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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

५३६ मार्क्सवाद और रामराज्य विरोधी होनेपर भी विमर्दवैचित्र्य, परस्पर सहकारसे वे भी कार्यक्षम होते हैं। गुणोंकी विषमतासे गुणोंमे सहकार होता है, समतामें विरोध होता है। सारी सृष्टि गुणोंकी विषमता एवं सहकारके आधारपर ही टिकी है। परिणामी गुणोंका समता, विषमता—दोनो ही धर्म है। प्रलयानुगुण कर्मोंकी अपेक्षासे समता तथा सृष्टिके अनुगुण कर्मोंसे विषमता होती है। संसारमें प्रेम, परोपकार, सहयोग स्वाभाविक है; विरोध, ध्वंस निम्नगामिनी प्रवृत्तियोंके परिणाम तथा प्रामादिक हैं। वेदान्तकी दृष्टिसे सभी चराचर विश्व विशेषतः प्राणिवर्ग परमेश्वरकी ही संतान है—'अमृतस्य पुत्राः।' उनका तो समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ता ही मुख्य स्वभाव है। विरोध ही आवरणका कारण होता है, आवरण हटते ही विरोधका कहीं पता नहीं लगता—'उमा जे राम चरनरत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ॥' जो जगत्‌की स्वाभाविक मूलभूत स्वाभाविक स्थितिको पहचानते हैं, वे लोग सम्पूर्ण ससारको भगवद्रूप ही देखते हैं। फिर वे किससे विरोध करे ? स्वाभाविक स्थितिसे अविद्या, काम, कर्मद्वारा प्रच्युति होनेपर अविद्या स्वार्थ आदिके जागरूक होनेपर फिर विरोध-वैमनस्य चलता है। तभी 'जीवो जीवस्य जीवनम्' जीवसे ही जीवका जीवन चलता है—यह धर्म-प्रच्युतिमूलक मात्स्यन्याय फैलता है। स्पेन्सर आदिके संघर्षवादका अन्धानुकरण ही मार्क्सवादियोका अन्तर्विरोध है। इसके अनुसार जो प्रबल होगा उसीका जीवित रहना न्यायसिद्ध है। इसमें किसी गरीब कमजोरकी सहायता करना मूर्खता है। जो अपनेको बदली हुई परिस्थितिके अनुकूल नहीं बदल सकता, वही गरीब है। उसपर दया करना बेकार है। परंतु आजके परस्पर सहकार सहयोगके जमानेमें यह एक अत्यन्त उपहासास्पद वस्तु है। इसी तरह 'पुराने समीकरणका अन्त तथा नये समीकरणको नये आधारपर शक्तियोंके नये संयोगसे सृष्टि होती है'—यह कहना भी पिष्टपेषण ही है। अभ्युदयानुगुण परिवर्तनमें नये संयोगो या नये परिणामोंका अङ्गीकार सभीको सम्मत है ही। सामाजिक परिवर्तनोंका कारण ज्ञान, क्रिया, शक्तिका परिवर्तन ही है, और उनमें भी ज्ञान-शक्तिका विकास ही मुख्य है। भौगोलिक तथा वातावरणका परिवर्तन भी इन नये परिवर्तनोंमें कारण होते हैं। जो लोग उत्पादन-साधनोंके परिवर्तनोंके आधारपर ही सामाजिक परिवर्तन मानते हैं, उन्हें भी उत्पादन साधनोंके परिवर्तनका कारण ढूंढ़ना पड़ेगा और अन्ततोगत्वा बुद्धिपर ही आना पड़ेगा। बुद्धिमें कारण शिक्षण तथा अभ्यास ही होता है। आरम्भमें शिक्षण, अन्तमें अभ्यास और अन्वेषणके ही प्राखर्यसे बुद्धिका विकास होता है। बुद्धि- विकाससे धन-धान्य समृद्धिके कारण यन्त्रोंका भी विकास होता है और उसके

बिना भी आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक क्षेत्रमें विकास होता है, इसीलिये कल- कारखानोंके विकासके बिना भी प्राचीन भारतमें आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक विकास उच्चकोटिका हुआ था। यद्यपि महायन्त्रोंका विकास प्राचीनकालमें भी हुआ था, तथापि उसका दुष्परिणाम देखकर उसे उपपातक निश्चितकर उसपर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। फिर भी विशिष्ट शस्त्रास्त्र, विमान, रथ तथा शिल्पकलादिका विकास मय, विश्व- कर्माद्वारा होता ही रहा। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि भाप या बिजलीकी चक्की तथा कपड़ों, लोहों, ताम्रादिके बड़े-बड़े कल-कारखानोंके विकास बिना धार्मिक, सामाजिक विकास या कोई उन्नति नहीं होगी। वस्तुतः व्यापक इतिहासके महान् क्षेत्रमें सामन्तवाद और पूँजीवाद-जैसी प्रथाओंका कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। प्रमाद-पुरुषार्थ, सुव्यवस्था-दुर्व्यवस्थाके अनुकूल ही अनुकूल-प्रतिकूल परिवर्तन होते रहते हैं। मार्क्सवादियोंके सामने केवल कुछ शताब्दियोंका ही इतिहास है। यदि शताब्दियोंके इतिहासमें इतने परिवर्तन हुए हैं, तो सहस्राब्दियों एवं लक्षाब्दियोंके इतिहासमें क्या क्या परिवर्तन हुए होंगे, इसका भी तो विचार करना चाहिये। आस्तिकोंकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें ही नहीं, किंतु देवलोकके भी विकास तथा अभ्युदयकी पराकाष्ठा निर्धारित ही है, और परम उत्कर्ष कैवल्य—अपवर्गका भी स्वरूप निश्चित है। तैत्तिरीय, बृहदा- रण्यक, कौषीतकि आदि उपनिषदों, इतिहास, पुराणोंमें लौकिक-पारलौकिक उन्नति तथा परम निःश्रेयसके स्वरूप निर्धारित हैं। अन्तमें कहा गया है कि अचिन्त्य अनन्त स्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुका एक तुषारमात्र आनन्द ही अनन्त ब्रह्माण्डके धर्मिष्ठ सार्वभौम सम्राट्, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, कर्मदेव, आजानदेव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति, ब्रह्मादिके उत्तरोत्तर प्रकृष्ट आनन्दके रूपमें वितरित होता है। मनुष्यलोकके उत्कर्ष-अपकर्षकी कोई ऐसी अवस्था नहीं जो इन करोड़ों वर्षोंमें न आयी हो, अतः शताब्दियोंकी परिवर्तनपरम्परा कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है। गुण-परिवर्तन “पूँजीवादमें समाज और प्रकृतिका विरोध तो विद्यमान रहता है, लेकिन इस विरोधके विशिष्टरूपका निराकरण होता है भौगोलिक परिवेष्टनके गुणोंद्वारा नहीं; बल्कि पूँजीवादके विकासके मूल नियमोंके द्वारा। समाज अपने आन्तरिक नियमोंसे और अपनी उत्पादक-शक्तियोंके विकाससे हर विशेष सामाजिक संगठनोंके विशेष साधनोंद्वारा अपने भौगोलिक परिवेष्टनमें परिवर्तन करता है। जंगलोंकी कमी हो गयी है, पेड़ोंके लगाने और गिरानेपर नियन्त्रण रखा जाता है। कोयला काफी नहीं है, पेट्रोलियम उसके स्थानपर इस्तेमाल किया जाता है। चमड़ा, रेशम, ऊनकी कमी है, अतः ये कृत्रिम उपायोंसे बनाये जाते हैं।

