भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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जो एक प्रामाणिककी दृष्टिमे अत्यन्त हेय एव नगण्य है।' वे कहते हैं कि 'विचारोंके जीवनकी बदलती हुई परिस्थितियाँ ही विभिन्न विचार-धाराएँ उत्पन्न करती हैं। किसी विशिष्ट समय की विशिष्ट परिस्थितियोंमें जीवनका विकास होनेसे विचारकोंके संस्कार एवं विचारधाराएँ एक विशिष्ट मार्गपर ढल जाती हैं। वे तदनुसार ही सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवनके उद्देश्य एव आदर्श निश्चित करनेका प्रयत्न करते हैं।' उनके मतानुसार 'सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि दार्शनिकोंने भी अपनी जीवनस्थितिके अनुसार ही अपने विचार व्यक्त किये।' इन बातोमे यह स्पष्ट है कि इन विचारकों ने प्रमाणके आधारपर तत्त्वकी दृष्टिमे किसी सत्यवस्तुका विचार नहीं किया। मार्क्सकी भी यही हालत थी, वह भी गरीबोंकी श्रेणीमें उत्पन्न हुआ था। अतः उसे भी अपनी परिस्थितिके अनुसार ही विचार करना पड़ा। इससे स्पष्ट है कि इन किन्ही भी विचारोंका वस्तु- स्थितिसे कोई सम्बन्ध नहीं। किंतु भारतीय दर्शनोंकी स्थिति ऐसी नहीं। यहाँ तत्त्वके सम्बन्धमें परिस्थितिका प्रभाव रोककर भी प्रमाणके बलसे काम लिया जाता है। प्रामाणिक निर्णय अमीर-गरीब, सुखी-दुःखी, सम्पन्न-विपन्न, नौकर-मालिक- सबका एक-सा ही रहता है। आलोकसहकृत मनःसंयुक्त निर्दोषचक्षुद्वारा सभी लोग रूपवान् पदार्थके सम्बन्धमें एक मत ही होगे। उसी प्रकार निर्दोष श्रोत्रादिसे शब्दादि ज्ञान भी सबको एक-से ही होगे। इस सम्बन्धमे परिस्थिति अकिंचित्कर ही रहेगी। इसीलिये शुक-जैसे महाविरक्त, वसिष्ठ-जैसे महान् श्रोत्रिय एव राम-जैसे सम्राट् आदिकोके धर्म, दर्शन आदिके सम्बन्धमें एक ही ढगके विचार थे। उनके तत्त्व-निर्णयपर परिस्थितियों या सम्पत्ति-विपत्ति आदिका कुछ भी प्रभाव नही पडता था। कम्युनिष्ट कहते हैं कि 'मनुष्य सर्वज्ञ परमेश्वर एव शास्त्रोके अनुसार होनेवाली सामाजिक व्यवस्थापर संतुष्ट नहीं होता। अपनी व्यवस्थामें उसे त्रुटियाँ मालूम पड़ती हैं, वह उनमें परिवर्तन कर फिर आगे बढता है। पुनश्च उनमें आनेवाली रुकावटोंका अनुभव कर उसमें रद्दोबदल करता है। इस प्रकारके परिवर्तनोंसे ही विकास होता है।' परंतु अल्पज्ञ मनुष्यकी बनायी हुई व्यवस्थासे कभी भी शान्तिकी आशा नहीं की जा सकती। मार्क्सवादी अपनी व्यवस्थाको 'अन्तिम व्यवस्था' कहते हैं। मजदूरों-पूँजीपतियोंके संघर्षको ही वे संघर्षकी अन्तिम कडी कहते हैं। परंतु विकास-क्रममें इसे भी अन्तिम कैसे कहा जा सकता है? वस्तुतः जैसे समय-समयपर असत्य-अधर्मके विस्तारसे सत्य एव धर्म भी कुछ समयके लिये दब जाता है, तथापि अन्तमें सत्य और धर्मकी ही विजय होती है, वैसे ही ईश्वरीय व्यवस्था भी जो सर्वज्ञद्वारा सर्वदेश-काल एव सर्वहितकी दृष्टिसे निर्धारित की गयी है, कभी-कभी दब-सी जाती है। पर अन्तमें उसीकी विजय एवं स्थिरता रहती है। अल्पज्ञोद्वारा निर्धारित व्यवस्था थोड़े ही दिनोंमें