मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
५०६ मार्क्सवाद और रामराज्य
रहता है । यद्यपि भेद-अभेद दोनो असमानता तथा समानताके ही बोधक हैं, भिन्नता अर्थात् भिन्नजातीयता अभिन्नता अर्थात् अभिन्नजातीयता । परंतु इस समानजातीयता, असमानजातीयताका भेदाभेदके समान परस्पर विरोध नहीं होता, क्योकि कमल व्यापक है । नील कमल उसका ही अवान्तर भेद है, जैसे मनुष्यजातिके भीतर ब्राह्मणत्व आदि जातियाँ हैं । एक ब्राह्मणमें ब्राह्मणत्व भी है, मनुष्यत्व भी । इनका आपसमें कोई विरोध नही होता । यह भावात्मक-अभावात्मक वस्तुओका एकीकरण नहीं कहा जा सकता । इतनेमात्रके लिये इतनी दूर भटकनेकी आवश्यकता नही । यो तो सहयोगी वस्तुओमे भी भावात्मकता, अभावात्मकताका सह अस्तित्व किसी अपेक्षा-भेदसे मिलता ही है । यह विरोध परिहार स्वमनःपरिकल्पित ही है । जैसे कोई अपने मनसे ही प्रेतकी कल्पना करके उससे संग्राम करता हो और कहता हो कि हमने अपने प्रतिद्वन्द्वीको हरा दिया, ठीक यह भी वैसा ही है । भाव, अभाव एव अभावका अभाव या वाद, प्रतिवाद, समन्वितवाद अथवा अविभक्त एक तथा उसका भावात्मक, अभावात्मक विभाजन, फिर विभक्त स्वरूपोसे एक वस्तुकी स्थापना आदि कल्पना मनोरञ्जक अवश्य है, पर है सारशून्य ही । यह केवल बौद्धोंके विनाश ( अभाव ) कारणवादके आधारपर गढी गयी है । बौद्धोने देखा कि बीजसे अङ्कुर उत्पन्न होनेमें बीजका स्वरूप नष्ट हो जाता है; अतः अङ्कुरोत्पत्तिके अव्यवहितपूर्व क्षणवर्ती विनाश ही है; अतः विनाशहीको कारण मानना ठीक है । परंतु साख्यो और वेदान्तियोने उसका खण्डन किया है । यदि विनाश ही कारण है तो बीजदाहसे भी अङ्कुर उत्पन्न होना चाहिये । यदि अभाव ही कारण है तो वह तो सर्वत्र सुलभ है तो फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारण-सामग्री ढूँढनेकी प्रवृत्ति क्यों होती है ! फिर कार्यमें कारणांश सत्की अनुवृत्ति देखी जाती है । विनाश, अभाव या असत्की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती । अतः भाव ही कार्यका कारण है, अभाव नहीं । इस मण्डन एवं खण्डनसे प्रभावित होकर मार्क्सवादियोने मूलबीजको अविभाजित एक वस्तु मान पुनः उसका विभाजन मानकर भाव, अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अङ्कुरकी उत्पत्ति मान ली । परंतु वस्तुतः यहाँ भाव-अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही नहीं उठता ! विनाश, अभाव या असत्से न कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है, न सत्-असत्का कोई सम्बन्ध हो सकता है । न ख-पुष्प, वन्ध्यापुत्रसे किसीकी उत्पत्ति हो सकती है, न किसीसे उनका कोई सम्बन्ध ही हो सकता है । बीजावयव ही अङ्कुरके कारण हैं और उन्हींका कार्यमें अनुवेध भी रहता है । परंतु एक उपादानमे कार्यान्तरकी
मार्क्स-दर्शन [५०७]
उत्पत्तिके लिये पूर्वकायका तिरोधान आवश्यक होता है। इसीलिये बीजावस्थाका तिरोभाव नान्तरीयक रूपसे होता है। अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका उदाहरण भी ऐसा ही है। जैसे आम्रादि बीजसे आम्रादि वृक्षकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही मनुष्य, पशु आदि बीजोसे ही मनुष्य, पशु आदि देहोंकी उत्पत्ति होती है। अवयव- परिवर्तनादिद्वारा गोलाङ्गूल, मनुष्य आदिके विकासकी कल्पना सर्वथा अप्रमाणित है। उसमें मुख्य आपत्ति यह है कि उन-उन प्राणियोंकी परम्परा स्वतन्त्ररूपसे आज भी प्रचलित है, आज वैसा कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता। न तो पूँछ घिसनेसे आज कोई मनुष्य बनता है और न मनुष्यसे आगे कोई विकसित वर्ण दिखायी देता है। न कोई मनुष्यका अङ्ग बढ़ रहा है और न कोई घट रहा है। यों परिणामवादमें कार्याके रूपमें भिन्नता और कारणात्मना अभिन्नताका सिद्धान्त मान्य है ही। इसका तत्त्व भेदाभेद-विवेचनमें आ चुका है। हीगेलके दृष्टान्तोंसे भाव-अभाव, सत्-असत्का विरोध मिट नहीं सकता। जमा-उधार, लेना-देना, ऋण-धन, पूर्व-पश्चिम आदिमें भाव, अभावकी अपेक्षा बुद्धिजन्य कल्पनामात्र है। उनकी सम्पत्ति या रास्तेके एक स्थानमें ऋण-धन ओर पूर्व-पश्चिमकी एकता हो सकती है, परंतु क्या इसी तरह उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्धसे, उसी रूपमें, उसी घटका भाव और उसीका अभाव साथ-साथ रह सकता है? क्या इसी तरह मित्रापुत्र और वन्ध्यातनयका सह अस्तित्व हो सकता है? वस्तुस्थिति यह है—'क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वा- नधिकरणत्व' ही असत् है। अर्थात् जो किसी भी उपाधि या अधिकरणमें सत्त्वेन प्रतीत न हो वही असत् है। जो प्रातिभासिक रजतादि कहीं शुक्तिकादिमें सत्त्वेन प्रतीत होता है, वह शुक्ति रजतादि प्रातिभासिक सत् है। कारण ब्रह्ममें सत्त्वेन प्रतीत आकाशादि व्यावहारिक सत् है और अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाशरूपसे भासमान सत् पारमार्थिक सत् है। ऐसे सत्-असत्की भी यदि एकता हो सकती है, तब संसारमें विरोध क्या है। फिर शोषक शोषित-वर्गोंका ही अमिट विरोध क्यों? उनमें तो एकता स्पष्ट ही है। दूसरोंके भक्षक जंगली जानवर या पानीकी मछली आदि स्वयं ही दूसरोंद्वारा भक्षित होते हैं, फिर यहाँ तो एक स्थानमें ही शोषकत्व, शोषितत्व स्पष्ट है। वस्तुतः सत्-असत्का भेद अपेक्षाबुद्धिजन्य कल्पनामात्र नहीं है। हाँ, जहाँ भावान्तर ही अभाव है, वहाँ विरोधकी चर्चा व्यर्थ है। पटाभाव घट स्वरूप है, अतः घटका, पटाभावका कोई विरोध नहीं है, एतावता घटाभावका भी घटके साथ विरोध नहीं है, यह कहना उपहासास्पद ही
