मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 817, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहना । भावात्मकरूपसे वही वस्तु एक है और अभावात्मकरूपसे अन्य । इस प्रकार विचारमें एक वस्तुको दूसरेसे पृथक् करना हाँ और ना दोनो करना है और इसमें विरोध और पुनर्मिलन दोनो है । समरूपता और पार्थक्य-दोनोका रहना आवश्यक है, नहीं तो एकको दूसरेसे पृथक् नहीं किया जा सकता । "यही तत्त्व है सत् और असत्के एकत्वका । हेगेलकी इस तार्किक प्रथाका रूप है वाद ( थिसिस ), प्रतिवाद ( एन्टीथिसिस ) और समन्वितवाद ( सिन्थिसिस ) । दूसरे शब्दोंमें भाव-अभाव, अभावका अभाव या प्रतिषेधका प्रतिषेध । इस त्रिगुट सम्बन्धकी विशेषता यह है कि ये एक साथ विराजमान रहते हैं । एकके बाद दूसरेका आविर्भाव नहीं होता । जब कहा जाता है कि 'राम मनुष्य है' तो राम और अरामका विरोध तथा उसका साथ-साथ इन सबकी कल्पना एक साथ हो जाती है । मनमें तर्ककी जो क्रिया होती है, उसमें इन दोनोके पृथक्करणका पहले एक सिरा, फिर दूसरा सिरा और फिर दोनोका सम्बन्धित अस्तित्व दीखता है । लेकिन वास्तवमें इस त्रिगुट सम्बन्धका अस्तित्व आरम्भसे ही है और तर्कक्रिया इस अस्तित्वको मान लेती है । हेगेलने लिखा है कि इस त्रिगुट क्रियाको हम चतुष्क्रियाके रूपमें भी देख सकते हैं । पहला है अविभाजित एक, दूसरा विभाजन, तीसरा भावात्मक तथा अभावात्मक, फिर विभाजितरूपमे उस एककी पुनः स्थापना । जीवन संघर्षमें अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका प्रदर्शन अवयवके विकासका मुख्य स्तम्भ है ।' विरोधियोंके एकत्वके नियमको हेगेलने इस भाषामें लिखा है—'यह समझा जाता है कि भाव और अभावका अन्तर अमिट है । लेकिन तहमें ये दोनो चीजें एक हैं । कोई एक नाम दूसरेमें परिवर्तित हो सकता है । इस प्रकार जमा और उधार सम्पत्तिके दो विशेष प्रकार नहीं हैं । कर्ज लेनेवालेके लिये जो अभाव है, देनेवालेके लिये वह भाव है । पूरवका रास्ता पश्चिमका भी रास्ता है। भाव और अभाव एक दूसरेके ऊपर निर्भर है और परस्पर सम्बन्धमें ही इनका रूप प्रकाशित है । चुम्बक पत्थरका उत्तरी ध्रुव बिना दक्षिणी ध्रुवके नहीं रह सकता । किसी चुम्बकको दो भागोंमें काटनेपर एक हिस्सेमें उत्तरी और दूसरेमें दक्षिणी ध्रुव नहीं रहता । इसी प्रकार बिजलीकी दो धाराएँ-धनात्मक और ऋणात्मक, एक दूसरेसे स्वतन्त्र नही होतीं ।' वस्तुतः उपर्युक्त बाते भी वागाडम्बरके अतिरिक्त कुछ नहीं हैं—यह पीछे कहा जा चुका है । किसी अपेक्षासे भावान्तर ही अभाव होता है । स्वरूपसे कोई भी वस्तु सत् है, किंतु वही अन्य रूपसे असत् है परंतु स्वरूपसे ही कोई वस्तु सत्-असत् नहीं हो सकती । परमाणुवादियोकी दृष्टिसे समवायी कारण