मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ मार्क्सवाद और रामराज्य है ? द्वन्द्वमात्रमें ही नहीं, किसी भी दर्शनमे किसी वस्तुको समझने, पहचाननेके लिये अपेक्षित अङ्गोपाङ्गका ज्ञान सम्पादित किया जाता है । किसी रोगको समझनेके लिये उसके निदान, आहार-विहार, देश-काल, साक्षात् या परम्परासे प्रभाव डालनेवाले पदार्थों तथा घटनाओपर विचार किया ही जाता है । इसी प्रकार सम्बन्धित सभी घटनाओके सम्बन्धमे विचार किया ही जाता है । प्रकृतिकी अविराम गति और प्राचीनका तिरोभाव, नवीनका आविर्भाव आदि कल्पनाएँ सांख्योकी ही हैं । इसी आविर्भाव-तिरोभावको निर्माण तथा ध्वंस कहा जा सकता है । अवश्य ही सांख्यके मतानुसार सत्का ही आविर्भाव-तिरोभाव होता है, अत्यन्त असत्का नहीं— नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । ( गीता २ । १६ ) यह कोई द्वन्द्वमानका नया दृष्टिकोण नहीं है । सभी विचारक किसी भी घटनामे आविर्भाव-तिरोभावके विचारको आदर देते हैं । जिसकी आयति (भविष्य) उत्तम होती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है । इसीलिये द्वितीयाके चन्द्रका वन्दन किया जाता है, क्योकि वह उत्तरोत्तर वर्धमान दशामें रहता है । आयतिशून्य पूर्णिमाका पूर्ण चन्द्र भी इतना माङ्गलिक नहीं माना जाता, क्योकि उसके अभ्युदयके दिन समाप्त हो चुके होते हैं, अब उसका उत्तरोत्तर ह्रास ही होनेवाला है—‘प्रतिपच्चन्द्रमिव प्रजाः’ । फिर भी यह नही कहा जा सकता कि जो ह्रासको प्राप्त हो रहा है, अब उसका विकास होगा ही नही । देखते ही हैं कि जिस चन्द्रमाका ह्रास होता है, उसीका पुनः विकास होता है । जिस समुद्रमे भाटा आता है, उसमें पुनः ज्वार आता है । अनेक बार मनुष्यकी रुग्णता और पुनः स्वस्थता होती है। माली हालतमे भी बिगाड, सुधार होता रहता है । पृथ्वी अनेक बार अनुर्वरा हो जाती है, उपज घट जाती है; पुनः उपचारसे उर्वरा बनायी जाती है । मार्क्स तथा लेनिनकी भविष्यवाणी थी कि ‘मजदूरोंद्वारा ही क्रान्ति होगी । किसान सामान्य पूँजीवादी भले ही संख्यामें अधिक हो और गरीब भी हों; तब भी वे कभी वर्धमान, विकासमान नहीं हैं, अतः उनकी कभी उन्नति होनेवाली नहीं।’ पर चीन और भारतमें ठीक इसके विपरीत हुआ, यहाँ किसानों, मध्यवर्गों, सामान्य उत्पादन साधनवालों अर्थात् साधारण पूँजीपतियो- द्वारा ही क्रान्ति हुई । इतना ही नहीं, भारतमें तो शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक आन्दोलनद्वारा पर्याप्त सफलता मिली है, जिसकी मार्क्सवादमे कल्पना भी नही हो सकती । परिवर्तनसम्बन्धी एजिल्सकी बात अध्यात्मवादीके लिये कोई नवीन वस्तु नहीं है । हाँ, आत्मा कूटस्थ होनेसे अपरिवर्तनशील है, वह सब परिवर्तनोका द्रष्टा