हवामें नमीकी कमी है, आवपाशीसे काम लिया जाता है । पशु और वनस्पति जगत्से नये रूपमे प्राप्त होते हैं, क्योकि इनके नये किस्मकी सृष्टि होती रहती है । यदि इतना होते हुए भी पूँजीवादी समाजमे प्राकृतिक परिवर्तन इतना सीमित है तो इसका कारण प्रकृति और समाजके विरोधमें नहीं मिलेगा, बल्कि पूँजीवादी उत्पादक सम्बन्धोमें मिलेगा जो उत्पादक-शक्तियोका पूरा-पूरा विकास नहीं होने देता । समाजवादमें ही यह प्राकृतिक परिवर्तन पूर्णरूपमें सम्भव है, जिसमे मुनाफ़ाके लिये नहीं, उपभोगके लिये पदार्थ बनाये जाते हैं। "किसी वस्तुकी मूल गति ही उसके गुणका निर्देश करती है। भूत अपनी गतिसे ही असख्य गुणोकी सृष्टि करता है । मनुष्य, सामान्य जीवनकोष, जड पदार्थ—सभी एक ही भौतिक विकासकी चढती सीढ़ीके कदम हैं और ये कदम भिन्न गुणसम्पन्न हैं । प्रत्येक गतिमें यान्त्रिक गति सम्मिलित है और इसके कारण भूत कणोंकी सजावटमे भिन्नता आ जाती है । इन यान्त्रिक गतियोको समझना विज्ञानका पहला काम है; लेकिन यह केवल पहला ही कदम है। यान्त्रिक गतिसे व्यापक गतिका अन्त नहीं हो जाता । गति केवल स्थान- परिवर्तनमात्र नहीं है। यन्त्र-राज्यसे ऊपर यह गुणका भी परिवर्तन है। यान्त्रिक गति हर उच्च प्रकारकी गतिका एक आवश्यक अङ्ग है, यद्यपि यह गतिके और गुणोंकी भी सृष्टि करती है। रासायनिक क्रियाके साथ उत्ताप और वैद्युतिक परिवर्तनका निरन्तर संयोग है । सावयव जीवन बिना यान्त्रिक, कणिक, रासायनिक उत्ताप और बिजली सम्बन्धी परिवर्तनोके असम्भव है । लेकिन प्रत्येक क्षेत्रोमें इन समवर्तमान रूपोसे मूलरूपके तत्त्वका भडार चुक नहीं जाता । "इसमें कोई सदेह नही कि विशिष्ट गुणसम्पन्न भूतकी नयी अवस्थाका आविष्कार गतिके एक नये प्रकारका आविष्कार होगा । परिणामकी वृद्धिसे वस्तुविशेषका गुण अपने विपरीतमें परिवर्तित हो जाता है। जैसे, निर्विरोध प्रतियोगिता पूँजीवादका और साधारणतः पण्य-उत्पादनका मौलिक गुण है। एकाधिकार इसका ठीक उल्टा है । लेकिन हम अपनी आँखके सामने प्रतियोगिताको एकाधिकारमें रूपान्तरित होते देख रहे हैं, जिससे बड़े पैमानेपर उत्पादनकी सृष्टि होकर छोटी फैक्टरियाँ दबती जा रही हैं और उत्पादन बड़े-से-बड़े पैमानेपर होकर अन्तमें पूँजी और उत्पादनका इस प्रकार एकत्रीकरण हो जाता है कि इसका परिणाम एकाधिकार हो जाता है।" (लेनिनका साम्राज्यवाद) वस्तुतः समाज और प्रकृतिमें विरोध नहीं होता, क्योकि प्रकृतिद्वारा समाजका विकास एवं उपोद्वलन होता है; प्रकृतिसे ही सम्पूर्ण प्रकारकी सुविधा

प्राप्त होती है। समाजद्वारा उपयोग करते-करते जो प्राकृतिक वस्तुओंकी कमी होती है, इसे विरोध नहीं कहा जा सकता। पृथ्वीसे घटादिका निर्माण होता है, मृत्तिकाका उपयोग होता है, फिर भी घटादि कार्य प्रकृतिविरोधी नहीं समझे जाते। कारणसे कार्यकी उत्पत्ति होती है, किंचित् कारणांशका उसमें उपक्षय भी होता है। माता-पितासे सन्तानोंकी उत्पत्ति होती है, वहाँ भी किंचित् उपक्षय होता है, तथापि यहाँ विरोध नहीं समझा जाता । जंगलोंकी कमी रोकनेके लिये पेड लगाना तथा गिरानेपर नियन्त्रण करना, कोयलेकी कमी होनेपर पेट्रोलियमका प्रयोग आदि समाज अपना काम चलानेके लिये करता है, इसे विरोध-निराकरण नहीं कहा जा सकता। अन्ततः प्राकृतिक परिवर्तनोंसे उन-उन कमियोंकी पूर्ति होती है, जैसे खेतोंकी उर्वराशक्ति अधिक फसल उपजानेसे नष्ट हो जाती है, तदर्थ कृत्रिम खाद डालने आदि उपायोंसे उर्वरा शक्ति बढ़ायी जाती है। परन्तु कुछ समय तक फसल न उपजानेसे या बाढ आदि प्राकृतिक परिवर्तनसे पुनः उर्वरा शक्तिकी वृद्धि हो जाती है। इसी तरह अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, महामारी, युद्ध, खण्ड प्रलयादि द्वारा प्राकृतिक परिवर्तन होता है। कालक्रमसे कितने ही अरण्यनगर तथा नगर अरण्य हो जाते हैं। इन परिवर्तनोंकी दृष्टिमें शताब्दि तथा सहस्राब्दिका काल अत्यल्प है। पशुओं तथा वनस्पतियोंके कृत्रिम कलम एव नस्ल सुधारद्वारा नया रूप प्राप्त होता है, यह मनुष्यकी कृतिकी विशेषता है। इसमें भी प्रकृतिके सहयोगसे ही काम चलता है। वस्तुतः ईश्वरका अंश ही जीव है । ईश्वरकी ज्ञान-क्रिया- शक्तिका ही अंश जीवकी ज्ञान-क्रिया-शक्ति है, इसीलिये ईश्वरके तुल्य अनेक वस्तुओं- की निर्माणशक्ति मनुष्य आदि जीवोंमें भी उपलब्ध होती है। इस तरह प्राकृतिक वस्तुओंके कमी होनेपर मनुष्य प्राकृतिक वस्तुओंके सहारे प्रकारान्तरसे कमी पूरी करनेका प्रयत्न करता है। उत्पादक-शक्तियोंके विकासके मूलमें समाजवाद या पूँजीवाद नहीं है। किंतु आवश्यकताकी अनुभूति तथा तदनुकूल प्रयत्नपरायणता ही है। इसीलिये वेदों, पुराणोंसे विदित होता है कि आध्यात्मिक धार्मिक विस्तारके समय भी उत्पादक- शक्तियोंका पर्याप्त विकास था। फिर भी बेकारी आदिका कारण होनेसे उसे अधिक सार्वजनिक रूप नहीं दिया गया । आज भी समाजवादी रूसकी अपेक्षा पूँजीवादी अमेरिकामें उत्पादक-शक्तियोंका कम विकास नहीं कहा जा सकता। समाजके उपभोगको ही लक्ष्य बनाकर उत्पादन साधनोंका विकास रामराज्यप्रणालीमें मान्य होता है, किंतु उससे मुनाफा आनुषङ्गिक रूपमें ही प्राप्त होता है । उपभोग- से अधिक माल बननेसे मालकी खपतमें कमी होनेसे सुतरा उद्योगपतियोंकी अन्य अपेक्षित वस्तुओंके उत्पादनमें प्रवृत्ति स्वाभाविक है।