है । साथ ही भाव, अभाव एक दूसरेके ऊपर निर्भर है—इसका दो अर्थ हो सकता है । एक तो यह कि अभाव किसी वस्तुका और किसी अधिकरणमे होता है, अर्थात् प्रतियोगिनिरूपक ( जिसका अभाव हो ) और दूसरा अनुयोगी, ( जैसे 'भूतले घटो नास्ति' 'भूतलमे घट नहीं है' ) । भूतलका तथा घटका ज्ञान हुए बिना घटाभावका ज्ञान नही हो सकता । अभाव अधिकरणस्वरूप है, इस दृष्टिसे अनुयोगिस्वरूप तो अभाव कहा जा सकता है, परंतु अभाव और प्रतियोगी भी कभी एक हो जाते हो, ऐसी बात नहीं है । इसके अतिरिक्त अभाव तो अवश्य ही अनुयोगी-प्रतियोगीकी अपेक्षा रखता है, परंतु भाव इस प्रकार अभावकी अपेक्षा नहीं रखता । निरुपाख्य असत्त्व इससे भी अधिक अव्यवहार्य है । चुम्बकके उत्तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव एवं बिजलीकी धनात्मक-ऋणात्मक दो धाराएँ परस्पर विरोधी होनेपर भी भावरूप हैं । उनका जुट सकना सम्भव है, परंतु इसी तरह भाव-अभाव, सत्-असत्का जुटना असम्भव है । उपर्युक्त विरोध सत्त्व, रज, तमके विरोध- जैसा है, जो कि विरोध होनेपर भी समन्वित होकर कार्यारम्भक होते हैं । इस प्रकार भाव-अभाव, सत्-असत्का समन्वय होकर कार्यारम्भकता सम्भव नही है । कहा जाता है कि 'प्रकृतिके दृश्यगत घटनाओके मूलमे भूतकी गति है । इसका विरोध स्पष्ट है । यदि कोई पूछे कि कोई गतिशील पदार्थ किसी विशेष समयपर किसी स्थानपर है या नही, तो युवेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता कि 'हाँ' 'हाँ' है और 'नहीं' 'नहीं' है । गतिशील पदार्थ एक बिन्दुपर है भी और नही भी है । इसका विचार इसी संकेतसे किया जा सकता है कि 'हाँ' 'नहीं' है और 'नहीं' 'हाँ' । गतिशील पदार्थ 'विरोधके तर्क' की अकाट्य दलील है और जो इस तर्कको नहीं मानता, उसको जैनोके साथ कहना पड़ेगा कि गति इन्द्रियोका भ्रममात्र है । जो ऐसा नहीं मानते उन्हे या तो युवेरवेगके तर्कशास्त्रके बुनियादी नियमको मानकर गतिका त्याग करना पड़ेगा अथवा गतिको मानकर इस बुनियादी नियमका परिहार करना होगा ।' पहले ही कहा जा चुका है कि प्रकृतिकी दृश्यगत घटनाओकी बुनियादी बात है भूतकी गति । लेकिन गति एक विरोध है । इसका विचार द्वन्द्वमानके नियमसे किया जाना चाहिये अर्थात् इस संकेतसे कि 'हाँ' नहीं है और 'नहीं' 'हाँ' है । इसलिये यह मानना पड़ेगा कि दृश्यगत घटनाओके सम्बन्धमे हम विरोधी तर्कके राज्यमे हैं । लेकिन गतिशील भूतके अणुओके संयोगसे वस्तुओकी सृष्टि होती है । यह संयोग कम या अधिक क्षणस्थायी होकर तिरोहित हो
जाता है और दूसरे संयोग इसका स्थान ले लेते हैं। जो अनन्त है, वह है भूतकी गति । जब बाहरी गतिके कारण भूतके एक विशिष्ट संयोगका आविर्भाव होता है और गतिहीके कारण जबतक उसका अन्तर्धान नहीं होता, तबतक इसके अस्तित्वके प्रश्नको भावात्मकरूपसे ही हल किया जा सकता है । यही कारण है कि यदि कोई बुधग्रहको दिखाकर हमसे पूछे कि उसका अस्तित्व है या नहीं ? तो हम निःसंकोच यह उत्तर देंगे कि ‘हाँ’ है । इसका अर्थ यह है कि स्पष्ट वस्तुओंके सम्बन्धमें हम युवेरवेगके ही नियमका अनुसरण करेंगे । इस राज्यमें ‘हाँ’ ‘हाँ’ है और ‘नहीं’ ‘नहीं’ का ही संकेत लागू होता है । लेकिन इस नियमका राज्य अबाध नहीं है । जब कोई वस्तु उत्पत्तिकी अवस्थामें है तो उसका उत्तर देनेमें कुछ संकोच नहीं होता । जब किसी मनुष्यके सरके बाल काफी उड़े देखे जाते हैं, तो कहा जाता है कि वह गंजा है । लेकिन वह कब पूरा गंजा हो जायगा, ठीक उस मुहूर्त्तका निश्चय नहीं किया जा सकता । ‘किसी विशिष्ट प्रश्नका कि अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, ‘हाँ’ या ‘ना’ में ही उत्तर दिया जा सकता है । लेकिन जब कोई वस्तु परिवर्तनकी स्थितिमें है, किसी विशेष गुणका उसमें संयोग या वियोग हो रहा हो, तब इसका उत्तर दिया जा सकता है—‘हाँ’ ‘नहीं’ है तथा ‘नहीं’ है ‘हाँ’ । वेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता । यह एतराज किया जा सकता है कि जिस गुणका वियोग हो रहा है उसका अभी अन्तर्धान नहीं हुआ और जिस गुणका संयोग हो रहा है, अभी [L
५१० मार्क्सवाद और रामराज्य काल वड़ा सूक्ष्म होता है, अतः किसी स्थलपर समकालमे गतिशील पदार्थका अस्तित्व, नास्तित्व नही कहा जा सकता । उसी वस्तुको रूपान्तरसे भाव एव रूपान्तरसे अभाव कहना सम्भव है । परंतु उसी रूपसे भाव अभाव—दोनो कोटि-कोटि प्रयत्नोसे भी सम्भव नहीं हैं, तीव्रगामी बाण या तलवारसे समवेत सहस्र कमलपत्रका छेदन समकालमें ही प्रतीत होता है । पापड़ खाते समय समकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी प्रतीति समकालमे मालूम पडती है, फिर भी सर्वत्र क्रमिकता ही है। हाँ, क्रम इतना सूक्ष्म है कि परिलक्षित नहीं होता, फिर भी उसका अनुमान तो होता ही है । इस तरह अति तीव्रगतिमे, अतिसूक्ष्मकालमें अस्तित्व-नास्तित्वका क्रम भी बदल जाता है । इसीलिये अस्तित्व- नास्तित्व एकत्र स्थलमे क्रमिक ही रहता है; समकालिक नही । सामान्य गतिमान् पदार्थका जब विभिन्न स्थानीय अस्तित्व, नास्तित्व, भिन्नकालिक है, तो इसी तरह तीव्र गतिमान् पदार्थोंका भी एकत्र अस्तित्व, नास्तित्व भिन्नकालिक ही मानना उचित है । इस तरह उसे अकाट्य तर्क समझना भ्रम ही है । युवेरवेग हो या कोई और हो, यौक्तिक विचारमे जिसका पक्ष उचित हो ग्रहण करना चाहिये । अयुक्तियुक्त किसीका भी मत त्याज्य होना चाहिये । किसी भी नियमसे सत् असत्, असत् सत् नही हो सकता । द्वन्द्वमानकी बाजीगरी भी इस सम्बन्धमे व्यर्थ ही है । सिर्फ घटका स्वेन रूपेण अस्तित्व है, अन्यरूपेण नास्तित्व है । इसके सिवा अस्ति, नास्तिकी एकत्र अवस्थिति सर्वथा असम्भव है । गतिशील परमाणुओके संयोगसे दृश्य वस्तुओका निर्माण हो अथवा प्रतिक्षण परिणामी प्रकृति-तत्त्वका परिणामस्वरूप दृश्य वस्तु हो उसकी अस्थिरता निश्चित है । फिर भी वस्तुके भाव-अभावमे संदेह नही होना चाहिये । संदेह होता है स्थिरता एवं अस्थिरतामे । नदीप्रवाह एव दीपशिखामें स्थूलदृष्टिसे स्थिरता एव एकता प्रतीत होती है, किंतु वस्तुतः उनमे स्थिरता-एकता सादृश्यमूलक भ्रम ही है । गगन, पर्वत, समुद्र, नक्षत्रादि—सभीमे स्थिरता, एकता, प्रत्यभिज्ञा इसी प्रकार सादृश्यमूलक भ्रम ही है । फिर भी अविचारित रमणीय एकता आदिका व्यवहार चलता ही है । सदृश परिणाम जबतक चलता है, तबतक एकता विसदृश परिणाम होनेसे ही भिन्नता, अनेकताकी प्रतीति होने लगती है । सदृश-विसदृश किसी भी परिणाममे अस्तित्व तो रहता ही है, आविर्भाव, तिरोभावके आधारपर होने- वाले भाव-अभावके व्यवहारमे भी क्रम अनिवार्य है । समकालमे, समदेशमे, समसम्बन्धसे, समरूपसे एक ही वस्तुका भाव या अभाव नही रह सकता । यह पर्वतवत् अकम्प्य विरोध है, यह कहा जा चुका है । प्रमाणकी दृष्टिसे सब स्पष्ट ही होता है, अस्पष्ट नही । सिरके अधिकांश बालोंके उड़ जानेपर भी हम यही कह सकते हैं कि 'वह खल्वाट हो रहा है ।'
