भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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हो ही सकता है। फिर मार्क्सवादी चूहा, बिल्लीके तुल्य वर्गोंका अमिट विरोध क्यो मानते हैं ? पारस्परिक सम्बन्ध तथा निर्भरताकी बात अच्छी है, पर स्वात्मनिर्भरताका भी महत्त्व नहीं भूलना चाहिये । परमुखापेक्षिता दोष भी है। अध्यात्मपक्ष माननेपर तो बाह्य साधनानपेक्षता बडे ही महत्त्वकी वस्तु है। उत्तरोत्तर ज्ञान, क्रिया, शक्तिका विकास हो रहा है, संसार उन्नतिके उच्च शिखरकी ओर बढ़ रहा है, इस विश्वासमें भी अन्धविश्वासका ही अंश अधिक है। स्तर भेद होनेपर भिन्नता ही कहना चाहिये, पुनरावृत्ति नहीं। प्रतिषेधके प्रतिषेधकी मार्क्सवादी मान्यता असङ्गत है, यह पीछे दिखाया जा चुका है। अङ्कुरके कारणभूत जौके दाने अङ्कुरके फलभूत जौके दानोंसे सर्वथा भिन्न हैं। यह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण नहीं हो सकता । इसका शुद्ध उदाहरण पीछे दिखलाया जा चुका है। “पन्द्रहवाँ सूत्र लेनिनका है—रूप और सार, आवार और आकारके अदर अस्तित्वका सघर्ष तथा इसका विपरीत। सोलहवाँ सूत्र है—परिमाणका गुणोंमें परिवर्तन तथा इसका विपरीत, व्याख्या और उदाहरण । जीवनका उदाहरण प्रकृतिके द्वन्द्वात्मक रूपपर स्पष्ट प्रकाश डालता है । अवयवके तथा कोषके जीवनमें जीवन और मृत्यु, आविर्भाव और तिरोभाव, अन्तर्ग्रहण तथा बहिर्मोचन, भूत और शक्तिको ये पास-पास ही मिलते हैं तथा परस्पर संश्लिष्ट रहते हैं । इसके अतिरिक्त पूँजीवादमे अन्तर्विरोधके तीन सूत्र हैं— १. प्रत्येक भिन्न फैक्टरीमें उत्पादनका सुचारुरूपसे संघटन होता है और सामाजिक उत्पादन क्षेत्रमें अराजकताकी चेष्टा की जाती है । २. एक ओर मशीनकी उत्पत्ति और उत्पादनका विस्तार प्रत्येक पूँजीवादी- के लिये बाध्यतामूलक नियम है, दूसरी ओर उद्योगकी रिजर्व सेनामें वृद्धि और सामयिक संकटका बार-बार होना, ये उत्पादनके सम्बन्ध पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धोंके विरुद्ध विद्रोह करते हैं । ३. सम्पूर्ण पूँजीवादी प्रथामें एक ओर पूँजी ही सम्पत्ति है और दूसरी ओर उद्योगमें पूँजीका प्रयोग किया जाता है यानी एक ओर बैंकमे एकत्रित पूँजी है और दूसरी ओर औद्योगिक पूँजी है। इस प्रभेदके उदाहरण हैं सूदजीवी, जिनकी जीविका है पूँजीपर सूदद्वारा और दूसरे जो अपनी जीविका पूँजीके व्यावहारिक प्रयोगसे अर्जन करते हैं । ( लेनिन ) “हर प्रथा या क्रियाके आन्तरिक विरोधोके रूप और गुण भिन्न होते हैं । सर्वहाराके अधिनायकत्वमे राष्ट्रका लोप भी विरोधका उदाहरण है, पर यही वर्ग-संघर्षके अन्तका कारण बन जाता है और इस प्रकार राष्ट्रका लोप होता है । आपेक्षिक और पूर्ण सत्य भी विरोधका उदाहरण है।