भूतोंकी स्वयं गति असिद्ध है। अचेतनकी प्रवृत्ति चेतनसे ही अधिष्ठित होती है। सत्त्व, रज आदि गुण; वायु, तेज, जल आदि भूतोंकी स्वयं गति निर्विवाद नहीं है । चेतनाधिष्ठित भूतोंकी गतिका भी गुणात्मक परिणाम सीमित है; निस्सीम नहीं । इसीलिये तैजस परिणाम चक्षुसे ही रूपका दर्शन होता है, पार्थिव घ्राणेन्द्रियसे नहीं । इसीलिये भूतोंका गुणात्मक परिणाम होनेपर भी भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं होती है। जैसे पटात्मक परिणामके लिये तन्तुमें ही शक्ति है, वायुमें नहीं। तिलसे ही तेल होता है, बालूसे नहीं। उसी तरह जड भूतोंका शब्दादि गुण-परिणाम सम्भव है, किंतु चैतन्यभूतोंका परिणाम नहीं सिद्ध होता । भले ही भूत तथा भौतिक देह, दिमाग, मस्तिष्क आदिके होनेपर ही चैतन्यका उपलम्भ होता है, तथापि इतने मात्रसे चैतन्य भूतका धर्म नहीं सिद्ध हो सकता क्योकि यदि अन्वयमात्रसे ही गुण-धर्मनिर्णय हो तब तो आकाशके रहनेपर भी सब कार्य होते हैं, फिर तो गन्धादि भी आकाशके धर्म समझे जाने चाहिये । अतः अन्वय-व्यतिरेक—दोनोके घटनेपर ही कारण-कार्य-भाव या धर्म-धर्मीभावका निर्णय होता है । प्रस्तुत प्रसङ्ग में अन्वय व्यभिचरित है । घटादिमें एव मृत शरीरमें भूत रहता है, किंतु वहाँ चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता। ‘विशिष्ट अवस्थायुक्त अन्नसे मदशक्तिकी तरह विशिष्ट अवस्थावाले भूतोंसे ही चैतन्यकी उत्पत्ति होती है’, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि अन्नमें मदशक्ति पहले भी रहती है। यह अनशनके पश्चात् अन्न लेनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि बालूमें तेलकी तरह वह पहले न हो तो किसी भी अवस्थामें उसका प्राकट्य नहीं हो सकता । भूतोंमें चैतन्यका अस्तित्व होता तो अवश्य ही वह घटादिमें भी उपलब्ध होता। व्यतिरेक तो सर्वथा ही संदिग्ध रहता है। भूतोंके न रहनेपर चैतन्य रहता ही नहीं, इसीलिये अनुपलम्भ है, अथवा रहता हुआ भी अभिव्यञ्जक भूत न होनेसे अनुपलम्भ होता है ? सुस्पष्ट है कि लोहा, लक्कड़, तार आदि पार्थिव जलीय पदार्थ अग्निके अभिव्यञ्जक हैं । अतएव उनके न रहनेपर अग्निके रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती । इसी तरह देह, दिल, दिमाग आदि आत्मचैतन्यके व्यञ्जक हैं; अतएव उनके न रहनेपर आत्मचैतन्यकी रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती । भूतोंकी यान्त्रिक गति और व्यापक गतिमें वास्तविक भेद नहीं है । व्यष्टि चेतन मनुष्यादिद्वारा यान्त्रिक गति बनती है । समष्टि ईश्वर चेतनद्वारा व्यापक गति बनती है । सर्वथापि चेतनके बिना भूत या गुण किसीकी स्वाभाविक गति नहीं हो सकती । गुणात्मक परिवर्तन भी यन्त्र-राज्यके बहिर्भूत नहीं है । तन्तुसे पट, जलसे बर्फ या भाप आदिका निर्माण यान्त्रिक गतिसे सम्पन्न होता ही है । वस्तुतः प्रत्यक्षानुमानद्वारा विदित भूत ही प्रकृति नहीं है । किंतु प्रत्यक्षानुमानसे अज्ञात

मार्क्स-दर्शन ५४१ अपौरुषेय तथा आर्षशास्त्रोमे विज्ञात भूत एवं उससे भी अधिक उच्च स्तरकी सत्त्व, रज, तम आदिकी साम्यावस्थारूप प्रकृति अत्यधिक सूक्ष्म है और उसका भण्डार सचमुच अखण्ड है । उसीसे सब कमियोकी पूर्ति होती रहती है । उसी कारण धरतीसे अगणित अपरिमित अन्नोंके उपजानेपर भी उसका भण्डार नहीं टूटता । उत्ताप एव वैद्युतिक परिवर्तन सबही यान्त्रिक गतिपूर्वक ही है । यह जैसे मान्य है, वैसे ही अन्य परिवर्तनोंमें भी ईश्वरीय या मानवीय यान्त्रिक गति ही काम देती है । इसीलिये विशिष्ट गुणसम्पन्न भूतकी प्रत्येक अवस्था चेतनद्वारा ही आविष्कृत होती है । विपरीत गुणमे परिवर्तन भी यान्त्रिक गतिका ही परिणाम है । निर्विरोध प्रतियोगिता या एकाधिकार अपनी अपनी सीमामें गुण है । राम- राज्य-प्रणालीमें जहाँ विकासके लिये प्रतियोगिता गुण है वहाँ वह निःसीम भी नहीं है । इसीलिये तो महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध आवश्यक समझा गया है । [ प्रतियोगितापर भी नियन्त्रण अपेक्षित माना गया है, उत्पादनके केन्द्रीयकरणकी अपेक्षा विकेन्द्रीकरणको रामराज्य-प्रणाली अधिक महत्त्व देती है, परंतु समाज- वादमें उलटा महायन्त्रोंका अधिकाधिक विकास करके छोटी फैक्टरियोंका अस्तित्व सर्वथा ही समाप्त कर दिया जाता है । समाजवादियोका फैसला तो बन्दरबाँटका फैसला है । मजदूरों तथा छोटी फैक्टरियोंका पक्ष लेकर मिलमालिको एवं बड़े- बड़े कल कारखानोंको भला-बुरा कहते-कहते बड़े-छोटे सब कारखानो, मालिक- मजदूर, किसान, जमींदार सभी भूमि-सम्पत्ति, उद्योग धंधेको राष्ट्रीयकरणके नाम- पर छीन लेते हैं । समाजवादी समाजके नामपर ऐसा भीषण तानाशाही एकाधि- कार स्थापित करते हैं कि सबकी भूमि, सम्पत्ति, कल, कारखानोको छीनकर लेखन, भाषणकी स्वतन्त्रता छीनकर सभीको परतन्त्रताके बन्धनोंमें जकड़ देते हैं । कहा जाता है कि "गुणसे परिणामके परिवर्तनका साधारण उदाहरण है अच्छा बीज, जिसके बोनेसे उपजका परिमाण बहुत बढ़ जाता है । इसी तरह रूसकी सामूहिक खेती इसका दूसरा उदाहरण है जिसके कारण भी उपजका परिमाण बहुत बढ़ जाता है । लेवीने गुणपरिवर्तनके सम्बन्धमें वस्तुओको दो श्रेणियोंमें विभक्त किया है । कणिक ( वैयक्तिक, आटोमैटिक ) तथा सामूहिक ( स्टैटिस्टिकल ) [L2

५४२ मार्क्सवाद और रामराज्य उदाहरण १ ( क ) मनुष्यकी बाल्यावस्थासे वृद्धावस्था । ( ख ) खनिज पदार्थ—प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक वस्तुके रूपमें । ( ग ) जमीनका टुकड़ा जिसका व्यावहारिक मूल्य सामाजिक विकासके कारण बढ़ गया हो । २ आस्ट्रेलियामें भेजा गया खरगोशका पहला जोड़ा, जहाँ अब उनका ढेर एक उत्पात बन गया है । ३ एक धूपका 'दिन', बहुत-से धूपके दिन सूखा । ४ इसमे सभी वे उदाहरण हैं जिनमें समूह टूटकर अलग-अलग हो जाते हैं, जैसे एक परिवारका टूटना । “परिवर्तनकी कल्पनाके लिये ये उदाहरण सहायक हैं, लेकिन यह ध्यान रहे कि ये सभी उदाहरण द्वन्द्वात्मक परिवर्तनके उदाहरण नहीं । इसी प्रकार लेवीने उद्भिज्जराज्यके दो उदाहरण दिये हैं । १—जंगलमे सोतोके पास एक प्रकारकी काई जमती है स्फैगमनसास, जो धीरे-धीरे जंगलको उजाड़ देती है । २—एक झील है। उसकी तहपर उद्भिज्ज सड़ते रहते हैं । तह ऊपरको उठती है और उसकी सतहपर लता तैरने लगती है । झील दलदल बन जाती है । लताओंकी जड़े जमकर धीरे-धीरे घासका मैदान बन जाती है । हवाके झोकोसे बीज उड़कर लगनेसे पेड़ पोदे जम जाते हैं, फिर एक जंगल बन जाता है ।” अच्छे बीजसे, अच्छे खेतसे, अच्छी खादसे भी, उपजके परिमाणका बढ़ना सर्वसम्मत है, परंतु यहाँ भी बीजादिकी अच्छाई रूप, गुणसे उपजका विस्तार होता है । यहाँ गुणका परिमाणके रूपसे परिवर्तन नहीं कहा जा सकता । गुण गुण ही रहता है, वह गुण रहकर ही उपजके परिमाणकी वृद्धिका कारण बनता है । दूसरी दृष्टिसे बीजादिकी अच्छाईसे उपजकी अच्छाई होती है, उपजकी अच्छाईके स्वरूपमें ही वस्तुकी अच्छाई और संख्यावृद्धि आ जाती है । लेवीके गुण-परिवर्तनके कणिकसे कणिकका उदाहरण भी कोई चीज नहीं है । मनुष्यकी बाल्यावस्था मे वृद्धावस्था, खनिज पदार्थोंका प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक अवस्थाके रूपमें परिवर्तन होना, सामाजिक विकासके कारण भूमिके टुकड़ेका व्यावहारिक मूल्य बढ़ जाना आदिका षड्भाव-विकारमे अन्तर्भाव हो जाता है । बाल्यावस्था मे वृद्धावस्थाका परिवर्तन, वृद्धि और विपरिणामके भीतर ही है । दूसरा उदाहरण भी इसी तरहका है । तीसरा उदाहरण तो माँगपूर्तिके सिद्धान्तानुसार माँग बढ़ जानेसे मूल्य बढ़ जाना है ।

