मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ मार्क्सवाद और रामराज्य बढ़कर प्रतिवाद खड़ा हो जाता है, तो कम्युनिज्म ही इसका अपवाद क्यों ? उसके भी तो विरोधी हैं ही, उनकी भी संख्या बढ़ती ही है । सिद्धान्ततस्तु— सर्वे क्षयान्ता निचया पतनान्ताः समुच्छ्रयाः । संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम् ॥ (वाल्मी० रा० अयोध्या० १०५ । १६) संसारके सभी संग्रहोंका एक दिन क्षय होता है, सभी उत्थानोंका एक दिन पतन होता है, सभी संयोगोंका एक दिन वियोग होता है और सभी जीवनोंका एक दिन मरण होता है । फिर कम्युनिष्ट-राज्यका कभी अन्त न होगा यह कल्पना भी अन्ध-विश्वास ही है । यदि सब पुरानी वस्तुओंका विनाश होता है, तो कभी कम्युनिष्टराज्य या वर्गविहीन-राज्य भी पुराना होगा और इसका भी विनाश, ध्वंस किंवा निर्वाण ध्रुव है । एञ्जिल्सके शब्दोंमें 'प्रकृति द्वन्द्वमानका परीक्षास्थल है । यह मानना पड़ेगा कि आधुनिक प्रकृति-विज्ञानने इसके प्रभूत उदाहरण दिये हैं, जो प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं और इस प्रकार यह प्रमाणित कर दिया है कि अन्तिम विश्लेषण करनेपर प्राकृतिक प्रक्रिया आतिभौतिक नहीं बल्कि द्वन्द्वात्मक है । अनन्तकालसे यह किसी चित्रगतिसे नहीं घूमती, बल्कि इसका एक इतिहास है । यहाँ डार्विनका नाम सर्वप्रथम है, जिसने यह प्रमाणित कर कि आजका सावयव संसार उद्भिजपशु और इस प्रकार मनुष्य भी कोटिशः वर्षोंकी विकास- क्रियाका परिणाम है, प्रकृतिकी आतिभौतिक कल्पनापर प्रचण्ड प्रहार किया । वह कहता है—'भूतविज्ञानमें प्रत्येक परिवर्तन परिणामका गुणमें परिवर्तन है । यह परिमाण किसी-न-किसी प्रकारकी गतिका परिमाण है, जो या तो वस्तुविशेषमें वर्तमान है या उसको दी जाती है । उदाहरणार्थ पानीके उत्तापको एक सीमातक बढ़ाते हुए उसकी द्रवावस्थापर कोई प्रभाव नहीं पड़ता । लेकिन ज्यों-ज्यों यह उत्ताप घटता या बढ़ता है, एक क्षण आता है, जब पानीकी अवस्था- में परिवर्तन होता है और एक दशामें यह भाप बन जाता है और दूसरी दशामें बर्फ । किसी प्लैटिनमके तारको गर्म करनेके लिये कि वह चमक सके एक निश्चित परिमाणकी बिजली आवश्यक है । हर खनिज पदार्थके गलनेका एक विशेष उत्ताप होता है । हर वायवीय पदार्थके लिये एक निश्चित बिन्दु है, जब कि उचित ठंडक और दबावके प्रयोगसे उसको तरल पदार्थमें परिणत किया जा सकता है । पदार्थ-विज्ञानमें जिनको स्थिरसंज्ञक माना जाता है, अधिकांश क्षेत्रमें वे ही बिन्दु हैं, जब गति या बिन्दुके ह्राससे वस्तुविशेषमें गुणात्मक परिवर्तन होता है । ऐसी स्थिर संज्ञाका उदाहरण है वह कोण, जिसपर आलोक रश्मि- का परिवर्तन होकर सीधा प्रतिफलन होता है ।'