भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स-दर्शन ५३५ समुन्नत जीवनस्तर बनानेकी जिम्मेदारी मालिकोंपर होगी । व्यक्ति, समाज तथा सरकार—सभीका अनिवार्यरूपसे यह कर्तव्य होगा कि बेकारी तथा आर्थिक असन्तुलन सर्वथा दूर कर दिया जाय । विद्रोह भी प्रचारमूलक है, वास्तविक नहीं । वर्गसहयोगकी सम्भावनाका विस्तार होनेसे विद्रोहका अन्त हो सकता है । मशीनोंकी उत्पत्ति बाध्यतामूलक नहीं है, किंतु लोभमूलक ही है । अन्ततोगत्वा मनुके सिद्धान्तानुसार महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध भी आवश्यक होगा । जैसे विश्वका संहारकारक एवं अनिष्ठ- कारक होनेसे हाइड्रोजन बम आदिके विकासपर प्रतिबन्ध लगाना मार्क्सवादियोंको भी आज आवश्यक प्रतीत हो रहा है, उसी तरह बेकारी एवं संघर्ष तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका नाश होनेसे महायन्त्रोंपर भी प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक होगा । अर्थ तथा औद्योगिक पूँजीका आपसमें कार्यकारण भाव है । दोनोंका दोनों- से विस्तार होता है । उद्योगवृद्धिसे अर्थमें वृद्धि होती है । उससे उद्योगवृद्धिमें सहायता मिलती है । पूँजीपर सूद तो अब रूसमें भी मिलता है । पूँजी उत्पादन- साधन है, जैसे सब उत्पादनोंसे लाभ होता है, वैसे ही पूँजीसे भी सूदके रूपमें लाभ होना उचित ही है । फिर रामराज्यकी दृष्टिमें तो कुसीदवृद्धि निम्नकोटिका जीविका साधन माना जाता है । प्रवाहों एवं क्रियाओंमें अन्तर्विरोध अप्रामाणिक है । सर्वहाराके अधिनायकत्वमें राज्यलोपकी कल्पना तो अभी स्वप्न ही है । अभी तो सर्वहाराका अधिनायकत्व भीषण तानाशाही बन रहा है । सर्वहाराके अधिनायकत्वमें वर्गका लोप केवल डण्डेके बलपर प्रतीत होता है । वस्तुतः लेखन- भाषण, प्रेसकी स्वतन्त्रता न होनेसे वर्गभेद व्यक्त नहीं हो पाता । जब कभी अवकाश मिलेगा, वर्गभेद व्यक्त हो जायगा । मजदूर-किसान आदि समान वर्गोंमें भी परस्पर संघर्ष चलना ही है । सोवियत रूसमें भी कम्युनिस्टोंमें स्टालिन ट्राटस्की आदिका भीषण संघर्ष विख्यात है । आपेक्षिक एवं पूर्ण सत्यका भी विपर्यय होनेसे विरोध असङ्गत है । एक ही वस्तु आपेक्षित तथा पूर्ण सत्य नहीं हो सकती, यह कहा जा चुका है । व्यापकमें कोई विरोध नहीं है—जैसे पशुत्वका गोत्वसे, मनुष्यत्वका ब्राह्मणत्वसे कोई विरोध नहीं । इसी प्रकार सभी व्यापक-व्याप्योंमें अविरोध ही है । बुखारिनका यह कथन आंशिक सत्य है कि एक दूसरेके विरुद्ध भिन्न कार्यकारिणी शक्तियाँ पृथ्वीपर वर्तमान हैं । यह कहना उचित है कि विविध विश्वमें विरोधिनी तथा अनुरोधिनी अनेक प्रकारकी शक्तियाँ वर्तमान हैं । यदि विरोध ही जगत्का तत्त्व है, तब तो सहयोगमूलक कार्य ही नहीं होना चाहिये । किंतु वैर, प्रेम, सहयोग, विरोध—सभी संसारमें चलता है । सत्त्वादि गुण परस्पर