Here is the complete, faithful line-by-line transcription of the Hindi text from the image:

मार्क्स-दर्शन ५४३ आस्ट्रेलियाके खरगोशके जोड़ेसे बहुत-से खरगोशोंका उत्पन्न हो जाना भी कौन-सी नयी बात है ? अनुकूल परिस्थिति मिलनेसे कुत्ते, शूकर, मुर्गे आदि किसी भी जोड़ेसे सामूहिक विस्तार होता है । कणिकसे सामूहिक परिवर्तनका उदाहरण भी इसी ढंगका है । 'एक धूपका दिन साधारण है, परंतु वही परिमाण- की वृद्धिसे होकर बहुत सा धूपका दिन सूखा बन जाता है,' यह भी कोई चमत्कृति नहीं है । दीपक आदिरूपमें छोटी अग्नि वायुसे बुझ जाती है, बड़ी अग्निका वायु सहायक बन जाता है । मृदु आतप रोचक होता है, तीव्र हो जानेपर वही उद्वेजक हो जाता है । अग्निका एक सीमाका सन्निधान अनुकूल होता है, अन्य प्रकारका सन्निधान मारक हो जाता है । सामूहिकसे कणिकका उदाहरण, समूह टूटकर अलग- अलग हो जाना, परिवार टूटकर पृथक्-पृथक् हो जाना आदि भी किसी सिद्धान्तका साधक नहीं है । विभाजनसे समूहका विशरण होना प्रसिद्ध है । इसी प्रकार लेवीका जगलकी काईसे जगलके उजड

५३४ मार्क्सवाद और रामराज्य "सम्बन्ध की चेतना ही ज्ञान है, विशेषकर वस्तु-जगत्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत (दृष्टिगत वस्तु, कल्पनाएँ आदि) अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध तथा इन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है। एक और दृष्टिकोणसे व्यावहारिक अर्थमें विचार वस्तु-जगत्को ठीक-ठीक प्रतिफलित और प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। भौतिकवादने प्रकृतिकों क्रियाशील रूपमें माना और विचारको अक्रिय रूपमें, जिसका केवलमात्र काम था इन्द्रियग्राह्य वस्तुओंको ग्रहण करना तथा उसपर मन्थन करना। यह कान्ट और कान्टके पश्चात्के आदर्शवादी थे जिन्होंने मननशक्तिकी रचनात्मक क्रियापर जोर दिया, लेकिन इतना अधिक जोर दिया कि उसको बेहिसाब बढ़ा-चढ़ा दिया। "अंग्रेजी और फ्रांसीसी भौतिकवादने उस मूक स्वीकृतिसे आरम्भ किया कि विचारकी वस्तु (विचारका कर्म) का अस्तित्व विचारकर्ताके अस्तित्वसे पहले है और विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त करता है। लेकिन वह इससे आगे न बढ़ सके। हमास् हवम् ने इस मतको इन शब्दोंमें रखा है। 'मनुष्यके विचारके सम्बन्ध- में, अलग-अलग रूपमें इनमेंसे प्रत्येक वस्तु, हमारे शरीर और मनके बाहर किसी वस्तुके किसी गुणका प्रतीक या प्रतिनिधि है, जो वस्तुकी मनुष्यकी इन्द्रियों- पर अपनी क्रियाकी विचित्रतामे विविध दृश्योंकी सृष्टि करती है (लिवायथन)। यह प्रश्न भौतिकवादियोंके सामने इस रूपमें था कि इस ज्ञानकी उत्पत्ति इन्द्रियग्राह्य रूपोंके मूल उद्गमस्थानसे होकर एक विशेषशक्ति प्रज्ञाद्वारा होती है, लेकिन यह विशेषशक्ति क्या है, यही एक झगड़ेका विषय हो गया। आदर्शवादी इस मतका पोषण करते थे कि यह 'प्रज्ञा' धर्मपण्डितोंकी आत्मा ही है जो एक अतिप्राकृतिक शक्ति है, जो इन्द्रियानुभूत मायावी रूपोंको परम और अनन्त सत्य- में परिणत करती है। भौतिकवादी इस मतके लिये झगड़ते रहे कि यह 'प्रज्ञा' कितनी ही रहस्यमयी हो, फिर भी यह प्राकृतिक ही है। प्रसिद्ध लेखक आनातोल फ्रांसने परिस्थितिको इस तरह चित्रित किया है 'मठकी दीवारके नीचे जहाँ छोटे बच्चे अपना खेल खेल रहे थे, हमारे साधुमित्र वहाँ एक और खेल खेल रहे थे जो उतना ही व्यर्थ था, लेकिन मै वहाँ जा मिला क्योंकि समय बिताना ही चाहिये। हमारा खेल शब्दोंका खेल था जो हमारे गूढ़ मगज लेकिन सूक्ष्म दिमागके लिये सुखकर था, एक विचारशैलीको दूसरी विचारशैलीके विरुद्ध उभारनेवाला था और उसने सारे ईसाई समाजमें हलचल मचा दी। हम दो विरोधी दलोंमें बँट गये। एक दलका कहना था कि सेबों (फल) के पहले सेव