जिसे पूरे मुहूर्तका पता लगाना अभीष्ट है, उसे घडी लेकर त्राटक लगाकर बैठना ही पड़ेगा । जिसे गर्दभके बालोंकी जिज्ञासा है, उसे गिननेका श्रम करना ही पड़ेगा । जैसे अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, इस प्रश्नका उत्तर हाँ या नहींमें ही देना उचित है, वैसे ही परिवर्तनकी हालतमें भी निश्चित उत्तर दिया ही जा सकता है । सांख्यीय सत्कार्यवादके अनुसार छोटे-से वटबीजके अंदर वटवृक्षकी सत्ता है तभी उसका प्रादुर्भाव होता है । फिर भी जबतक उसका आविर्भाव नहीं है तबतक अभावका व्यवहार चलता है ओर जिस कालमें अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पल्लवादिकी अवस्था है उस कालमें स्पष्टतया उसी रूपमें उसका भाव, अन्य रूपमें अभाव कहनेमें कोई अडचन नहीं हो सकती । युवककी ठोढ़ीमें बालोंकी जो अवस्था है, उसी रूपमें उसका भाव अन्यरूपमें अभाव कहनेमें भी कोई अडचन नहीं । उसी भूतलपर देश-कालभेदसे, सम्बन्ध तथा रूपभेदसे, वटके भाव-अभावका व्यवहार होता ही है । वस्तुओं तथा उनके गुणके सम्बन्धमें यही स्पष्ट मत है । 'हाँ' नहीं है, 'नहीं' हाँ है, यह मत कभी भी स्पष्ट मत नहीं कहा जा सकता । कारणमें कार्यका अस्तित्व रहता है; इसलिये बीजमे भी अङ्कुर है । युवक क्या, शिशुकी भी ठोढीमे वालोका अस्तित्व है । जबतक आविर्भाव नहीं है तबतक अङ्कुरके तुल्य बालोका भी अभाव है । जितना प्रादुर्भाव है उतनेका भाव, जितनेका नहीं उतनेका अभाव है, इससे अधिक स्पष्टता क्या हो सकती है । एफीसियसका प्राचीन दार्शनिक कहता है कि 'सभी चीजे परिवर्तनशील हैं, सभी परिवर्तित हो रही हैं । जिन संयोगोंको हम वस्तु नाम देते हैं, वे सदा ही परिवर्तनकी स्थितिमें हैं।' जबतक ऐसे संयोगोंका अनुपात कायम रहता है, उनका विचार हम हाँ-हाँ ओर नहीं-नहींके संकेतसे कर सकतें हैं । लेकिन जिस समय उनमें ऐसा परिवर्तन होता है कि वह पहिला अनुपात नहीं रहता, तब उनका विचार विरोधके तर्कसे ही हो सकता है । हमें हाँ और ना दोनोंमें उत्तर देना पड़ेगा । वह है भी और नहीं भी है । 'जैसे स्थिरता गतिका एक विशिष्ट प्रकार है उसी तरह साधारण तर्कशास्त्र द्वन्द्वमान तर्कका एक विशेष प्रकार है।' प्लेटोके शिष्य क्रेटिलसके विषयमें कहा जाता है कि जब हेराक्लिट्सने कहा कि एक ही नदीमे हम दो बार प्रवेश नहीं कर सकते, तब उसने कहा कि एक बार भी हम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते, क्योंकि प्रवेश करते-करते उसमें परिवर्तन होता रहता है । वह एक दूसरी नदी हो जाती है । ऐसी रायमें होनेकी क्रियाको उसके अस्तित्वसे अधिक महत्त्व दिया जाता है । यह द्वन्द्वमानका अपव्यवहार है । हेगेलका कहना है कि 'कुछ' सर्वप्रथम 'प्रतिषेधका प्रतिषेध' है ।
द्वन्द्वमान और भौतिकवादका आपसमें कोई विरोध नहीं है । वास्तवमें द्वन्द्वमानकी बुनियाद ही भौतिकवाद है । यदि प्रकृतिकी भौतिकवादी धारणाका अन्त हो जाय तो साथ ही द्वन्द्वमानका भी अन्त हो जायगा । हीगेलकी प्रथा मे 'द्वन्द्वमान और अतिभौतिकवाद दोनो समानार्थसूचक हैं । मार्क्सय दर्शनमे द्वन्द्वमान प्राकृतिक सिद्धान्तके सहारे खड़ा है । हीगेलके अनुसार धारणाओमें जो विरोध है उनके आविष्कार और हलसे ही विचारधारा आगे बढती है । भौतिकवादी सिद्धान्तके अनुसार धारणाओमें अवस्थित विरोध उन विरोधोके प्रतिबिम्बमात्र हैं जो दृश्यगत जगत् वर्तमान हैं और जिनका मूल कारण प्रकृतिका अन्तर्विरोध यानी उसकी गति है ।' एफेशियसके प्राचीन दार्शनिककी दृष्टि भी इस सम्बन्धमें भ्रमात्मक ही है । सूक्ष्मकालभेदके अनुसार सूक्ष्मपरिवर्तित अवस्थाओका भी सुस्पष्ट अस्ति या नास्तिरूपसे निरूपण किया जा सकता है । अनिश्चित अवस्था सदा ही अज्ञानकी अवस्था है, प्राकृतिक एवं यान्त्रिक प्रत्यक्ष साधनो, अनुमानो या आर्षविज्ञानों अथवा अपौरुषेय आगमोके आधारपर उस अज्ञानको मिटाना ही उचित है । उभयतः आकर्षणकी स्थिरता एक गतिका प्रकार भले मान्य हो, परतु सब गतियो एवं गतिमानोकी अधिष्ठानभूत आत्मसत्ता गतिका प्रकारविशेष नहीं है । एकत्व-भ्रमके मूल कारण सादृश्य-ज्ञानके लिये 'तेनेदं सदृशम्' 'के ते नेदं सदृशम्' जाननेके लिये अनेककालावस्थायी द्रष्टाको स्वतः स्थिर मानना पड़ता है । इसीलिये सांख्योने सब पदार्थोंको क्षणपरिणामी मानते हुए भी चित्-शक्तिको कूटस्थ माना है— क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्तेः । व्यवहारमे गतिमान, पशुपक्ष्यादि जंगम तथा स्थावर भूमि पर्वतादि स्वतन्तरूपसे मान्य है । अतः गतिविशेष ही स्थिरता है, यह दृष्टान्त ही असङ्गत है । इस तरह सत्को असत्, असत्को सत् कहनेवाला द्वन्द्वमान कोई तर्क ही नही है । नदीके प्रथम प्रवेगकालमें ही नहीं, किंतु प्रतिक्षण भिन्नता क्रैटिलससे बहुत पहले भारतीय दर्शनोंने बता रखा है— नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च । कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥ यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः । तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः ॥ सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् । सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ( श्रीमद्भा० ११ । २२ । ४२—४४ )
निषेधका निषेध है अथवा घटध्वंसका ध्वंस है, वह ध्वंस" Wait, look at "निषेध": it looks like "निषेध" or "निषेध"? It's "निषेध"! Wait, look at "ध्वंस": it has "ध्वंस".
Let's read every line carefully from top to bottom:
Title: मार्क्स दर्शन Page number: ५१३
नित्य ही भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय अलक्ष्य वेगवाले कालद्वारा होना रहता है। सूक्ष्म होनेके कारण वह प्रतीत नहीं होता। दीपादि अग्नि-ज्वालाओं, सरिताओं, फलो तथा वनस्पतियों एवं सभी भूतोंका वय एव अवस्थाओंके (Wait, "फलो" has no bindi? In L3: "फलो तथा वनस्पतियों एवं सभी भूतोंका वय एव अवस्थाओंके" - "फलो", "एव" has no anusvara or has? Look: "वय एव अवस्थाओंके" - it's "वय एव" or "वय एवं"? It looks like "वय एव"). अनुसार क्षण-क्षणपर उत्पत्ति और प्रलय होता रहता है। क्षण-परिवर्तनशील होनेपर भी 'यह वही दीप है, यह वही जल है, यह वही पुत्रादि है', इस प्रकारकी (Note: single quotes around 'यह वही दीप है, यह वही जल है, यह वही पुत्रादि है') [L6
