मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स-दर्शन ५१९ उसकी सामान्य पुनरावृत्ति हो रही है, बल्कि एक अनुगति और ऊर्ध्वगतिके रूपमें, एक गुणात्मक अवस्थासे दूसरी नयी गुणात्मक अवस्थामें परिवर्तनके रूपमें, साधारणसे असाधारण, निम्नस्तरसे उच्चस्तरपर विकासके रूपमें देखना चाहिये।' अवश्य ही वस्तु-वैचित्र्य विचार-विस्तारमें उपयोगी है, फिर भी वस्तु बिना भी स्वप्नों, मनोरथोंमें विचार, विस्तार परिलक्षित होते हैं, परन्तु विचार बिना तो वस्तुका विकास असम्भव ही है। जैसे वैज्ञानिक यन्त्र, रासायनिक तत्त्वोंका विकास, विश्लेषण विचारप्रभूत हैं, वैसे ही प्राकृतिक, भौतिक गति या विकास भी ईश्वरीय विचारमूलक ही हैं। इसीलिये— 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति' (छा० उ० ६।२।३) —इत्यादि वचनोंमें उपनिषदोंमें स्पष्टरूपसे कहा गया है कि स्वप्रकाश, सत्, चेतनने ही ईक्षणपूर्वक विश्व-निर्माण किया। द्वन्द्वमानके जादूसे जड-प्रकृति या जड- भूतोंमें स्वतः चन्द्र, सूर्य आदि निर्माणकी क्षमता नहीं सिद्ध होती। पशु- मनुष्य एवं उसके दिव्य मस्तिष्क आदि यदि केवल भूतोंका ही करिश्मा है, तो विविध यन्त्रोंके निर्माणके लिये भी चेतन मनुष्यकी अपेक्षा न होनी चाहिये । अध्यात्मवादमें प्रकृति, वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर नहीं है । यह कल्पना तो असमीक्ष्यकारी जड़में ही हो सकती है। अध्यात्मवादमें तो संसारके किसी पदार्थकी चेष्टा कर्मसापेक्ष ईश्वरके विचारसे ही होती है। किसी भद्दे पाश्चात्य अध्यात्मवादमें प्रकृतिको वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर कहा जा सकता है। मार्क्सवादका प्रकृति शब्द भी भ्रामक है, वस्तुतः वे सांख्योंकी प्रकृतितक पहुँच भी नहीं सके हैं। वे तो भूतों, परमाणुओं तथा उसके कतिपय विश्लेषणों- तक ही पहुँच सके हैं। अध्यात्मवादियोंकी दृष्टियोंमें आकाशसे भी सूक्ष्म शब्द तन्मात्रा और उससे भी सूक्ष्म अह, अहसे भी सूक्ष्म महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे भी सूक्ष्म प्रकृति है। इसका विस्तृत विवेचन अन्यत्र किया जा चुका है। प्रपञ्चकी विचित्रतासे सम्बन्धकी भी विचित्रता होती है, अतएव विच्छिन्न, अविच्छिन्न, स्वतन्त्र, अस्वतन्त्र —अनेक प्रकारके पदार्थ संसारमें होते हैं। प्रत्येक भोग्य पदार्थ भोक्तृसम्बद्ध होते हैं। प्रत्येक कार्य, कारणसम्बद्ध भी होते हैं। साथ ही अनेक पदार्थ परस्पर सम्बद्ध होते हैं, कई असम्बद्ध होते हैं। कई अनुकूल सम्बन्ध- वाले, कई प्रतिकूल सम्बन्धवाले होते हैं। भौतिकवादी सम्मत-प्रपञ्चकी अप्रामाणिक एक सूत्रबद्धताकी अपेक्षा ईश्वर, काल, कर्म तथा भोक्तामें उसकी सम्बद्धता कहीं श्रेष्ठ है। घटनाओंके सम्बन्धमें भी यही बात कही जा सकती है । संसारमें कितने ही पदार्थ उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, उनकी परम्परासे भी परस्पर सम्बन्ध नहीं होता, फिर प्रत्येक पदार्थको परस्पर निर्भर कैसे कहा जा सकता