भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५३२ मार्क्सवाद और रामराज्य अनित्य ही हैं । जिस वस्तुका प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव बन सकता है, उस वस्तुको निस्सीम कहना उपहासास्पद ही है । जैसे अनादि परमाणुकी श्यामता अग्निजन्य पाकसे नष्ट होती है, अग्निसे दग्ध होनेसे अनादि बीजाङ्कुरकी परम्परा टूट जाती है, उसी तरह विश्वप्रपञ्चकी परम्परा भी कालसे किंवा तत्त्वज्ञानसे टूट जाती है । मार्क्सवादी विश्वकी निस्सीमतामें प्रत्यक्ष-प्रमाण एव प्रत्यक्ष साधन-यन्त्रोंका प्रयोग वर्तमान कालके लिये जो भी करे, परंतु भविष्यके सम्बन्धमें तो प्रत्यक्ष या यन्त्र कथमपि सफल नहीं हो सकते । अनुमान कोई ऐसा निर्दोष नहीं है जिसने विश्वकी अनन्तता या निस्सीमता विदित हो सके । फिर क्रिया कोई भी चाहे वह प्रातिस्विक हो या सामूहिक, निःसीम नहीं कही जा सकती । मनुष्यद्वारा वस्तु, दृश्य, क्रिया इत्यादिके ज्ञानकी गहराईमें ले जानेकी तथा बाह्यावरणसे तत्त्वपर और कम गहराईके तत्त्वसे अधिक गहराईपर पहुँचनेकी असीम क्रियाकी बात भी कल्पना ही है । अतत्त्व अनात्मसम्बन्धी ज्ञान यद्यपि अल्पज्ञ जीवके लिये असीम ही है, फिर भी सर्वज्ञ ईश्वरके लिये वह भी निस्सीम नहीं । दूसरी दृष्टिमे ज्ञातरूपसे तथा अज्ञातरूपसे सभी वस्तु साक्षी भास्य है— ‘किञ्चिज्जानामि किञ्चिन्न जानामि’ अमुकको नहीं जानता हूँ, अमुकको जानता हूँ— इस रूपसे अज्ञानविषयतया या ज्ञानविषयतया सभी वस्तु साक्षीभास्य हैं । सर्वकारण सर्वाधिष्ठानरूपसे भी परम तत्त्वका ज्ञान अन्तिम ही तत्त्वज्ञान है । इसी ज्ञानके सम्बन्धमें गीताचार्यका कहना है— ' यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते । (७।२) जिसको जानकर पुनः अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रहता— एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ (१५।२०) इस तत्त्वको जानकर प्राणी बुद्धिमान् होता है और कृतकृत्य हो जाता है । उपनिषदे भी कहती हैं—आत्माके श्रवण, मनन, विज्ञानमें सबका श्रवण, मनन तथा विज्ञान हो जाता है— आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् । (बृहदा० उप० २।४।५) जैसे पृथ्वीके विज्ञानसे पार्थिवतत्त्व, जलके विज्ञानसे जलीयतत्त्व तरङ्ग आदिका विज्ञान हो जाता है, वैसे ही सर्वकारण सर्वाधिष्ठानके विज्ञानसे सब कुछ विज्ञात हो जाता है । सहयोगियोंका सहअस्तित्व तो सभी मानते हैं। विरोधियोंका भी सहअस्तित्व अगर मार्क्सवादको मान्य है, तब तो फिर मजदूर और मालिकका भी सहअस्तित्व