५१४ मार्क्सवाद और रामराज्य एक आकस्मिक बटोर है, जहाँ वे एक दूसरेसे विच्छिन्न तथा स्वतन्त्र हैं ।' इसके विपरीत द्वन्द्वमान इन वस्तुओ और दृश्यमान घटनाओको एक सूत्रमें बाँधता है जिसमें उनकी पारस्परिक निर्भरता प्रकाश पाती है । इसलिये द्वन्द्वमानके अनुसार किसी प्राकृतिक घटनाको स्वतन्त्ररूपसे, अपने बहिरावेष्टनसे अलगकर नहीं समझा जा सकता; क्योकि वे इन बहिरावेष्टनोसे सम्बन्धित हैं और अपनी पारिपार्श्विक अवस्थाद्वारा सीमित हैं । अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान यह मानता है कि प्रकृतिकी अवस्था स्थिर और गतिहीन नहीं है, बल्कि अविराम गति और परिवर्तनकी अवस्था है, अविराम नवीन और विकासकी अवस्था है जहाँ किसी-न-किसी चीजका उत्थान और विकास होता है और किसी-न-किसी चीजका ध्वंस और निर्माण । इसलिये द्वन्द्वमानके तरीकेकी यह माँग है कि दृश्यगत घटनाओका विचार न केवल उनके पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी पारस्परिक निर्भरताके दृष्टिकोणसे होना चाहिये, बल्कि उनकी गति, उनका परिवर्तन, विकास, आविर्भाव और अन्तर्धानकी दृष्टिसे भी होना चाहिये । द्वन्द्वमानका तरीका मुख्यरूपसे उसको महत्त्व नहीं देता जो उस मुहूर्तमें स्थायी और दृढ मालूम होता है, लेकिन जिसका अन्त होना आरम्भ हो गया हो, बल्कि उसको जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो, यद्यपि उस क्षणमें वह भंगुर ही मालूम पड़ रहा है, क्योकि द्वन्द्वमान उसीको अजेय मानता है जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो । एजिल्सके शब्दोमें सारी प्रकृति, छोटी-से-छोटी लेकर बड़ी-से-बड़ी चीज, एक बालूके कणसे सूर्यतक, प्रोटिस्टा ( प्राथमिक जीवित कोष ) से मनुष्यतक, लगातार आविर्भाव और तिरोधानकी अवस्थामें है, सदा परिवर्तनशील है और परिवर्तनकी अवस्थामें है इसलिये एजिल्सका कहना द्वन्द्वमान वस्तुओं और उनके मानसिक प्रतिबिम्बोको उनके पारस्परिक सम्बन्ध और संयोगमें उनकी गति, उनके उत्थान और अन्तर्धानमें देखता है । 'अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान विकासकी क्रियाको सामान्य वृद्धिके रूपमें, जहाँ परिमाणकी वृद्धि और ह्राससे गुणोंका परिवर्तन नहीं होता, नहीं देखता, बल्कि ऐसे विकासके रूपमें देखता है, जो नगण्य और अदृश्य परिवर्तनसे बुनियादी गुणोके परिवर्तनके रूपमें परिणत होता है । इस विकासमें गुणात्मक परिवर्तन धीरे-धीरे नहीं होता, बल्कि एकाएक और द्रुतगतिसे; जो एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदानका रूप लेता है । यह आकस्मिकरूपसे घटित नहीं होता, बल्कि क्रमवर्धमान परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम है । द्वन्द्वमानके तरीकेके लिये यह आवश्यक है कि इस विकासकी क्रियाको हम चक्रगतिके रूपमें न देखे, न इस रूपमें कि जो कुछ पहले घटित हो चुका है,
मार्क्स-दर्शन ५१९ उसकी सामान्य पुनरावृत्ति हो रही है, बल्कि एक अनुगति और ऊर्ध्वगतिके रूपमें, एक गुणात्मक अवस्थासे दूसरी नयी गुणात्मक अवस्थामें परिवर्तनके रूपमें, साधारणसे असाधारण, निम्नस्तरसे उच्चस्तरपर विकासके रूपमें देखना चाहिये।' अवश्य ही वस्तु-वैचित्र्य विचार-विस्तारमें उपयोगी है, फिर भी वस्तु बिना भी स्वप्नों, मनोरथोंमें विचार, विस्तार परिलक्षित होते हैं, परन्तु विचार बिना तो वस्तुका विकास असम्भव ही है। जैसे वैज्ञानिक यन्त्र, रासायनिक तत्त्वोंका विकास, विश्लेषण विचारप्रभूत हैं, वैसे ही प्राकृतिक, भौतिक गति या विकास भी ईश्वरीय विचारमूलक ही हैं। इसीलिये— 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छा० उ० ६।२।३) —इत्यादि वचनोंमें उपनिषदोंमें स्पष्टरूपसे कहा गया है कि स्वप्रकाश, सत्, चेतनने ही ईक्षणपूर्वक विश्व-निर्माण किया। द्वन्द्वमानके जादूसे जड-प्रकृति या जड- भूतोंमें स्वतः चन्द्र, सूर्य आदि निर्माणकी क्षमता नहीं सिद्ध होती। पशु- मनुष्य एवं उसके दिव्य मस्तिष्क आदि यदि केवल भूतोंका ही करिश्मा है, तो विविध यन्त्रोंके निर्माणके लिये भी चेतन मनुष्यकी अपेक्षा न होनी चाहिये । अध्यात्मवादमें प्रकृति, वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर नहीं है । यह कल्पना तो असमीक्ष्यकारी जड़में ही हो सकती है। अध्यात्मवादमें तो संसारके किसी पदार्थकी चेष्टा कर्मसापेक्ष ईश्वरके विचारसे ही होती है। किसी भद्दे पाश्चात्य अध्यात्मवादमें प्रकृतिको वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर कहा जा सकता है। मार्क्सवादका प्रकृति शब्द भी भ्रामक है, वस्तुतः वे सांख्योंकी प्रकृतितक पहुँच भी नहीं सके हैं। वे तो भूतों, परमाणुओं तथा उसके कतिपय विश्लेषणों- तक ही पहुँच सके हैं। अध्यात्मवादियोंकी दृष्टियोंमें आकाशसे भी सूक्ष्म शब्द तन्मात्रा और उससे भी सूक्ष्म अह, अहसे भी सूक्ष्म महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे भी सूक्ष्म प्रकृति है। इसका विस्तृत विवेचन अन्यत्र किया जा चुका है। प्रपञ्चकी विचित्रतासे सम्बन्धकी भी विचित्रता होती है, अतएव विच्छिन्न, अविच्छिन्न, स्वतन्त्र, अस्वतन्त्र —अनेक प्रकारके पदार्थ संसारमें होते हैं। प्रत्येक भोग्य पदार्थ भोक्तृसम्बद्ध होते हैं। प्रत्येक कार्य, कारणसम्बद्ध भी होते हैं। साथ ही अनेक पदार्थ परस्पर सम्बद्ध होते हैं, कई असम्बद्ध होते हैं। कई अनुकूल सम्बन्ध- वाले, कई प्रतिकूल सम्बन्धवाले होते हैं। भौतिकवादी सम्मत-प्रपञ्चकी अप्रामाणिक एक सूत्रबद्धताकी अपेक्षा ईश्वर, काल, कर्म तथा भोक्तामें उसकी सम्बद्धता कहीं श्रेष्ठ है। घटनाओंके सम्बन्धमें भी यही बात कही जा सकती है । संसारमें कितने ही पदार्थ उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, उनकी परम्परासे भी परस्पर सम्बन्ध नहीं होता, फिर प्रत्येक पदार्थको परस्पर निर्भर कैसे कहा जा सकता
५१६ मार्क्सवाद और रामराज्य है ? द्वन्द्वमात्रमें ही नहीं, किसी भी दर्शनमे किसी वस्तुको समझने, पहचाननेके लिये अपेक्षित अङ्गोपाङ्गका ज्ञान सम्पादित किया जाता है । किसी रोगको समझनेके लिये उसके निदान, आहार-विहार, देश-काल, साक्षात् या परम्परासे प्रभाव डालनेवाले पदार्थों तथा घटनाओपर विचार किया ही जाता है । इसी प्रकार सम्बन्धित सभी घटनाओके सम्बन्धमे विचार किया ही जाता है । प्रकृतिकी अविराम गति और प्राचीनका तिरोभाव, नवीनका आविर्भाव आदि कल्पनाएँ सांख्योकी ही हैं । इसी आविर्भाव-तिरोभावको निर्माण तथा ध्वंस कहा जा सकता है । अवश्य ही सांख्यके मतानुसार सत्का ही आविर्भाव-तिरोभाव होता है, अत्यन्त असत्का नहीं— नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । ( गीता २ । १६ ) यह कोई द्वन्द्वमानका नया दृष्टिकोण नहीं है । सभी विचारक किसी भी घटनामे आविर्भाव-तिरोभावके विचारको आदर देते हैं । जिसकी आयति (भविष्य) उत्तम होती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है । इसीलिये द्वितीयाके चन्द्रका वन्दन किया जाता है, क्योकि वह उत्तरोत्तर वर्धमान दशामें रहता है । आयतिशून्य पूर्णिमाका पूर्ण चन्द्र भी इतना माङ्गलिक नहीं माना जाता, क्योकि उसके अभ्युदयके दिन समाप्त हो चुके होते हैं, अब उसका उत्तरोत्तर ह्रास ही होनेवाला है—‘प्रतिपच्चन्द्रमिव प्रजाः’ । फिर भी यह नही कहा जा सकता कि जो ह्रासको प्राप्त हो रहा है, अब उसका विकास होगा ही नही । देखते ही हैं कि जिस चन्द्रमाका ह्रास होता है, उसीका पुनः विकास होता है । जिस समुद्रमे भाटा आता है, उसमें पुनः ज्वार आता है । अनेक बार मनुष्यकी रुग्णता और पुनः स्वस्थता होती है। माली हालतमे भी बिगाड, सुधार होता रहता है । पृथ्वी अनेक बार अनुर्वरा हो जाती है, उपज घट जाती है; पुनः उपचारसे उर्वरा बनायी जाती है । मार्क्स तथा लेनिनकी भविष्यवाणी थी कि ‘मजदूरोंद्वारा ही क्रान्ति होगी । किसान सामान्य पूँजीवादी भले ही संख्यामें अधिक हो और गरीब भी हों; तब भी वे कभी वर्धमान, विकासमान नहीं हैं, अतः उनकी कभी उन्नति होनेवाली नहीं।’ पर चीन और भारतमें ठीक इसके विपरीत हुआ, यहाँ किसानों, मध्यवर्गों, सामान्य उत्पादन साधनवालों अर्थात् साधारण पूँजीपतियो- द्वारा ही क्रान्ति हुई । इतना ही नहीं, भारतमें तो शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक आन्दोलनद्वारा पर्याप्त सफलता मिली है, जिसकी मार्क्सवादमे कल्पना भी नही हो सकती । परिवर्तनसम्बन्धी एजिल्सकी बात अध्यात्मवादीके लिये कोई नवीन वस्तु नहीं है । हाँ, आत्मा कूटस्थ होनेसे अपरिवर्तनशील है, वह सब परिवर्तनोका द्रष्टा
है, अन्यथा परिवर्तनका अस्तित्व भी कैसे सिद्ध होगा ? बाह्य वस्तुओंमें मन एवं मानसिक परिवर्तनोंके होनेपर भी सर्वसाक्षी अपरिवर्तित ही रहता है । सच्ची बात तो यह है कि मार्क्सवादियोने भारतीय दर्शनोंकी गम्भीरता ही नहीं समझी । वे अध्यात्मवादके नामपर बहुत-सी अनर्गल बातें कहते हैं । अध्यात्म- वादी सामान्य-वृद्धिरूप विकास नहीं मानते, किंतु बादलोंके सङ्घर्षसे या ऋणात्मक, धनात्मक विद्युत्-धाराओंके सम्पर्कसे एकाएक महान् प्रकाश-जैसा द्रुतगामी प्रकाशरूप विकास भी मानते हैं । जलका बर्फ बन जाना और वाष्प बन जाना यह कौन नहीं जानता ? इसे एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाकी कुदान कही जाय या क्रमवर्धन परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम कह लिया जाय अथवा सीधी भाषामें परिणामविशेष कह ले, कोई विशेष अन्तर नहीं पडना । इसी तरह विकासकी गति उत्तरोत्तर अग्रगति, ऊर्ध्वगतिकी ओर अवश्य होती है, परंतु जिनका इतिहास क्षुद्रतम है, उन्हीं लोगोंके लिये ऐसी अनुभूति होती है । जिनके यहाँ वर्तमान सृष्टिका ही इतिहास अरबों वर्षोंका है, फिर अनन्त सृष्टि- संहारोंका इतिहास भी जिनके सामने है, उनके लिये तो चन्द्रमाके ह्रास-विकासके तुल्य, सूर्यके उदय-अस्तकी तरह दिन रात, जन्म-मरण, समुद्रके ज्वार-भाटा, सोने- जागने तथा ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, वसन्त ऋतुके परिवर्तनके तुल्य सृष्टि-प्रलयकी परम्परा चलती है । संसारके सबसे प्राचीन ग्रन्थ अपौरुषेय अनादि वेद कहते हैं— सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत । ( तै० आ० १० । १ । १४ ) ‘धाताने यथापूर्व ही सूर्य-चन्द्रका निर्माण किया ।’ महादार्शनिक भगवान् श्रीकृष्ण गीतामें कहते हैं— ‘भूतग्राम. स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।’ ( ८।१९ ) ये वे ही भूतग्राम पुनः उत्पन्न होकर प्रलीन होते हैं । यह प्रपञ्च प्रवृत्ति निरुद्देश नहीं है । जड प्रकृतिका स्वतन्त्र कोई उद्देश्य नहीं होता । उद्देश्य चेतन- का ही होता है । अनादि अविद्या काम-कर्मबद्ध जीवोंको भोग एवं अपवर्ग सम्पादन करना ही प्रकृतिप्रवर्तनका ईश्वरीय उद्देश्य है । मार्क्सीय विचार-धाराका आधार इतिहास लघुतम है । जिसमें कुछ शताब्दियोसे ही मनुष्य ससारकी उत्पत्ति, वर्गसघर्षके इतिहासका प्रारम्भ और कुछ ही शताब्दियोंमें वर्गसघर्षके इतिहासकी समाप्ति भी हो जाती है । मार्क्सके मतानुसार कम्युनिष्ट राज्य होते ही वर्ग-सघर्षकी समाप्ति हो जाती है । इस वर्ग- सघर्षके भी विकासकी उत्तरोत्तर प्रगति क्यो नहीं होती, यह तो वे ही जान सकते हैं । यदि किसी भी सिद्धान्तके विरोधी कुछ लोग हो सकते हैं और उनकी संख्या
५१८ मार्क्सवाद और रामराज्य बढ़कर प्रतिवाद खड़ा हो जाता है, तो कम्युनिज्म ही इसका अपवाद क्यों ? उसके भी तो विरोधी हैं ही, उनकी भी संख्या बढ़ती ही है । सिद्धान्ततस्तु— सर्वे क्षयान्ता निचया पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥ (वाल्मी० रा० अयोध्या० १०५ । १६) संसारके सभी संग्रहोंका एक दिन क्षय होता है, सभी उत्थानोंका एक दिन पतन होता है, सभी संयोगोंका एक दिन वियोग होता है और सभी जीवनोंका एक दिन मरण होता है । फिर कम्युनिष्ट-राज्यका कभी अन्त न होगा यह कल्पना भी अन्ध-विश्वास ही है । यदि सब पुरानी वस्तुओंका विनाश होता है, तो कभी कम्युनिष्टराज्य या वर्गविहीन-राज्य भी पुराना होगा और इसका भी विनाश, ध्वंस किंवा निर्वाण ध्रुव है । एञ्जिल्सके शब्दोंमें 'प्रकृति द्वन्द्वमानका परीक्षास्थल है । यह मानना पड़ेगा कि आधुनिक प्रकृति-विज्ञानने इसके प्रभूत उदाहरण दिये हैं, जो प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं और इस प्रकार यह प्रमाणित कर दिया है कि अन्तिम विश्लेषण करनेपर प्राकृतिक प्रक्रिया आतिभौतिक नहीं बल्कि द्वन्द्वात्मक है । अनन्तकालसे यह किसी चित्रगतिसे नहीं घूमती, बल्कि इसका एक इतिहास है । यहाँ डार्विनका नाम सर्वप्रथम है, जिसने यह प्रमाणित कर कि आजका सावयव संसार उद्भिजपशु और इस प्रकार मनुष्य भी कोटिशः वर्षोंकी विकास- क्रियाका परिणाम है, प्रकृतिकी आतिभौतिक कल्पनापर प्रचण्ड प्रहार किया । वह कहता है—'भूतविज्ञानमें प्रत्येक परिवर्तन परिणामका गुणमें परिवर्तन है । यह परिमाण किसी-न-किसी प्रकारकी गतिका परिमाण है, जो या तो वस्तुविशेषमें वर्तमान है या उसको दी जाती है । उदाहरणार्थ पानीके उत्तापको एक सीमातक बढ़ाते हुए उसकी द्रवावस्थापर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । लेकिन ज्यों-ज्यों यह उत्ताप घटता या बढ़ता है, एक क्षण आता है, जब पानीकी अवस्था- में परिवर्तन होता है और एक दशामें यह भाप बन जाता है और दूसरी दशामें बर्फ । किसी प्लैटिनमके तारको गर्म करनेके लिये कि वह चमक सके एक निश्चित परिमाणकी बिजली आवश्यक है । हर खनिज पदार्थके गलनेका एक विशेष उत्ताप होता है । हर वायवीय पदार्थके लिये एक निश्चित बिन्दु है, जब कि उचित ठंडक और दबावके प्रयोगसे उसको तरल पदार्थमें परिणत किया जा सकता है । पदार्थ-विज्ञानमें जिनको स्थिरसंज्ञक माना जाता है, अधिकांश क्षेत्रमें वे ही बिन्दु हैं, जब गति या बिन्दुके ह्राससे वस्तुविशेषमें गुणात्मक परिवर्तन होता है । ऐसी स्थिर संज्ञाका उदाहरण है वह कोण, जिसपर आलोक रश्मि- का परिवर्तन होकर सीधा प्रतिफलन होता है ।'
