भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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तरह सत्त्व, रज, तमका भी परस्पर विरोध कहा जा सकता है । सत्त्व प्रकाशात्मक है, रज चल है, तम आवरणात्मक एव अवष्टम्भात्मक है । व्यवहारमें भी सत्त्वके बढनेपर रज-तमका घटना अनिवार्य है । रजके बढनेपर अन्यका घटना अनिवार्य है, तो भी महदादि कार्यकी उत्पत्तिमें दोनों सहयोगी बनते हैं । अवश्य ही जबतक उनका सम परिणाम चलता रहता है, तबतक वे कोई कार्य नहीं आरम्भ कर सकते, परन्तु विषमता होनेपर प्रधानके अप्रधान सहयोगी हो जाते हैं, फिर कार्यका उत्पादन करते हैं और हर एक कार्यमें वे उपलब्ध भी होते हैं । यही चीज हर एक उपादानकारणके सम्बन्धमें कही जा सकती है। अगर आक्सीजन, हाइड्रोजन जलके कारण हैं, तो अवश्य ही उनमें सयोग अपेक्षित है । इसी तरह कार्यावस्थामें भी उनका अस्तित्व रहना ही चाहिये । और कार्य भी कारणसे भिन्न होकर सर्वथा नयी वस्तु नहीं है । जैसे पटकी ही अवस्थाविशेष, उनका सकोच और प्रसार है, वैसे ही कारणकी अवस्थाविशेष ही कार्य है । इसीलिये जलसे पुनरपि हाइड्रोजन, आक्सीजन निकल आनेपर जल कुछ भी नहीं रह जाता है । भाव-अभावके समान उद्जन, अम्लजनकका विरोध नहीं होता । अतएव उनका सम्बन्ध होता है, सम्बन्धसे जल बनता है, किंतु भाव-अभावके सम्बन्धसे, सत्-असत्के सम्बन्धसे किसी कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती । इसी तरह कहा जाता है कि 'तर्कशास्त्रके अनुसार आरम्भ क्या है ? यह कुछ ( अस्तित्व ) नहीं है, क्योंकि आरम्भमात्र है । लेकिन इसी कारणसे वह कुछ नहीं भी नहीं हो सकता । इस प्रकार आरम्भ न अस्तित्व है, न नास्तित्व है । साथ ही वह अस्तित्व, नास्तित्व—दोनों ही है । यही अस्तित्व-नास्तित्वकी एकता है । एकका दूसरेमें रूपान्तर है । संक्षेपमें यह होनेकी एक क्रिया है जिसमें अस्तित्व और नास्तित्वकी साधारण बुनियाद है । इस तर्कको वास्तविकताके रूपमें देखा जाय तो श्याम एक मनुष्य है । जो एक मनुष्य-श्रेणीका है जिसमें सब मनुष्य सम्मिलित हैं । श्यामका और अन्य मनुष्योंमें व्यावर्तक धर्मोंसे भेद होता है, जो कि एकमें होते हैं, दूसरेमें नहीं । इस तरह वे विशिष्ट अंगोंमें भिन्न होते हुए भी मनुष्यत्वेन समान हैं । उन चीजोंको देकर जो उनमें नहीं हैं, किंतु दूसरोंमें हैं । लेकिन इस प्रभेदका अर्थ यही है कि अपने विशिष्ट गुणोंके अलावा वह और मनुष्योंके समान है । इस प्रकार तार्किक दृष्टिसे श्यामका पूरा ज्ञान हो जाता है । जब उसकी कल्पना विशिष्ट 'श्याम' तथा सर्वसाधारण मनुष्योंके एकत्वके रूपमें की जाय ।' मार्क्सवादी इसे एक सहज और महान् सत्य कहते हैं । विशुद्ध सत् विशुद्ध असत्से अभिन्न है । विशेष गुणोंके द्वारा ही एक वस्तुको दूसरीसे अलग किया जा सकता है और इस अलग करनेका अर्थ ही है दो बातोंका एक साथ

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