भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स-दर्शन ५०५ तन्तुओमे पटका आरम्भ होता है, जो पहले असत् ही रहता है। इसका असत्- कार्यवादकी दृष्टिसे खण्डन हो जाता है। असत् खपुष्प सहस्रों प्रयत्नोंसे निर्मित नहीं होता । अतः सत् ही कार्यकी अभिव्यक्ति मात्र कारकव्यापारोंसे होती है। इस स्थितिमें आरम्भके पहले, आरम्भकालमें तथा कार्य सम्पन्न होनेपर—इन तीनो अवस्थाओमे भी कारणरूपसे कार्य सत् ही रहता है। अतः स्वेन रूपेण आरम्भ या आरब्ध वस्तु सत् ही है, 'हाँ' हाँ ही है, उसे 'नहीं' नहीं कहा जा सकता । इसलिये आरम्भको अस्तित्व नास्तित्वकी एकता नहीं कहा जा सकता । राम-श्याम नामका कोई मनुष्य भी हो सकता है । कोई भी मनुष्य अपनेमें असाधारणता भी रखता है और इतर साधारणता भी है । विशिष्ट रूपसे इतर भिन्नता और तदितर व्यापक सामान्य रूपसे अभिन्नता कहनेकी अपेक्षा यह कहना अधिक सङ्गत है कि अमुक मनुष्यमें कुछ अपने असाधारण गुण हैं और कुछ मनुष्य-सामान्य-गुण । एक मनुष्य कुछ गुणोंकी अविशेषतासे ही इतर मनुष्योंसे भिन्न नहीं है। मनुष्यत्व सामान्य रहनेपर भी व्यक्तियोंमें परस्पर भिन्नता रहती है, अतः यह अस्तित्व-नास्तित्वकी एकताका उदाहरण नहीं कहा जा सकता । इस उदाहरणसे अस्तित्व-नास्तित्वकी एकाधिकरणता और विरोधपरिहार नहीं कहा जा सकता । विरोधका स्वरूप यही होता है कि— यस्य यद्देशावच्छिन्नयत्कालावच्छिन्नयत्सम्बन्धावच्छिन्नयद्धर्मावच्छिन्न- यदधिकरणता यत्र, तत्र तस्य तद्देशावच्छिन्नतत्कालावच्छिन्नतत्सम्बन्धावच्छिन्न- तद्धर्मावच्छिन्नतदत्यन्ताभावो न सम्भवति । जिस वस्तुका जिस देशमें, जिस कालमें, जिस सम्बन्धसे, जिस धर्मसे, जिस रूपसे जहाँ भाव रहता है, उस वस्तुका उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्ध- से, उसी रूपसे अभाव नहीं कहा जा सकता । पर्वतमें धूमत्वेन धूम रहनेपर भी वह्नित्वेन धूम नहीं है, तो भी यह अभाव अग्निके अनुमानमें बाधक नहीं हो सकता । विशेष गुणोंके कारण विशिष्टकी सामान्यसे भिन्नताका अर्थ विलक्षणता- मात्र है। इससे एक वस्तुमें सालक्षण्य-वैलक्षण्यका सह अस्तित्व सिद्ध होता है। नैयायिकोंके मतानुसार साधर्म्य-वैधर्म्य अनेक पदार्थोंमें सहावस्थित होते हैं, परंतु एतावता मूल वस्तुमें भेद नहीं सिद्ध होता । जैसे प्रसारित पट और संकुचित पटमें वैलक्षण्य प्रतीत होनेपर भी वस्तुमे भेद नही सिद्ध होता । व्यावर्तक भेदक धर्मसे वस्तुकी भिन्नता या व्यावृत्ति होती है। इसका अभिप्राय यही है कि—'नील- मुत्पलम्' नीलता कमलकी विशेषता है, इससे वह अनील श्वेत, अरुण आदि कमलोसे भिन्न सिद्ध होता है। नीलताको छोड़कर वह अन्य कमलोसे अभिन्न ही