रसायन-शास्त्रपर विचार करते हुए एजिल्स आगे चलकर कहता है—'रसायन- शास्त्रके विज्ञानका सार यह है कि वस्तुओंमे परिमाणात्मक परिवर्तनके फलस्वरूप उनके गुणोंमें परिवर्तन होता है। हीगेलको इसका ज्ञान था। अम्लजन, यदि इसके अणुमें दो न होकर तीन परमाणु हो, तो यह ओजोन बन जाता है जिसका गुण साधारण अम्लजनमे भिन्न है। आतिभौतिकवादके विरुद्ध द्वन्द्वमान यह समझता है कि सब वस्तुओंमें तथा द्रव्यगत घटनाओंमें अन्तर्विरोध वर्तमान है, क्योकि इनमें एक भावात्मक और दूसरा अभावात्मक कोण है। एक भूत तथा भविष्य है। इनमें कुछ विकास हो रहा है, परिमाणात्मक परिवर्तनोंकी गुणात्मक परिवर्तनोंमें परिणति हो रही है। विकास क्रियाकी भीतरी बात है इन विरोधियोंका संघर्ष, पुराने और नयेमें, जिसका विनाश हो रहा है और जन्म हो रहा है, उसमें, जो अदृश्य हो रहा है तथा जिसका विकास हो रहा है, उसमे।' आधुनिक विज्ञान कोई ऐसी चीज नहीं है, जो इदमित्थं सही हो और उसके आधारपर आत्मा, धर्म तथा ईश्वरकी समस्या हल की जा सके। उसके सम्बन्धमें कितने ही विभ्रम हैं। लार्ड केल्विनकी घोषणा थी कि वे ऐसा भाव समझनेमें असमर्थ थे, जिसको वे यन्त्र रचनामें परिणत न कर सकें। परन्तु अब तो केन्द्राकर्षण, काल और दिक्सम्बन्धी विचारतक बदल गये। गणित तथा पदार्थ-विज्ञानमे बहुत-से सिद्धान्त ऐसे हैं, जो परस्पर विरोधी है। उदाहरणार्थ पहले यूक्लिडके स्वतःसिद्ध नियम अनिवार्य विचार-तत्त्व माने जाते थे, परन्तु सालिवानके अनुसार अब वह पुरानी वस्तु हो गयी। उनका कहना है आजसे सौ वर्ष पूर्व लोवाशेफूस्की नामक रूसीने और बोलियाई नामक हंगेरियनने यह जान लिया था कि यूक्लिडका रेखागणित अविवेच्य आवश्यकताका स्थान नहीं ले सकता। दो हजार वर्षतक यूक्लिडके सिद्धान्तोंने निर्विरोध राज्य किया, सभी वैज्ञानिक उन्हें जितना मनुष्योंके लिये, उतना ही देवताओंके या ईश्वरके लिये भी आवश्यक मानते थे। उस समय लोवाशेफूस्की तथा बोलियायीको लोग विक्षिप्त कहते थे। महान् विद्वान् गौसतकको जो स्वयं इसे समझ चुका था, अपना आविष्कार प्रकाशित करनेका साहस न हो सका, परन्तु अन्तमे लोवाशेफूस्की आदिकी बात मान्य हुई। सालिवानके अनुसार 'आज जर्मन रेखागणितकार रीमानके रेखा
५२० मार्क्सवाद और रामराज्य समकोण नहीं बनाते । प्रकाशकी किरणे ऋजु रेखाओंमे नही फैलती । जिस वस्तुपर प्रकाश-रश्मि पड़ती है उसपर दबाव डालती है। सीमित एव गोलाकार दिक्का आकार निरन्तर तेजीसे बढता जा रहा है । दिक् पारिमाणिक नही । एक परमाणुका प्रभाव सम्पूर्ण विश्वपर रहता है। परमाणुमे एलेक्ट्रान (परमाणुका अस्थिर शक्तिकण ), प्रोटान (केन्द्रित शक्तिसमूह ) के चारो ओर घूमे हुए बिना ही बीचके स्थानकी यात्राके एक मार्ग-चिह्नसे दूसरे मार्ग-चक्रमें पहुँच जाता है। आज तो विज्ञान-वेत्ताओने विद्युत्कण- को स्वेच्छाचारी भी मान लिया है, जिसमे यन्त्रवादका बिल्कुल ही नाश हो जाता है। जिस आइजक न्यूटनके केन्द्रिय आकर्षणका सिद्धान्त आज भी श्रद्धासे पढाया जाता है, उसीके सम्बन्धमें सालिवानका कहना है कि न्यूटनका यह आविष्कार और इसकी पुष्टि मानुषी बुद्धिकी चरम कृति समझी जाती थी, तो भी आज हम केन्द्रियाकर्षणकी व्याख्या सर्वथा भिन्न परिभाषाद्वारा करते हैं । इस विषयपर हमारा सम्पूर्ण दृष्टिकोण न्यूटनके दृष्टिकोणसे जडसे ही भिन्न है । न्यूटनके सिद्धान्तको लागू करनेसे कई अंगोंमें वह अवास्तविक और अशुद्ध ठहरता है । आज वह प्रणाली जड और शाखासहित उखाड फेकी गयी, जिसकी नींवपर इस सिद्धान्तको खड़ा किया गया था । इस तरह आजके पाठ्यग्रन्थोमे पढाया जाता कि पृथ्वीमें गम्भीर प्रवेश करनेवाली प्रकाशरश्मियाँ दूरवर्ती तारक गणोके स्तरपर हो रहे द्रव्यनिर्माणकी उपज हैं । दूसरे सिद्धान्तद्वारा इसी प्रकारकी उपजका कारण द्रव्यनाश बतलाया जाता है, जो कि ठीक पूर्वके विपरीत है । एक सिद्धान्तके अनुसार अस्थिर विद्युत्कण तरङ्गका गुण रखते हैं, दूसरे सिद्धान्तके अनुसार कणोका इनमेंसे किसीका भी त्यागना सम्भव नही, क्योकि कुछ घटनाओकी व्याख्या पहले सिद्धान्तानुसार होती है, कुछका दूसरे ही द्वारा । मनोविज्ञानके क्षेत्रमें भी परस्परविरोधी सिद्धान्तोपर आधारित चार सम्प्रदायें बन गयी हैं । इनफ्रायड एटलर यूग और स्टैककैलके सम्प्रदायमें बड़े-बडे प्रतिभाशाली विद्वान् अपने पक्षका समर्थन करते हैं । जीवशास्त्रमे भी आकस्मिक परिवर्तनोके प्रश्नपर प्रो० वाइजमैन एवं लेमार्कके अनुयायी एक दूसरेका निरन्तर विरोध करते हैं । एलौपैथिकमें बी० सी० जी० के प्रामाणिक विद्वान् पी० बी० बैजमिनके अनुसार बी० सी० जी० प्रभावशाली एवं निगपद यक्ष्मानिरोधक उपचार है । पर डाक्टर डब्ल्यू० एफ० ब्राडले (इग्लैंड) अभी भी इसे विवादास्पद ही समझते हैं । पाश्चात्य मनोविज्ञानका प्रवर्तक फ्रायड कहता है कि हिस्टीरियामें जो डाक्टर औषध देता है वह कोरा ठग है, किंतु सभी डाक्टर हिस्टीरियामें औषध देते हैं । साल्विानके अनुसार सत्यसे वैज्ञानिकोका वास्तविक अन्तिम अभिप्राय सुविध.से है । वैज्ञानिक सैद्धान्तिक दृष्टिकोणसे अपने-आपको कुछ
मार्क्स-दर्शन ५२१ भी समझें, वास्तवमे वे क्रियासाधक होते हैं । अलेक्सिस कैरलका कहना है कि गणित भौतिक और रसविज्ञान आवश्यक विज्ञान है, परंतु चेतन द्रव्योंकी खोजमें मूल प्रारम्भिक विज्ञानोका स्थान इन्हें प्राप्त नहीं हो सकता । उसके अनुसार मानव-जातिके दुष्ट ओर पतित बडी संख्याके नियन्त्रण तथा मार्गदर्शनके लिये सात्त्विक आहार विहारद्वारा आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले तपस्वियोंकी एक अल्प संख्या बननी चाहिये—यह भारतीय ही सूझ है । अभी थोड़े ही दिन हुए डाक्टर लोकी यह बात इग्लैण्डकी विज्ञान- परिषद्में दुहरायी गयी है कि आधुनिक विज्ञानकी सबसे बडी खोज यह है कि 'अभी हमलोग कुछ भी नहीं जानते हैं।' फिर विज्ञानके बलपर मार्क्स, एजिल्सका सब कुछ जान सकनेका दावा करना निरादम्भ नहीं तो क्या है ? जहाँ अभीतक अहंतत्त्व और महत्तत्त्वतक, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—इन मात्राओको जाननेमें विज्ञान सफल नहीं हुआ है, फिर अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृतिकी बात तो दूरकी है । फिर 'अणोरणीयान्' आत्मा और परमात्माको वैज्ञानिकोकी यान्त्रिक कसौटीपर कसना केवल उपहासास्पद नहीं तो क्या है ? इसी प्रकार एजिल्स तथा मार्क्सका इतिहास महान् आर्ष इतिहासकी अपेक्षा एक विकृत अप्रामाणिक क्षुद्रतम इतिहास है, अतः इसके आधारपर संसारका स्वरूप निर्धारित नहीं हो सकता । डार्विनने स्वयं ही अपने लिये अनेक विषयोंको अज्ञेय माना है । उद्भिज्ज, पशु और मनुष्योंकी विकास कहानी स्वयं ही अप्रामाणिक है, फिर इसके द्वारा अतिभौतिकवादपर प्रचण्ड आघात आकाश- मुष्टिहननके तुल्य है । हेतुविशेषोंसे वस्तुओंका रूपान्तरण होता है, किंतु वह रूपान्तरण वस्त्वन्तरण नहीं है । बर्फ हो जानेपर भी वस्तु जल ही रहता है । इसी तरह भाप बन जानेपर भी जलका अभाव नहीं हो गया । 