जाति थी, केलोंके पहले केला जाति थी, भ्रष्टचरित्र और लालची साधुओंके पहले साधु जाति, लालच तथा भ्रष्टचरित्रता थी ही। पीठपर लात जमानेके लिये लात और पीठसे पहले पीठ जमानेवाला लात सदासे ईश्वरके अन्तःस्थलमें विद्यमान था।' और दूसरे दलने उत्तर दिया कि 'नहीं, नेत्रोंसे ही सेव जातिकी धारणा होती है, केलोंसे ही केला जातिका अस्तित्व है। साधुओंसे ही साधु जाति, लालच तथा भ्रष्ट- चरित्रता की उत्पत्ति है। लात जमाने और खानेके बाद ही पीठपर लातका कोई अर्थ होता है। बस खिलाड़ी गरम हो गये और घूंसा चलने लगा। मैं दूसरे दलका पृष्ठ पोषक था, क्योंकि उसका मत मेरे लिये बुद्धिग्राह्य था और सोवासियोंकी बैठकने इस मनको अग्राह्य बनाया ( रिवोल्ट आफ ऐजिल्स ) ।' "प्रज्ञावादी दृष्टिकोणसे वैज्ञानिक ज्ञानका चिह्न है इसके प्रतिपाद्योंकी व्यापकता और अवश्यम्भाविता । व्यापकताका अर्थ है कि सिद्धान्तका प्रयोग बिना व्यतिक्रमके हमारे सब अनुभवोंपर हो सके और अवश्यम्भाविताका अर्थ है कि सब मनुष्योंकी बुद्धि ऐसे सत्यको ग्रहण करनेके लिये उनको बाध्य करे । लेकिन प्रज्ञावादीको कार्यकारण-सम्बन्धोंका एक सूत्रबद्ध सिलसिला कहाँसे मिल जाता है, जो उनके अनुसार वस्तुओंके भ्रमपूर्ण चित्रोंके मूलमें है ? इन विचारोंके स्पष्ट और स्वयं सिद्ध तथा तर्कसङ्गत होनेसे ही ऐसा क्यों अनुमान किया जाय कि ये बाहरी दुनियाकी सच्ची तस्वीरें हैं ? लेनिनके शब्दोंमें इस रहस्यका इस प्रकार उद्घाटन हो जाता है । करोड़ों बार दुहरानेसे मनुष्यके अभ्यास और अनुभव चेतनामें तर्क सकेनका रूप धारण कर लेते हैं । तथाकथित तर्कसङ्गत विचारके सार्वभौमरूपोंका ऐतिहासिक आधार यही है।" वस्तुतः यह परिभाषा अन्योन्याश्रय-दोषसे युक्त है । ज्ञानका निश्चय होनेपर ही ज्ञान-सम्बन्धका निश्चय होगा और ज्ञान-सम्बन्ध निश्चय होनेसे ज्ञानका निश्चय होगा। साथ ही ज्ञान और चेतना-दोनों एक ही वस्तु हैं, फिर 'ज्ञान-सम्बन्धोंकी चेतना ज्ञान है,' इसका यह अर्थ हुआ कि ज्ञान-सम्बन्धोंका ज्ञान ही ज्ञान है। इस तरह आत्माश्रय दोष भी है। जबतक ज्ञान नहीं विदित है तब- तक ज्ञान-सम्बन्धोंका भी ज्ञान कैसे होगा ? इसी प्रकार 'वस्तुविषयक, आत्म- विषयक तथा जीवधारी मनुष्यके रूप और बाहरी दुनियाके चेतनाको ज्ञान कहते हैं', यह परिभाषा भी अपूर्ण है। क्योंकि ज्ञान और चेतना दोनों एक ही वस्तु हैं। फिर 'ज्ञानके लक्षणकी जिज्ञासा अमुक सम्बन्धकी चेतना ज्ञान है', इतना कह देनेसे वह कैसे पूर्ण होगी ? इसके अतिरिक्त सम्बन्ध-चेतना यदि ज्ञान है तो प्रश्न होगा कि वस्तु-चेतना ज्ञान है या नहीं ? सम्बन्ध चेतना ही वस्तुकी चेतना है, यह कहना भी असङ्गत है, क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धीसे भिन्न ही होता है। मा० रा० ३५—

५४६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव सम्बन्ध-सम्बन्धीका आधाराधेय भाव होता है। जैसे घट-ज्ञान पट-ज्ञान- का लक्षण नहीं होता, उसी तरह वस्तु-सम्बन्ध-ज्ञान वस्तु-ज्ञानका लक्षण नहीं हो सकता। इसी प्रकार बाहरी दुनियाके व्यापक और विशिष्ट तफसीलोंके बीचका सम्बन्ध भी ज्ञान नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अर्थात् दो सम्बन्धि- योंमें रहता है, जैसे संयोग। जिन दो वस्तुओंका संयोग होता है, उन दोनोंमें ही सम्बन्ध रहता है। ज्ञान आत्मामें ही रहता है। इसके अतिरिक्त सम्बन्ध स्वयं ही ज्ञेय पदार्थ है, उसका भी ज्ञान होता है, फिर वह स्वयं ही ज्ञान कैसे हो जायगा ? इसी तरह 'दृष्टिभूत वस्तु तथा उसकी कल्पनाके बीचका सम्बन्ध जिसमे और जिसके द्वारा हम अस्तित्वका अनुभव करते हैं वह ज्ञान है', यह भी कहना गलत है। क्योंकि अनुभव भी तो ज्ञान ही है। चेतना, अनुभव, ज्ञान आदि पर्यायवाची शब्द हैं। उसी वस्तुका लक्षण करनेमें उसीका उपयोग होना अयुक्त है। 'अपने और बाहरी दुनियाके बीच समता और प्रभेद दोनोंका जिन दृष्टिभूत वस्तुओं और उनकी कल्पनाओंमें अनु- भव करते हैं वह ज्ञान है', यह भी कहना अपर्याप्त है, क्योंकि दृष्टि और उनकी कल्पनाओंका भी अन्तर्भाव ज्ञानमें ही है। अतः जबतक ज्ञान या अनुभव या चेतनाका स्पष्ट लक्षण न हो जाय तबतक इन वाक्याडम्बरोंसे काम नहीं चल सकता। इसी तरह 'मनन-क्रियाकी भीतरी दुनियामें विचित्र प्रकार एवं परिमाणकी समता और प्रभेदका मान चित्रमें चित्रित कर सकना और इन सबको सम अस्तित्व और अनुवर्त्तनक्रिया, प्रतिक्रिया, परस्परक्रिया और कार्य-कारण निर्भरताके उचित सम्बन्धोंमें सजाने तथा व्यवस्थित करनेका नाम ही ज्ञान है', यह कथन भी शब्दा- डम्बरको छोड़कर कुछ नहीं है। वस्तुतः कल्पना, मनन-क्रिया, चित्रण करना, सजाना आदि क्रिया कर्तृतन्त्र ही होती है, परंतु ज्ञान तो कृति और इच्छासे भी पहले होता है। इसीलिये 'जानाति, इच्छति, अथ करोति' का व्यवहार होता है। अर्थात् कोई भी प्राणी जानता है, फिर इच्छा करता है, पुनश्च कर्म करता है। प्राणी जैसा संकल्प करता है, वैसी ही क्रिया करता है-यह पीछे कहा जा चुका है। कोई भी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, कर्त्ताके परतन्त्र ही होती है। किंतु ज्ञान कर्त्ताकी इच्छापर निर्भर नहीं होता; प्रमाणकी उपस्थितिमें कर्त्ताकी इच्छा न होनेपर भी ज्ञान होता है। दुर्गन्ध-ज्ञानको हम नहीं चाहते तब भी निर्दोष घ्राणकी उपस्थितिमें दुर्गन्ध रहनेपर ज्ञान अनिवार्य ही है, यहाँ कर्त्ताकी स्वतन्त्रता नहीं होती है। मानस परिणाम होनेपर भी मनन-क्रिया, भावना एवं ज्ञानमें यही भेद रहता है। बाहरी दुनियाकी वास्तविकता और भीतरी दुनियाकी समता तथा भिन्नताका मनमें चित्रण करना ज्ञाता या प्रमाताका काम हो सकता है। इन

