भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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५३६ मार्क्सवाद और रामराज्य विरोधी होनेपर भी विमर्दवैचित्र्य, परस्पर सहकारसे वे भी कार्यक्षम होते हैं। गुणोंकी विषमतासे गुणोंमे सहकार होता है, समतामें विरोध होता है। सारी सृष्टि गुणोंकी विषमता एवं सहकारके आधारपर ही टिकी है। परिणामी गुणोंका समता, विषमता—दोनो ही धर्म है। प्रलयानुगुण कर्मोंकी अपेक्षासे समता तथा सृष्टिके अनुगुण कर्मोंसे विषमता होती है। संसारमें प्रेम, परोपकार, सहयोग स्वाभाविक है; विरोध, ध्वंस निम्नगामिनी प्रवृत्तियोंके परिणाम तथा प्रामादिक हैं। वेदान्तकी दृष्टिसे सभी चराचर विश्व विशेषतः प्राणिवर्ग परमेश्वरकी ही संतान है—'अमृतस्य पुत्राः।' उनका तो समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ता ही मुख्य स्वभाव है। विरोध ही आवरणका कारण होता है, आवरण हटते ही विरोधका कहीं पता नहीं लगता—'उमा जे राम चरनरत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ॥' जो जगत्‌की स्वाभाविक मूलभूत स्वाभाविक स्थितिको पहचानते हैं, वे लोग सम्पूर्ण ससारको भगवद्रूप ही देखते हैं। फिर वे किससे विरोध करे ? स्वाभाविक स्थितिसे अविद्या, काम, कर्मद्वारा प्रच्युति होनेपर अविद्या स्वार्थ आदिके जागरूक होनेपर फिर विरोध-वैमनस्य चलता है। तभी 'जीवो जीवस्य जीवनम्' जीवसे ही जीवका जीवन चलता है—यह धर्म-प्रच्युतिमूलक मात्स्यन्याय फैलता है। स्पेन्सर आदिके संघर्षवादका अन्धानुकरण ही मार्क्सवादियोका अन्तर्विरोध है। इसके अनुसार जो प्रबल होगा उसीका जीवित रहना न्यायसिद्ध है। इसमें किसी गरीब कमजोरकी सहायता करना मूर्खता है। जो अपनेको बदली हुई परिस्थितिके अनुकूल नहीं बदल सकता, वही गरीब है। उसपर दया करना बेकार है। परंतु आजके परस्पर सहकार सहयोगके जमानेमें यह एक अत्यन्त उपहासास्पद वस्तु है। इसी तरह 'पुराने समीकरणका अन्त तथा नये समीकरणको नये आधारपर शक्तियोंके नये संयोगसे सृष्टि होती है'—यह कहना भी पिष्टपेषण ही है। अभ्युदयानुगुण परिवर्तनमें नये संयोगो या नये परिणामोंका अङ्गीकार सभीको सम्मत है ही। सामाजिक परिवर्तनोंका कारण ज्ञान, क्रिया, शक्तिका परिवर्तन ही है, और उनमें भी ज्ञान-शक्तिका विकास ही मुख्य है। भौगोलिक तथा वातावरणका परिवर्तन भी इन नये परिवर्तनोंमें कारण होते हैं। जो लोग उत्पादन-साधनोंके परिवर्तनोंके आधारपर ही सामाजिक परिवर्तन मानते हैं, उन्हें भी उत्पादन साधनोंके परिवर्तनका कारण ढूंढ़ना पड़ेगा और अन्ततोगत्वा बुद्धिपर ही आना पड़ेगा। बुद्धिमें कारण शिक्षण तथा अभ्यास ही होता है। आरम्भमें शिक्षण, अन्तमें अभ्यास और अन्वेषणके ही प्राखर्यसे बुद्धिका विकास होता है। बुद्धि- विकाससे धन-धान्य समृद्धिके कारण यन्त्रोंका भी विकास होता है और उसके