'नासतो विद्यते भावः' का निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर है । जैसे प्रसारित पट और संकुचित पटकी अवस्था-विशेष है, वैसे ही बर्फ और भाफ जलकी अवस्था-विशेष ही है । अन्य उदाहरण भी इस सिद्धान्तके विरोधी नहीं हैं । रसायनशास्त्रके उदाहरण भी उक्त सिद्धान्तके बाधक नहीं हैं । अम्लजनके तीन परमाणुओंसे ओजोन बनता है, उसका गुण अम्लजनसे भिन्न होता है । इसी तरह नैयायिकोंके अनुसार दो परमाणुओंके द्वयणुक बनते हैं, परंतु तीन परमाणुका कुछ भी नहीं बनता । छः परमाणुओंका त्रसरेणु बनता है, पाँचका कुछ नहीं । औषधोंकी मात्रा- भेदसे गुणभेद तो प्रसिद्ध ही है । पृथक् पृथक् ओषधियोंके गुणोंसे सम्मिलित ओषधियोंके गुणोंमें संसर्गजनित विशेषता होती है । एक मात्रासे पानी, अन्न या दुग्ध शरीरके पोषक होते हैं और वे ही दूसरी मात्रासे शरीरके नाशक बन जाते हैं । ऐसी बातोंको अतिभौतिकवादके विरुद्ध समझना नितान्त भ्रम है ।
५२२ मार्क्सवाद और रामराज्य वस्तुओ एव घटनाओमे अन्तर्विरोधकी कल्पना भी तत्त्वशून्य है । भावात्मक अभावात्मक यदि क्रमिक हों तो उनका विरोध कहा ही नही जा सकता, विरोध तो सम देश-कालमें उसी वस्तुके भावाभावका होता है । भूत और भविष्य आविर्भाव-तिरोभाव पुराने-नये—ये सभी भिन्नकालिक होनेसे विरोधी हैं ही नहीं। पिता-पितामहादि प्राचीन, पुत्र-पौत्रादि नवीन, अध्यापक प्राचीन, छात्र नवीन, इनमें विरोध नहीं है, किंतु उपकार्योपकारभाव है । मनुष्यकी बैठने, लेटने, चलने आदिमें कई ढंगकी अवस्थाएँ विकसित होती हैं, जो परस्पर एक दूसरेसे विलक्षण होती हैं । इसी तरह बीजके अवयवोंका बीज अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा आदि अनेक अवस्थाएँ होती हैं, इनमें पूर्व- पूर्व अवस्था उत्तरोत्तर अवस्थाओंकी जननी है—सहायक है, विरोधकल्पना दुरभिसंधिपूर्ण है । सिर्फ वर्गविद्वेष, वर्गविध्वंसके वाले कारनामोंके समर्थनके लिये उसे दार्शनिकरूप देनेका प्रयत्न किया जाता है । जैसे पिता अपने उत्तराधिकारी पुत्रके जन्मके लिये प्रयत्नशील होता है, उसी प्रकार कारण भी अपने उत्तराधिकारी कार्यके जन्मके लिये अनुकूल होता है । राजा शिबि एवं दिलीपने तो स्वशरीर देकर भी कपोत तथा नन्दिनी गायकी रक्षाके लिये प्रयत्न किया था । यहाँ विरोध नहीं, किंतु उपकारकी भावना है । वस्तु स्थिति तो यह है कि विवर्धमान क्षीयमानका सहायक होता है, युवक वृद्धकी सेवासे अपनेको पुण्यात्मा मानता है, बलवान् निर्बलका, विद्वान् अविद्वान्का, धनवान् निर्धनका सहायक होता है—यही मानवता है । कहा जाता है कि 'द्वन्द्वमानके अनुसार निम्नस्तरसे ऊँचे स्तरपर विकासको हम साधारण पट-परिवर्तनके रूपमें नहीं देखते; बल्कि वस्तुओ और दृश्यगत घटनाओंमें वर्तमान विरोधके रूपमें तथा इन विरोधियोंकी बुनियादपर कायम दो विपरीत गतियोंके संघर्षके रूपमे देखते हैं । लेनिनके शब्दोंमें द्वन्द्वमान वस्तुओंकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है । लेनिनके ही शब्दोमे द्वन्द्वमान वस्तुओकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है, और विकास विरोधियोंके संघर्षका नाम है। द्वन्द्वमान प्रतिदिनके साधारण तर्कशास्त्रका स्थान नहीं ले सकता, जिस प्रकार बीजगणित या संख्यानुगणित अङ्कगणितका स्थान नहीं ले सकते । जिस प्रकार अङ्कगणितकी सीमाके बाहरकी समस्याओको हल करनेके लिये गणितकी उच्च शाखाओका प्रयोग किया जाता है, उदाहरणार्थ उन समस्याओका जिनमें अज्ञात और परिवर्तनीय परिमाण या संख्या और उनके सम्बन्धोका विचार होता है । उसी प्रकार द्वन्द्वमान गतिशील सम्बन्धो और क्रियाओका साधारण तर्कशास्त्रके दायरेमें लानेका साधन है; क्योकि साधारण तर्कशास्त्र
मार्क्स-दर्शन ५२३ केवल स्थिर सम्बन्धोंको लेकर चलता है, द्वन्द्वमान उसीको लेकर कार्यारम्भ करता है जिसको अपने दायरेके बाहर रख छोड़नेके लिये साधारण तर्कशास्त्र मजबूर है, वह यह कि किसी वस्तुको अपने ही द्वारा समझा नहीं जा सकता। इसको यों ही समझा जा सकता है कि यह और किसी वस्तुसे आया और किसी अन्य वस्तुकी ओर यह जा रहा है और इसकी गतिका कारण है इसके और इसके बहिरावेष्टनके बीचका एक क्रियाशील सम्बन्ध । इसलिये द्वन्द्वमान प्रत्येक वस्तुकी अन्य वस्तुओंके बीच पारस्परिक क्रिया प्रतिक्रियाके फलस्वरूप गतिका मूर्तरूप ही समझता है । प्रत्युत्पादक, विपरीतानुवर्तन, विरोध और सङ्घर्ष (जो परिवर्तन और विकासका भी जनक है) के बिना द्वन्द्वमान असम्भव हो जाता है । गति और उसके रूपान्तरके अध्ययनके लिये द्वन्द्वमान अत्यावश्यक है। लेकिन जहाँ रूप, सार सम्बन्धका विकार तुलनात्मकरूपसे नहीं होता, वहाँ साधारण तर्कशास्त्रका प्रयोग ही सिद्ध है। "द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मनुष्यके वास्तविक भौतिक अस्तित्वके स्थूल सत्यको लेकर चलता है। यह उस अतिभौतिकवादी तरीक़ोंका तिरस्कार करता है जो संसारके विषयमें एक कल्पित मतका प्रचार करना चाहता है, जैसे यह एक है या अनेक, यह युक्त है या विच्छिन्न इत्यादि । प्रत्यक्षीकरण और प्रत्यक्षीभूत कल्पनाका रूप प्रतिबिम्बका रूप है। बाहरी दुनियाका द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इस ओर भी दृष्टि आकर्षित करता है कि यह मानसिक क्रियाशील है, यह निष्क्रिय प्रतिबिम्बमात्र नहीं है। इसके अनुसार विचार, भूत जिसका वास्तविक अस्तित्व है, जो क्रियाशील और इसलिये विकासमान है—कि सम्बन्धित सम्पूर्णता और जीवित मनुष्योंके बीच व्यावहारिक सम्बन्धका परिणाम है । यान्त्रिक भौतिकवाद विश्वको मशीनकी तरह एक प्रणालीबद्धरूपमें देखता है, जब कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इसको एक असीम सृजनात्मक क्रियाके रूपमें देखता है।" पूर्वोक्त युक्तियोंसे स्पष्ट है कि मार्क्सवादियोंका विरोध एक विचित्र वस्तु है, जो कारणगत विरोधरूपसे उच्चस्तरीय विकासका कारण बनता है। अध्यात्मवादीको इसमें विरोधकी कोई बात ही नहीं दीखती। जो एक साथ मिलकर कार्योत्पादक होते हैं, उन्हें अध्यात्मवादी सहयोगी ही कहते हैं, विरोधी नहीं। अग्नि, जल, सत्त्व, रज, तम आदि परस्पर विरोधी तत्त्व भी सहयोगी होकर कार्यके जनक होते हैं, यह स्पष्ट किया जा चुका है। साधारण तर्कशास्त्र एवं द्वन्द्वमानका भेद भी वैसा ही है, जैसे मित्रातनय एवं वन्ध्यातनयका। कहना न होगा कि ऐसा कोई भी द्वन्द्वमानका विषय नहीं है, जो तर्कशास्त्रका विषय न हो। जो वस्तु अनादि अपौरुषेय, शास्त्रैकमधिगम्य है, वह धर्म-ब्रह्मादि न तर्कका विषय है, न द्वन्द्वमान- का। अतः 'अङ्कगणितकी सीमाके बाहरकी समस्याओंको हल करनेके लिये जैसे
