत्त्वेन प्रतीत आकाशादि व्यावहारिक सत् है और अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाशरूपसे भासमान सत् पारमार्थिक सत् है। ऐसे सत्-असत्की भी यदि एकता हो सकती है, तब संसारमें विरोध क्या है। फिर शोषक शोषित-वर्गोंका ही अमिट विरोध क्यों? उनमें तो एकता स्पष्ट ही है। दूसरोंके भक्षक जंगली जानवर या पानीकी मछली आदि स्वयं ही दूसरोंद्वारा भक्षित होते हैं, फिर यहाँ तो एक स्थानमें ही शोषकत्व, शोषितत्व स्पष्ट है। वस्तुतः सत्-असत्का भेद अपेक्षाबुद्धिजन्य कल्पनामात्र नहीं है। हाँ, जहाँ भावान्तर ही अभाव है, वहाँ विरोधकी चर्चा व्यर्थ है। पटाभाव घट स्वरूप है, अतः घटका, पटाभावका कोई विरोध नहीं है, एतावता घटाभावका भी घटके साथ विरोध नहीं है, यह कहना उपहासास्पद ही

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन) · पृष्ठ 820, कुल 866 में से · BharatKosha