मार्क्स-दर्शन ५२७ सबका सम अस्तित्व और अनुवर्तनक्रिया, प्रतिक्रिया और कार्य-कारणके उचित सम्बन्धमें सजाने और व्यवस्थित करने आदिका काम भी प्रमाताका ही है, ज्ञानका नहीं। भौतिकवादियोंके यहाँ जीवित मनुष्य ही प्रमाता हो सकता है। देह- से भिन्न प्रमाता कोई आत्मा मार्क्सवादियोको मान्य नहीं है। ज्ञान स्वयं- प्रकाश है। व्यवस्थापन करना, सजाना आदि ज्ञानका काम नहीं होता। प्रमाण भी अज्ञात-ज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं। इसी तरह 'सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है या वस्तु-जगत्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध एवं उन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धोंके बीचकी चेतनाका नाम भी ज्ञान है', यह भी कथन व्यर्थ है। क्योंकि वस्तुतः अस्तित्वका स्वतः सम्बन्ध नहीं होता। अस्तित्ववाली वस्तुओंका सम्बन्ध होता है और वे सम्बन्ध ज्ञेय एवं गुणविशेष होते हैं, चेतना या ज्ञान नहीं। उसी प्रकार आत्मा मार्क्सवादमे देह-भिन्न है ही नहीं। अनुभव ज्ञानसे भिन्न कोई वस्तु नहीं होती, फिर आत्मानुभूत अस्तित्वोंका सम्बन्ध भी स्वयं अनुभव या ज्ञानस्वरूप नहीं हो सकता। विचार वस्तु-जगत्को ठीक ठीक प्रति- फलित, प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। यहाँ भी वस्तुतः वस्तु- का अन्तःकरणमें प्रतिफलन या प्रतिबिम्बन ही विचार या निश्चय कहलाता है। यहाँ भी निश्चय, ज्ञान, विचारादि समानार्थक हैं। यहाँ भी अन्योन्याश्रय आदि दोष उपस्थित होते हैं। भारतीय नैयायिकोंकी दृष्टिसे सर्वव्यवहारहेतु आत्मगुणको ही ज्ञान माना जाता है। सुस्पष्ट है कि संसारके सभी व्यवहार तथा व्यापार ज्ञानमूलक हैं। संसारमें अकामकी कोई भी क्रिया नहीं होती और सभी काम सङ्कल्पमूलक ही होते हैं। वेदान्तकी दृष्टिमे काम, सङ्कल्प, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, ह्री, धी, भय—ये सभी मनके धर्म हैं। नैयायिकोंके तथा वैशेषिकोंके अनुसार आत्ममनः- संयोगसे उत्पन्न होनेवाले ये सब आत्माके ही गुण हैं। सामाजिक व्यवस्था कम्युनिष्ट यह मानते हैं कि 'मनुष्य जिस किसी भी अवस्थामें रहा हो उसके समक्ष कुछ सिद्धान्त, नियम एवं आदर्श रहे हैं' परंतु उनके मतानुसार 'समाजकी अवस्था बदलनेके साथ उनके सिद्धान्तों, नियमों एवं आदर्शोंमें भी परिवर्तन होता रहता है।' उनकी इस मान्यताका मूल कारण यही है कि 'सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, विश्वस्रष्टा ईश्वर उनकी समझमें आता ही नहीं।' अतएव सर्व- देश-कालके अनुसार निर्धारित शाश्वत सिद्धान्तों, सत्यों एवं नियमोंपर उनका विश्वास नहीं जमता। सबसे बड़ा दोष तो यह है कि 'वे परिस्थिति-परतन्त्र मनुष्योंकी परिस्थित्यनुसारिणी विचार-धाराओंको ही दर्शनोंका स्रोत मानते हैं,

५४८ मार्क्सवाद और रामराज्य जो एक प्रामाणिककी दृष्टिमे अत्यन्त हेय एव नगण्य है।' वे कहते हैं कि 'विचारोंके जीवनकी बदलती हुई परिस्थितियाँ ही विभिन्न विचार-धाराएँ उत्पन्न करती हैं। किसी विशिष्ट समयकी विशिष्ट परिस्थितियोंमें जीवनका विकास होनेसे विचारकोंके संस्कार एवं विचारधाराएँ एक विशिष्ट मार्गपर ढल जाती हैं। वे तदनुसार ही सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवनके उद्देश्य एवं आदर्श निश्चित करनेका प्रयत्न करते हैं।' उनके मतानुसार 'सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि दार्शनिकोंने भी अपनी जीवनस्थितिके अनुसार ही अपने विचार व्यक्त किये।' इन बातोंसे यह स्पष्ट है कि इन विचारकोने प्रमाणके आधारपर तत्त्वकी दृष्टिमे किसी सत्यवस्तुका विचार नहीं किया। मार्क्सकी भी यही हालत थी, वह भी गरीबोंकी श्रेणीमें उत्पन्न हुआ था। अतः उसे भी अपनी परिस्थितिके अनुसार ही विचार करना पड़ा। इससे स्पष्ट है कि इन किन्हीं भी विचारोंका वस्तु- स्थितिसे कोई सम्बन्ध नहीं। किंतु भारतीय दर्शनोकी स्थिति ऐसी नही। यहाँ तत्त्वके सम्बन्धमें परिस्थितिका प्रभाव रोककर भी प्रमाणके बलसे काम लिया जाता है। प्रामाणिक निर्णय अमीर-गरीब, सुखी-दुखी, सम्पन्न-विपन्न, नौकर-मालिक- सबका एक-सा ही रहता है। आलोकसहकृत मनःसंयुक्त निर्दोषचक्षुद्वारा सभी लोग रूपवान् पदार्थके सम्बन्धमें एक मत ही होगे। उसी प्रकार निर्दोष श्रोत्रादिसे शब्दादि ज्ञान भी सबको एक-से ही होगे। इस सम्बन्धमे परिस्थिति अकिंचित्कर ही रहेगी। इसीलिये शुक-जैसे महाविरक्त, वसिष्ठ-जैसे महान् श्रोत्रिय एव राम-जैसे सम्राट् आदिकोंके धर्म, दर्शन आदिके सम्बन्धमें एक ही ढगके विचार थे। उनके तत्त्व-निर्णयपर परिस्थितियों या सम्पत्ति-विपत्ति आदिका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता था। कम्युनिष्ट कहते हैं कि 'मनुष्य सर्वज्ञ परमेश्वर एव शास्त्रोके अनुसार होनेवाली सामाजिक व्यवस्थापर सतुष्ट नही होता। अपनी व्यवस्थामें उसे त्रुटियाँ मालूम पडती है, वह उनमें परिवर्तन कर फिर आगे बढ़ता है। पुनश्च उनमें आनेवाली रुकावटोंका अनुभव कर उसमें रद्दोबदल करता है। इस प्रकारके परिवर्तनोंसे ही विकास होता है।' परंतु अल्पज्ञ मनुष्यकी बनायी हुई व्यवस्थासे कभी भी शान्तिकी आशा नहीं की जा सकती। मार्क्सवादी अपनी व्यवस्थाको 'अन्तिम व्यवस्था' कहते हैं। मजदूरो-पूँजीपतियोंके सघर्षको ही वे संघर्षकी अन्तिम कड़ी कहते हैं। परंतु विकास-क्रममें इसे भी अन्तिम कैसे कहा जा सकता है ? वस्तुतः जैसे समय-समयपर असत्य-अधर्मके विस्तारसे सत्य एवं धर्म भी कुछ समयके लिये दब जाता है, तथापि अन्तमें सत्य और धर्मकी ही विजय होती है, वैसे ही ईश्वरीय व्यवस्था भी जो सर्वज्ञद्वारा सर्वदेश-काल एव सर्वहितकी दृष्टिसे निर्धारित की गयी है, कभी-कभी दब-सी जाती है। पर अन्तमें उसीकी विजय एवं स्थिरता रहती है। अल्पज्ञोद्वारा निर्धारित व्यवस्था थोड़े ही दिनोंमें