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बीजगणित-संख्यानुगणित अपेक्षित होते हैं, वैसे ही साधारण तर्कके सीमाके बाह्यकी समस्याओंको हल करनेके लिये द्वन्द्वमान है, यह भी साधारण तर्कसे उच्चकोटिका तर्क है,' इत्यादि कथन भी मार्क्सवादियोका स्वगोष्ठिनिष्ठ सिद्धान्त है । स्थिर, अस्थिर-सभी सम्बन्धोमे तर्कशास्त्रका प्रवेश होता है । वस्तुतः मार्क्सवादमें साधारण तर्कका या, द्वन्द्वमानका कोई भी स्पष्ट अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भव दोषरहित लक्षण और परिभाषा नहीं है । इसीलिये रबड़-छन्दके समान मार्क्सवादमें मनमाना तर्क चलता है । किंतु तर्कशास्त्रमें तर्ककी विशेष परिभाषा है-'व्याप्यारोपेण व्याप- कारोपस्तर्कः ।'* व्याप्यके आरोपसे व्यापकका आरोप तर्क कहलाता है । तर्क स्वयं प्रमाण नहीं होता, किंतु अनुमानमें अपेक्षित व्याप्तिज्ञानका सहायक होता है । जो अतर्क्य है, उसीको तर्कशास्त्र छोड़नेको मजबूर होता है । उस सम्बन्धमें द्वन्द्ववाद भी मूक ही रहेगा । साध्य, साधनभाव जैसे स्थिर वैसे ही गतिशील पदार्थोंके सम्बन्धमें भी लागू होते हैं । किसी वस्तुको समझनेके लिये सम्भावित, असम्भावित सम्बन्धों तथा विविध परिस्थितियोको जानना तर्कशास्त्रको भी अभीष्ट है। कुछ भारतीय तार्किकोका तो यहाँतक कहना है कि एक घटका ज्ञान भी पूरा और सही तब होता है, जब घटेतर सकल वस्तु प्रतियोगि भेदयुक्त घटका बोध होता है । अर्थात् स्वेतर सकल पदार्थोंसे 'भिन्नत्वेन रूपेण' घटका बोध होता है । इतर-भिन्नता जाननेके लिये इतर सकल पदार्थोंका ज्ञान भी आवश्यक होता है । कौन वस्तु किन-किन हेतुओंसे उद्भूत होती है, किन-किन प्रमाणोसे विदित होती है, इसका अन्तिम परिमाण क्या होगा, उसका किन वस्तुओपर किस ढंगका प्रभाव होगा-यह तो राजनीति, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, आयुर्वेद, अध्यात्मशास्त्र, मन्त्रशास्त्र आदिशास्त्रोंमें विचारा जाता है। इतना ही नहीं, किसका कितना दृष्ट प्रभाव पड़ेगा, कितना अदृष्ट प्रभाव पड़ेगा, यह भी विचार भारतीय शास्त्रोंमें होता है । फिर भी संसारकी प्रत्येक वस्तुकी क्रिया-प्रतिक्रियारूप सम्बन्ध नहीं होता । ससारमें कितने ही पदार्थ परस्पर सहयोगी होते हैं, कितने विरोधी होते हैं, कितने ही उदासीन भी होते हैं। हाँ, प्रत्येक कार्य वस्तु त्रिगुणात्मक होनेसे और गुणोंका चल स्वभाव होनेसे गतिका मूर्तरूप तो नहीं, किंतु गतिका फल कहा जा सकता है। परंतु उसमें जैसे गति निदान है, वैसे ही सत्त्वका प्रकाश और तमका अवष्टम्भ भी मिला हुआ है। विपरीतानुवर्तन विरोध एव संघर्षके अनेक स्थान हैं, परंतु वहाँ द्वन्द्वमान नामकी कोई सर्वसम्मत वस्तु नहीं है । गतिका रूपान्तरण स्वयं नहीं होता, किंतु किसी वस्तुके रूपान्तरणमें गति कारण अवश्य है, परंतु वहाँ द्वन्द्वमानका गन्ध भी नहीं है। द्वन्द्वात्मक
- अथवा 'अविज्ञात तत्त्वको प्रमाण, हेतु, उपपत्तसे जाननेके लिये ऊहापोह करना तर्क है । (न्याय० १।१।४०)
मार्क्स-दर्शन ५२५ भौतिकवाद और यान्त्रिक भौतिकवादका भेद भी अवास्तविक है । एकता- अनेकता, युक्तता-अयुक्तता, विच्छिन्नता-अविच्छिन्नताका विचार काल्पनिक नहीं है । इन विचारोंके बिना वस्तुयाथात्म्यका बोध असम्भव ही है । समूचे शरीरको ही मनुष्य या आत्मा मान रखना अविवेकका पूरा परिचय है । जैसे ईंट, चूना, पत्थर, काष्ठ आदिसे बना हुआ मकान एक सङ्घात है, वह किसी अपनेसे असंहत भोक्ता चेतनके लिये होता है, वैसे ही माता-पिताके शुक्र, शोणितसे बना हुआ अस्थि, मांस, चर्ममय पंजर देह भी मकानके समान ही किसी अपनेसे असंहत, असङ्ग चेतनके लिये होना चाहिये । अचेतनके सभी व्यवहार चेतनके दुःख-निवृत्ति सुखप्राप्तिके लिये होते हैं । वैसे ही देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, दिल, दिमाग आदिकी प्रवृत्तियाँ भी किसी चेतनके सुखार्थ मानना युक्तियुक्त है । इसे काल्पनिक कहना अनुचित है । अतएव मानसिक क्रियाको क्रियाशील मानना भी अनभिज्ञता है । गुण और क्रिया स्वयं ही द्रव्याश्रित होते हैं । जैसे गुण गुणका आश्रय नहीं होता, वैसे ही क्रिया भी क्रियाका आश्रय नहीं होती है । वस्तुतः मानसिक क्रिया भौतिक है—यह भारतीय अध्यात्मवादी भी मानते हैं । ब्रह्मात्मक ज्ञान नित्य- ज्ञान है, वह विभिन्न मानसिक क्रियाओंका भी निर्विकार भासक है । मानसी क्रियाओंकी विशेषता स्पष्ट है, नित्य ज्ञान क्रिया नहीं है, अध्यात्मवादी इसे प्रति- बिम्बरूप मानते ही नहीं । ‘फिर निष्क्रिय प्रतिबिम्ब नहीं है’—यह कथन भी अनुक्तोपालम्भ है । विकासमान भूतकी सम्बन्धित पूर्णता या जीवित मनुष्योंके बीच व्यावहारिक सम्बन्धका परिणाम ही ज्ञान है—यह कथन मानसिक क्रियारूप ज्ञानके सम्बन्धमें कहा जा सकता है, परन्तु नित्यज्ञानके सम्बन्धमें ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ज्ञानका प्रागभाव या प्रध्वंसाभाव नहीं सिद्ध होता, क्योंकि भाव, अभाव किसी वस्तुके ग्रहणके लिये ज्ञान आवश्यक ही है । ज्ञानको स्वभावका ज्ञापक कहना ‘वदतोव्याघात’ है । जैसे महाकाशमें घटादि उपाधिद्वारा परिच्छिन्नता और अनेकता प्रतीत होती है, वैसे ही विषयों एवं मानसी वृत्तियोंके कारण नित्य ज्ञानमें भी परिच्छिन्नता तथा अनेकता प्रतीत होती है । वस्तुतः निरुपाधिक अनन्त आकाशके तुल्य ही निरुपाधिक ज्ञान भी नित्य एवं अनन्त है । अपरप्रेरित जडपदार्थोंमें स्वतः सर्जनकी शक्ति नहीं होती । विज्ञानसे भी नहीं सिद्ध होता कि किसी चेतन मनुष्यके प्रयत्नके बिना जडपरमाणु, जडविद्युत्कण, जडभूत या प्रकृति गतिशील होनेपर भी नियमित तथा अनुकूल गति बनाकर अभीष्ट कार्य-सिद्धि कर सकेंगे । जल तथा वायु गतिशील हैं, फिर भी कार्यसिद्धिके अनुकूल गतिशील बनाना चेतनका ही कार्य है । इसी तरह गतिशील भूतोंको भी नियामक चेतनकी