भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५१४ मार्क्सवाद और रामराज्य एक आकस्मिक बटोर है, जहाँ वे एक दूसरेसे विच्छिन्न तथा स्वतन्त्र हैं ।' इसके विपरीत द्वन्द्वमान इन वस्तुओ और दृश्यमान घटनाओको एक सूत्रमें बाँधता है जिसमें उनकी पारस्परिक निर्भरता प्रकाश पाती है । इसलिये द्वन्द्वमानके अनुसार किसी प्राकृतिक घटनाको स्वतन्त्ररूपसे, अपने बहिरावेष्टनसे अलगकर नहीं समझा जा सकता; क्योकि वे इन बहिरावेष्टनोसे सम्बन्धित हैं और अपनी पारिपार्श्विक अवस्थाद्वारा सीमित हैं । अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान यह मानता है कि प्रकृतिकी अवस्था स्थिर और गतिहीन नहीं है, बल्कि अविराम गति और परिवर्तनकी अवस्था है, अविराम नवीन और विकासकी अवस्था है जहाँ किसी-न-किसी चीजका उत्थान और विकास होता है और किसी-न-किसी चीजका ध्वंस और निर्माण । इसलिये द्वन्द्वमानके तरीकेकी यह माँग है कि दृश्यगत घटनाओका विचार न केवल उनके पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी पारस्परिक निर्भरताके दृष्टिकोणसे होना चाहिये, बल्कि उनकी गति, उनका परिवर्तन, विकास, आविर्भाव और अन्तर्धानकी दृष्टिसे भी होना चाहिये । द्वन्द्वमानका तरीका मुख्यरूपसे उसको महत्त्व नहीं देता जो उस मुहूर्तमें स्थायी और दृढ मालूम होता है, लेकिन जिसका अन्त होना आरम्भ हो गया हो, बल्कि उसको जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो, यद्यपि उस क्षणमें वह भंगुर ही मालूम पड़ रहा है, क्योकि द्वन्द्वमान उसीको अजेय मानता है जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो । एजिल्सके शब्दोमें सारी प्रकृति, छोटी-से-छोटी लेकर बड़ी-से-बड़ी चीज, एक बालूके कणसे सूर्यतक, प्रोटिस्टा ( प्राथमिक जीवित कोष ) से मनुष्यतक, लगातार आविर्भाव और तिरोधानकी अवस्थामें है, सदा परिवर्तनशील है और परिवर्तनकी अवस्थामें है इसलिये एजिल्सका कहना द्वन्द्वमान वस्तुओं और उनके मानसिक प्रतिबिम्बोको उनके पारस्परिक सम्बन्ध और संयोगमें उनकी गति, उनके उत्थान और अन्तर्धानमें देखता है । 'अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान विकासकी क्रियाको सामान्य वृद्धिके रूपमें, जहाँ परिमाणकी वृद्धि और ह्राससे गुणोंका परिवर्तन नहीं होता, नहीं देखता, बल्कि ऐसे विकासके रूपमें देखता है, जो नगण्य और अदृश्य परिवर्तनसे बुनियादी गुणोके परिवर्तनके रूपमें परिणत होता है । इस विकासमें गुणात्मक परिवर्तन धीरे-धीरे नहीं होता, बल्कि एकाएक और द्रुतगतिसे; जो एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदानका रूप लेता है । यह आकस्मिकरूपसे घटित नहीं होता, बल्कि क्रमवर्धमान परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम है । द्वन्द्वमानके तरीकेके लिये यह आवश्यक है कि इस विकासकी क्रियाको हम चक्रगतिके रूपमें न देखे, न इस रूपमें कि जो कुछ पहले घटित हो चुका है,