मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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रहता है । यद्यपि भेद-अभेद दोनो असमानता तथा समानताके ही बोधक हैं, भिन्नता अर्थात् भिन्नजातीयता अभिन्नता अर्थात् अभिन्नजातीयता । परंतु इस समानजातीयता, असमानजातीयताका भेदाभेदके समान परस्पर विरोध नहीं होता, क्योकि कमल व्यापक है । नील कमल उसका ही अवान्तर भेद है, जैसे मनुष्यजातिके भीतर ब्राह्मणत्व आदि जातियाँ हैं । एक ब्राह्मणमें ब्राह्मणत्व भी है, मनुष्यत्व भी । इनका आपसमें कोई विरोध नही होता । यह भावात्मक-अभावात्मक वस्तुओका एकीकरण नहीं कहा जा सकता । इतनेमात्रके लिये इतनी दूर भटकनेकी आवश्यकता नही । यो तो सहयोगी वस्तुओमे भी भावात्मकता, अभावात्मकताका सह अस्तित्व किसी अपेक्षा-भेदसे मिलता ही है । यह विरोध परिहार स्वमनःपरिकल्पित ही है । जैसे कोई अपने मनसे ही प्रेतकी कल्पना करके उससे संग्राम करता हो और कहता हो कि हमने अपने प्रतिद्वन्द्वीको हरा दिया, ठीक यह भी वैसा ही है । भाव, अभाव एव अभावका अभाव या वाद, प्रतिवाद, समन्वितवाद अथवा अविभक्त एक तथा उसका भावात्मक, अभावात्मक विभाजन, फिर विभक्त स्वरूपोसे एक वस्तुकी स्थापना आदि कल्पना मनोरञ्जक अवश्य है, पर है सारशून्य ही । यह केवल बौद्धोंके विनाश ( अभाव ) कारणवादके आधारपर गढी गयी है । बौद्धोने देखा कि बीजसे अङ्कुर उत्पन्न होनेमें बीजका स्वरूप नष्ट हो जाता है; अतः अङ्कुरोत्पत्तिके अव्यवहितपूर्व क्षणवर्ती विनाश ही है; अतः विनाशहीको कारण मानना ठीक है । परंतु साख्यो और वेदान्तियोने उसका खण्डन किया है । यदि विनाश ही कारण है तो बीजदाहसे भी अङ्कुर उत्पन्न होना चाहिये । यदि अभाव ही कारण है तो वह तो सर्वत्र सुलभ है तो फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारण-सामग्री ढूँढनेकी प्रवृत्ति क्यों होती है ! फिर कार्यमें कारणांश सत्की अनुवृत्ति देखी जाती है । विनाश, अभाव या असत्की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती । अतः भाव ही कार्यका कारण है, अभाव नहीं । इस मण्डन एवं खण्डनसे प्रभावित होकर मार्क्सवादियोने मूलबीजको अविभाजित एक वस्तु मान पुनः उसका विभाजन मानकर भाव, अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अङ्कुरकी उत्पत्ति मान ली । परंतु वस्तुतः यहाँ भाव-अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही नहीं उठता ! विनाश, अभाव या असत्से न कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है, न सत्-असत्का कोई सम्बन्ध हो सकता है । न ख-पुष्प, वन्ध्यापुत्रसे किसीकी उत्पत्ति हो सकती है, न किसीसे उनका कोई सम्बन्ध ही हो सकता है । बीजावयव ही अङ्कुरके कारण हैं और उन्हींका कार्यमें अनुवेध भी रहता है । परंतु एक उपादानमे कार्यान्तरकी