भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५२२ मार्क्सवाद और रामराज्य वस्तुओ एव घटनाओमे अन्तर्विरोधकी कल्पना भी तत्त्वशून्य है । भावात्मक अभावात्मक यदि क्रमिक हों तो उनका विरोध कहा ही नही जा सकता, विरोध तो सम देश-कालमें उसी वस्तुके भावाभावका होता है । भूत और भविष्य आविर्भाव-तिरोभाव पुराने-नये—ये सभी भिन्नकालिक होनेसे विरोधी हैं ही नहीं। पिता-पितामहादि प्राचीन, पुत्र-पौत्रादि नवीन, अध्यापक प्राचीन, छात्र नवीन, इनमें विरोध नहीं है, किंतु उपकार्योपकारभाव है । मनुष्यकी बैठने, लेटने, चलने आदिमें कई ढंगकी अवस्थाएँ विकसित होती हैं, जो परस्पर एक दूसरेसे विलक्षण होती हैं । इसी तरह बीजके अवयवोंका बीज अङ्कुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा आदि अनेक अवस्थाएँ होती हैं, इनमें पूर्व- पूर्व अवस्था उत्तरोत्तर अवस्थाओंकी जननी है—सहायक है, विरोधकल्पना दुरभिसंधिपूर्ण है । सिर्फ वर्गविद्वेष, वर्गविध्वंसके वाले कारनामोंके समर्थनके लिये उसे दार्शनिकरूप देनेका प्रयत्न किया जाता है । जैसे पिता अपने उत्तराधिकारी पुत्रके जन्मके लिये प्रयत्नशील होता है, उसी प्रकार कारण भी अपने उत्तराधिकारी कार्यके जन्मके लिये अनुकूल होता है । राजा शिबि एवं दिलीपने तो स्वशरीर देकर भी कपोत तथा नन्दिनी गायकी रक्षाके लिये प्रयत्न किया था । यहाँ विरोध नहीं, किंतु उपकारकी भावना है । वस्तु स्थिति तो यह है कि विवर्धमान क्षीयमानका सहायक होता है, युवक वृद्धकी सेवासे अपनेको पुण्यात्मा मानता है, बलवान् निर्बलका, विद्वान् अविद्वान्का, धनवान् निर्धनका सहायक होता है—यही मानवता है । कहा जाता है कि 'द्वन्द्वमानके अनुसार निम्नस्तरसे ऊँचे स्तरपर विकासको हम साधारण पट-परिवर्तनके रूपमें नहीं देखते; बल्कि वस्तुओ और दृश्यगत घटनाओंमें वर्तमान विरोधके रूपमें तथा इन विरोधियोंकी बुनियादपर कायम दो विपरीत गतियोंके संघर्षके रूपमे देखते हैं । लेनिनके शब्दोंमें द्वन्द्वमान वस्तुओंकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है । लेनिनके ही शब्दोमे द्वन्द्वमान वस्तुओकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है, और विकास विरोधियोंके संघर्षका नाम है। द्वन्द्वमान प्रतिदिनके साधारण तर्कशास्त्रका स्थान नहीं ले सकता, जिस प्रकार बीजगणित या संख्यानुगणित अङ्कगणितका स्थान नहीं ले सकते । जिस प्रकार अङ्कगणितकी सीमाके बाहरकी समस्याओको हल करनेके लिये गणितकी उच्च शाखाओका प्रयोग किया जाता है, उदाहरणार्थ उन समस्याओका जिनमें अज्ञात और परिवर्तनीय परिमाण या संख्या और उनके सम्बन्धोका विचार होता है । उसी प्रकार द्वन्द्वमान गतिशील सम्बन्धो और क्रियाओका साधारण तर्कशास्त्रके दायरेमें लानेका साधन है; क्योकि साधारण तर्कशास्त्र