मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स-दर्शन ५२१ भी समझें, वास्तवमे वे क्रियासाधक होते हैं । अलेक्सिस कैरलका कहना है कि गणित भौतिक और रसविज्ञान आवश्यक विज्ञान है, परंतु चेतन द्रव्योंकी खोजमें मूल प्रारम्भिक विज्ञानोका स्थान इन्हें प्राप्त नहीं हो सकता । उसके अनुसार मानव-जातिके दुष्ट ओर पतित बडी संख्याके नियन्त्रण तथा मार्गदर्शनके लिये सात्त्विक आहार विहारद्वारा आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले तपस्वियोंकी एक अल्प संख्या बननी चाहिये—यह भारतीय ही सूझ है । अभी थोड़े ही दिन हुए डाक्टर लोकी यह बात इग्लैण्डकी विज्ञान- परिषद्में दुहरायी गयी है कि आधुनिक विज्ञानकी सबसे बडी खोज यह है कि 'अभी हमलोग कुछ भी नहीं जानते हैं।' फिर विज्ञानके बलपर मार्क्स, एजिल्सका सब कुछ जान सकनेका दावा करना निरादम्भ नहीं तो क्या है ? जहाँ अभीतक अहंतत्त्व और महत्तत्त्वतक, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—इन मात्राओको जाननेमें विज्ञान सफल नहीं हुआ है, फिर अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृतिकी बात तो दूरकी है । फिर 'अणोरणीयान्' आत्मा और परमात्माको वैज्ञानिकोकी यान्त्रिक कसौटीपर कसना केवल उपहासास्पद नहीं तो क्या है ? इसी प्रकार एजिल्स तथा मार्क्सका इतिहास महान् आर्ष इतिहासकी अपेक्षा एक विकृत अप्रामाणिक क्षुद्रतम इतिहास है, अतः इसके आधारपर संसारका स्वरूप निर्धारित नहीं हो सकता । डार्विनने स्वयं ही अपने लिये अनेक विषयोंको अज्ञेय माना है । उद्भिज्ज, पशु और मनुष्योंकी विकास कहानी स्वयं ही अप्रामाणिक है, फिर इसके द्वारा अतिभौतिकवादपर प्रचण्ड आघात आकाश- मुष्टिहननके तुल्य है । हेतुविशेषोंसे वस्तुओंका रूपान्तरण होता है, किंतु वह रूपान्तरण वस्त्वन्तरण नहीं है । बर्फ हो जानेपर भी वस्तु जल ही रहता है । इसी तरह भाप बन जानेपर भी जलका अभाव नहीं हो गया । 'नासतो विद्यते भावः' का निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर है । जैसे प्रसारित पट और संकुचित पटकी अवस्था-विशेष है, वैसे ही बर्फ और भाफ जलकी अवस्था-विशेष ही है । अन्य उदाहरण भी इस सिद्धान्तके विरोधी नहीं हैं । रसायनशास्त्रके उदाहरण भी उक्त सिद्धान्तके बाधक नहीं हैं । अम्लजनके तीन परमाणुओंसे ओजोन बनता है, उसका गुण अम्लजनसे भिन्न होता है । इसी तरह नैयायिकोंके अनुसार दो परमाणुओंके द्वयणुक बनते हैं, परंतु तीन परमाणुका कुछ भी नहीं बनता । छः परमाणुओंका त्रसरेणु बनता है, पाँचका कुछ नहीं । औषधोंकी मात्रा- भेदसे गुणभेद तो प्रसिद्ध ही है । पृथक् पृथक् ओषधियोंके गुणोंसे सम्मिलित ओषधियोंके गुणोंमें संसर्गजनित विशेषता होती है । एक मात्रासे पानी, अन्न या दुग्ध शरीरके पोषक होते हैं और वे ही दूसरी मात्रासे शरीरके नाशक बन जाते हैं । ऐसी बातोंको अतिभौतिकवादके विरुद्ध समझना नितान्त भ्रम है ।