भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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रसायन-शास्त्रपर विचार करते हुए एजिल्स आगे चलकर कहता है—'रसायन- शास्त्रके विज्ञानका सार यह है कि वस्तुओंमे परिमाणात्मक परिवर्तनके फलस्वरूप उनके गुणोंमें परिवर्तन होता है। हीगेलको इसका ज्ञान था। अम्लजन, यदि इसके अणुमें दो न होकर तीन परमाणु हो, तो यह ओजोन बन जाता है जिसका गुण साधारण अम्लजनमे भिन्न है। आतिभौतिकवादके विरुद्ध द्वन्द्वमान यह समझता है कि सब वस्तुओंमें तथा द्रव्यगत घटनाओंमें अन्तर्विरोध वर्तमान है, क्योकि इनमें एक भावात्मक और दूसरा अभावात्मक कोण है। एक भूत तथा भविष्य है। इनमें कुछ विकास हो रहा है, परिमाणात्मक परिवर्तनोंकी गुणात्मक परिवर्तनोंमें परिणति हो रही है। विकास क्रियाकी भीतरी बात है इन विरोधियोंका संघर्ष, पुराने और नयेमें, जिसका विनाश हो रहा है और जन्म हो रहा है, उसमें, जो अदृश्य हो रहा है तथा जिसका विकास हो रहा है, उसमे।' आधुनिक विज्ञान कोई ऐसी चीज नहीं है, जो इदमित्थं सही हो और उसके आधारपर आत्मा, धर्म तथा ईश्वरकी समस्या हल की जा सके। उसके सम्बन्धमें कितने ही विभ्रम हैं। लार्ड केल्विनकी घोषणा थी कि वे ऐसा भाव समझनेमें असमर्थ थे, जिसको वे यन्त्र रचनामें परिणत न कर सकें। परन्तु अब तो केन्द्राकर्षण, काल और दिक्‌सम्बन्धी विचारतक बदल गये। गणित तथा पदार्थ-विज्ञानमे बहुत-से सिद्धान्त ऐसे हैं, जो परस्पर विरोधी है। उदाहरणार्थ पहले यूक्लिडके स्वतःसिद्ध नियम अनिवार्य विचार-तत्त्व माने जाते थे, परन्तु सालिवानके अनुसार अब वह पुरानी वस्तु हो गयी। उनका कहना है आजसे सौ वर्ष पूर्व लोवाशेफूस्की नामक रूसीने और बोलियाई नामक हंगेरियनने यह जान लिया था कि यूक्लिडका रेखागणित अविवेच्य आवश्यकताका स्थान नहीं ले सकता। दो हजार वर्षतक यूक्लिडके सिद्धान्तोंने निर्विरोध राज्य किया, सभी वैज्ञानिक उन्हें जितना मनुष्योंके लिये, उतना ही देवताओंके या ईश्वरके लिये भी आवश्यक मानते थे। उस समय लोवाशेफूस्की तथा बोलियायीको लोग विक्षिप्त कहते थे। महान् विद्वान् गौसतकको जो स्वयं इसे समझ चुका था, अपना आविष्कार प्रकाशित करनेका साहस न हो सका, परन्तु अन्तमे लोवाशेफूस्की आदिकी बात मान्य हुई। सालिवानके अनुसार 'आज जर्मन रेखागणितकार रीमानके रेखा