मार्क्स-दर्शन ५४९ दोषपूर्ण प्रतीत होने लगती है। अतः उनमें परिवर्तन आवश्यक प्रतीत होता है। इस तरह कोई भी मनुष्य मार्क्सके समान ही अपनी व्यवस्थाको ही सर्वोत्कृष्ट एवं अन्तिम समझता है, परंतु उससे भी उत्तम योजना लेकर दूसरे भी सामने आ ही जाते हैं। कई तार्किक बड़े-बड़े प्रयत्नसे दिव्य तर्कोंद्वारा कोई व्यवस्था उपस्थित करते हैं, पुनश्च उससे भी अच्छा तर्क लेकर दूसरे महाशय सामने आ जाते हैं- यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ ( ब्रह्म० शा० भा० २ । १ । ११ ) पर ईश्वरीय व्यवस्था हज़ारों नहीं लाखों वर्षोंसे सफल होती हुई चली आ रही है। संसारकी सभी सरकारोंने उसे मान्यता भी दी है। प्रायः सभी सरकारोंने व्यक्तियों एवं जातियोंकी धार्मिक स्वाधीनता एवं दायभाग आदिके सम्बन्धमें धार्मिक व्यवस्थाओंको स्वीकृत किया है। धर्म-नियन्त्रित मनुष्य सदा ही एक दूसरेका पोषक रहा। उच्छृङ्खल होते ही उसमें 'मात्स्यन्याय' फैलता और वह एक दूसरेका शोषक बन जाता है। उसी अवस्थामें प्रबल दुर्बलका घातक बनता है, धनवान्, शक्तिमान् निर्धन एवं शक्तिहीनका शोषक या भक्षक बन जाता है। जीवरूपसे सब समान होते हुए भी एक जीव दूसरे जीवोंको अपने उपयोगमें लाता है। उसी तरह मनुष्यता- के नाते सब समान होनेपर भी एकका दूसरेके उपयोगमें आना पहले भी और आज भी अनिवार्य ही है। अङ्गाङ्गिभाव, शेष-शेषिभावको उपकार्योपकारकरूपसे आदरणीय बना लिया जा सकता है। जैसे बेगार पहले कुछ शूद्रोंसे ही ली जाती थी, आज श्रमदानके रूपमें वही बेगार बड़े से-बड़े लोगोंसे भी ली जा रही है। पाप-पुण्य और शोषण मार्क्सवादी कहते हैं कि 'प्रबल मनुष्य दुर्बल मनुष्योंको अपनी गुलामीमें जकड़े रखनेके लिये ही अपनी शक्तियोंका प्रयोग करता था और तदर्थ ही उसने अनेक सिद्धान्त बनाये। बहुतोंने निर्बलोंको सन्तोषका पाठ पढ़ाया और साधन- सम्पन्नोंको भी दया, सहानुभूति एवं त्यागका उपदेश किया, इस जीवनमें एवं मृत्युके बाद दूसरे जीवनमें सुखादि लानेका विश्वास दिलाया। व्यक्तियोंको समझाया गया कि 'ये गुण व्यक्तिगत पूर्णताके लक्षण हैं और ऐहलौकिक-पारलौकिक सुखके साधक हैं। इन सभी उपदेशोंकी तहमें शान्ति एवं व्यवस्थाकी इच्छा और उद्देश्य ही मुख्य है।' उनके मतानुसार 'इसी इच्छाने धर्मको जन्म दिया है। फिर भी समाजके भीतर आनेवाली असमानताके कारण असंतोष एवं अशान्तिकी सम्भावना बनी ही रहती है। इसीलिये समाजहितैषियोंने सदा ही असमानता दूर करने और समानता लानेका प्रयत्न किया। सभी संतों एवं धर्मोंने समानताका गुण गाया है।' उपर्युक्त कथनका सार यह है कि वस्तुतः धर्म, संतोष, दया, त्याग, सहानुभूति वास्तवमें कोई महत्त्वकी चीज नहीं। केवल शोषकोंके

जो एक प्रामाणिककी दृष्टिमे अत्यन्त हेय एव नगण्य है।' वे कहते हैं कि 'विचारोंके जीवनकी बदलती हुई परिस्थितियाँ ही विभिन्न विचार-धाराएँ उत्पन्न करती हैं। किसी विशिष्ट समय की विशिष्ट परिस्थितियोंमें जीवनका विकास होनेसे विचारकोंके संस्कार एवं विचारधाराएँ एक विशिष्ट मार्गपर ढल जाती हैं। वे तदनुसार ही सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवनके उद्देश्य एव आदर्श निश्चित करनेका प्रयत्न करते हैं।' उनके मतानुसार 'सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि दार्शनिकोंने भी अपनी जीवनस्थितिके अनुसार ही अपने विचार व्यक्त किये।' इन बातोमे यह स्पष्ट है कि इन विचारकों ने प्रमाणके आधारपर तत्त्वकी दृष्टिमे किसी सत्यवस्तुका विचार नहीं किया। मार्क्सकी भी यही हालत थी, वह भी गरीबोंकी श्रेणीमें उत्पन्न हुआ था। अतः उसे भी अपनी परिस्थितिके अनुसार ही विचार करना पड़ा। इससे स्पष्ट है कि इन किन्ही भी विचारोंका वस्तु- स्थितिसे कोई सम्बन्ध नहीं। किंतु भारतीय दर्शनोंकी स्थिति ऐसी नहीं। यहाँ तत्त्वके सम्बन्धमें परिस्थितिका प्रभाव रोककर भी प्रमाणके बलसे काम लिया जाता है। प्रामाणिक निर्णय अमीर-गरीब, सुखी-दुःखी, सम्पन्न-विपन्न, नौकर-मालिक- सबका एक-सा ही रहता है। आलोकसहकृत मनःसंयुक्त निर्दोषचक्षुद्वारा सभी लोग रूपवान् पदार्थके सम्बन्धमें एक मत ही होगे। उसी प्रकार निर्दोष श्रोत्रादिसे शब्दादि ज्ञान भी सबको एक-से ही होगे। इस सम्बन्धमे परिस्थिति अकिंचित्कर ही रहेगी। इसीलिये शुक-जैसे महाविरक्त, वसिष्ठ-जैसे महान् श्रोत्रिय एव राम-जैसे सम्राट् आदिकोके धर्म, दर्शन आदिके सम्बन्धमें एक ही ढगके विचार थे। उनके तत्त्व-निर्णयपर परिस्थितियों या सम्पत्ति-विपत्ति आदिका कुछ भी प्रभाव नही पडता था। कम्युनिष्ट कहते हैं कि 'मनुष्य सर्वज्ञ परमेश्वर एव शास्त्रोके अनुसार होनेवाली सामाजिक व्यवस्थापर संतुष्ट नहीं होता। अपनी व्यवस्थामें उसे त्रुटियाँ मालूम पड़ती हैं, वह उनमें परिवर्तन कर फिर आगे बढता है। पुनश्च उनमें आनेवाली रुकावटोंका अनुभव कर उसमें रद्दोबदल करता है। इस प्रकारके परिवर्तनोंसे ही विकास होता है।' परंतु अल्पज्ञ मनुष्यकी बनायी हुई व्यवस्थासे कभी भी शान्तिकी आशा नहीं की जा सकती। मार्क्सवादी अपनी व्यवस्थाको 'अन्तिम व्यवस्था' कहते हैं। मजदूरों-पूँजीपतियोंके संघर्षको ही वे संघर्षकी अन्तिम कडी कहते हैं। परंतु विकास-क्रममें इसे भी अन्तिम कैसे कहा जा सकता है? वस्तुतः जैसे समय-समयपर असत्य-अधर्मके विस्तारसे सत्य एव धर्म भी कुछ समयके लिये दब जाता है, तथापि अन्तमें सत्य और धर्मकी ही विजय होती है, वैसे ही ईश्वरीय व्यवस्था भी जो सर्वज्ञद्वारा सर्वदेश-काल एव सर्वहितकी दृष्टिसे निर्धारित की गयी है, कभी-कभी दब-सी जाती है। पर अन्तमें उसीकी विजय एवं स्थिरता रहती है। अल्पज्ञोद्वारा निर्धारित व्यवस्था थोड़े ही दिनोंमें

मार्क्स-दर्शन ५४९ दोषपूर्ण प्रतीत होने लगती है। अतः उसमें परिवर्तन आवश्यक प्रतीत होता है। इस तरह कोई भी मनुष्य मार्क्सके समान ही अपनी व्यवस्थाको ही सर्वोत्कृष्ट एव अन्तिम समझता है, परंतु उससे भी उत्तम योजना लेकर दूसरे भी सामने आ ही जाते हैं। कई तार्किक बड़े-बड़े प्रयत्नसे दिव्य तर्कोंद्वारा कोई व्यवस्था उपस्थित करते हैं, पुनश्च उससे भी अच्छा तर्क लेकर दूसरे महाशय सामने आ जाते हैं- यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ (ब्रह्म० शां० भा० २।१।११) पर ईश्वरीय व्यवस्था हजारों नही लाखो वर्षोंसे सफल होती हुई चली आ रही है। संसारकी सभी सरकारोंने उसे मान्यता भी दी है। प्रायः सभी सरकारोंने व्यक्तियों एवं जातियोंकी धार्मिक स्वाधीनता एव दायभाग आदिके सम्बन्धमें धार्मिक व्यवस्थाओको स्वीकृत किया है। धर्म-नियन्त्रित मनुष्य सदा ही एक दूसरेका पोषक रहा। उच्छृङ्खल होते ही उसमें 'मात्स्यन्याय' फैलता और वह एक दूसरेका शोषक बन जाता है। उसी

कुछ पिट्ठुओंने शोषितोंके आँसू पोंछने, उन्हें शान्त रखने, विद्रोह न करनेके लिये ही इन सबको गढ रखा है। चार्वाकोंने भी धर्मके सम्बन्धमे ऐसी ही उल्टी-सीधी कल्पना की है। वस्तुतः महात्मा, आप्तकाम, परम विरक्त महर्षियोंने परम सूक्ष्म ऋतम्भरादृष्टिसे अपौरुषेय वेदादिशास्त्रोंके आधारपर कर्मका निर्णय किया है। श्रीकृष्ण एव शङ्कराचार्य-जैसे तार्किकों, दार्शनिकोंने जिसका पूर्णरूपसे समर्थन किया है, भौतिकवादियोंकी बहिर्मुख दृष्टिमें वह समझमें न आये तो क्या आश्चर्य ? सृष्टिमें ही सत्त्व, रज, तम तीनों गुणोंका क्रमेण अभि- भा-उद्भव होता रहता है। फलस्वरूप दैवी, आसुरी शक्तियाँ देश-विदेशमें समय-समयपर उद्भूत होती रहीं। दैवी शक्तिके लोग आत्मा, ईश्वर, शास्त्र तथा धर्म लेकर चलते थे और दूसरे उसके विरुद्ध। हिरण्यकशिपुने भी जैसी विधिकी व्यवस्था थी, उससे विपरीत व्यवस्था बनानेकी प्रतिज्ञा की। 'अन्यथेदं विधा- स्येऽहमयथापूर्वमोजसा ।' जर्मनीमे हीगेल, एडवर्ड आदि विचारकोने भी इस सम्बन्धमें अपना मत व्यक्त किया है।

समाज-विकास की कुंजी

'सोशलिज्म' का अर्थ है 'समाजवाद' और साम्यवादका अर्थ है समाजमें समानता लाना। समाजवादका अभिप्राय यह है कि 'समाज ही उत्पादन-साधनोंका स्वामी हो। व्यक्तिके स्थानपर समाजका शासन होना ही समाजवाद है।' फ्रांसके सेंट साइमन और इंगलैंडके राबर्टस् ओवेनने (जिनका जन्म क्रमशः १७६० और १७७१ में हुआ था) पहले-पहल साम्यवादी विचारधारा फैलायी। उनके विचार थे कि 'सरकारकी बागडोर महात्माओं एवं वैज्ञानिकोंके हाथमें होनी चाहिये।' मार्क्सवादी कहते हैं कि 'चूँकि ये विचार धार्मिक भावनाके थे, इसलिये वे लोग वास्तविकतासे परिचित न हो सके।' फ्रांसके लुई ब्ला (जिसका जन्म सन् १८११ में हुआ था) ने आधुनिक समाजवादका रूप व्यक्त किया और मजदूरोंके हाथमें राजनैतिक सत्ता देना आवश्यक समझा। फिर भी मार्क्सवादी अपने समाजवादको उन सबसे विलक्षण कहते हैं। एंजिल्सका कहना है कि 'समाज- वाद शब्दका प्रयोग अनेक बे-सिर-पैरकी हवाई आयोजनाओके लिये हुआ है। परोपकारकी भावनाओंद्वारा मजदूरोंकी अवस्था सुधारनेके ऐसे सैकड़ों प्रयत्नोंसे भी इस शब्दका सम्बन्ध रहा है जो एक तरफ मजदूरोंके कल्याणकी फिक्र करते हैं और दूसरी ओर पूँजी तथा उसके मुनाफेको भी सुरक्षित रखना चाहते हैं।' इसीलिये 'कम्युनिष्ट मैनीफेस्टो' का 'समाजवादी मैनीफेस्टो' नाम नहीं रखा गया। फ्रांसके प्रौधोंने भी कहा कि 'मजदूरोंके साधनहीन होनेसे उन्हें अपने परिश्रमका पूरा फल नहीं मिलता। साधनोंसे मालिक बिना परिश्रम किये ही मजदूरोंके परिश्रमका फल हथिया लेता है।' अतः प्रौधोने 'समाजको सब सम्पत्तिका मालिक' होना ठीक समझा। इनमेंसे अनेकोंने स्त्री-पुरुषोंके सामाजिक

मार्क्स-दर्शन ५५१ बन्धनोंको भी अनावश्यक समझा। फलतः इनके बहुत अनुयायी आचारहीन भी हो गये। जिनका समाजपर बुरा असर पड़ा। मार्क्सकी मुख्य विशेषता यह बतायी जा सकती है कि 'उसने मनुष्य समाजके इतिहासकी घटनाओंको कार्य- कारणकी शृङ्खलामें जोड़ दिया। प्रकृतिके समान ही मनुष्य-समाजके विकास एवं परिवर्तनके नियम हैं। समाजका रूप और संघटन किसी बाह्यशक्तिमे नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य समाजके विचारों, निश्चयों और कार्योंसे होता है। आगे भी समाजका रूप आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है। पूँजीवादी प्रणाली अपने विकाससे समाजमें इस प्रकारकी स्थिति उत्पन्न कर देती है कि उसका आगे बढ़ना असम्भव हो जाता है और पूँजीवादी समाजको विनाशकी ओर बढ़ाना है, अतः श्रेणी-संघर्षके द्वारा समाजवाद विकसित होता है।' रामराज्यवादीका इसपर कहना है कि जड प्रकृतिमें समीक्ष्यकारिता नहीं बन सकती। कोई समीक्ष्यकारी व्यक्ति या समूह आक्रमणकारी या आक्रमणका सामना करनेके लिये परस्परविचारसे निश्चित कार्यक्रम बनाता है। अमुक अश्वारोही, अमुक गजारोही, अमुक रथारोही, अमुक वायुयानारोही होकर तलवार, भाला, बर्छा, बंदूक, तोप, विस्फोटक तथा अङ्गार (बम्ब) आदि लेकर आक्रमण या मुकाबला करेगा। अवसर आनेपर वह पूर्वसंकेतानुसार वैसा ही करता है। पर अचेतन प्रकृति या उसके जडकार्योंमें या घटनाओंमें समीक्ष्यकारिता सर्वथा असम्भव है। अतएव प्रकृति या प्रकृति-कार्य किसीमें भी स्वतन्त्रतारूपसे नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती। निरीश्वरवादी सांख्योंमे भी 'नद्याः कूलं पिपतिषति (नदीका किनारा गिरना चाहता है) के समान प्रकृतिके विचार या ईक्षण को गौण या औपचारिक ही माना है। नदीका किनारा जड़ है, उसमें गिरनेकी इच्छा नहीं हो सकती, किंतु आसन्न पतन अर्थात् शीघ्र गिरना देखकर इस प्रकारका वाक्य प्रयोग किया जाता है। जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथ्यादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, वैसे ही अचेतन प्रकृति या उसके कार्य जड-वर्गकी प्रवृत्ति भी चेतन नियन्त्रित ही होती है। घटनाएँ उसी अचेतनकी हलचलमात्र हैं। वे स्वयं भी जड़ हैं। उनके नियम या कार्यकारणभाव—कुछ भी स्वतन्त्र नहीं हो सकते। मीमांसकोंका अचेतन कर्म भी ईश्वराधिष्ठित होकर ही फल देता है, उनके कार्यकारणभाव भी ईश्वरनियन्त्रित ही हैं—'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्रह्मसूत्र १।१।५) शाङ्करभाष्य आदिमें यह विषय विस्तारसे वर्णित है। अचेतन यन्त्रोंकी नियमित प्रवृत्तिके मूलमें भी किसी चेतन को ही अनिवार्यरूप- से सबका नियामक मानना पड़ता है। किसी-किसी घटनाका परस्पर कार्य-कारणभाव होता है, यह कोई मार्क्सकी नयी बात नहीं है। दण्ड, चक्र, चीवर, कुलालादिके व्यापार- की घटना घटनिर्माण (घटना) का कारण है। तन्तु, तूरी, वेमा, तन्तुवायादिकी हलचलें पटनिर्माणका कारण हैं। संग्रामसे धन, जन, शक्तिका अपक्षय होता है। उससे किसीकी