मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
जो एक प्रामाणिककी दृष्टिमे अत्यन्त हेय एव नगण्य है।' वे कहते हैं कि 'विचारोंके जीवनकी बदलती हुई परिस्थितियाँ ही विभिन्न विचार-धाराएँ उत्पन्न करती हैं। किसी विशिष्ट समय की विशिष्ट परिस्थितियोंमें जीवनका विकास होनेसे विचारकोंके संस्कार एवं विचारधाराएँ एक विशिष्ट मार्गपर ढल जाती हैं। वे तदनुसार ही सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवनके उद्देश्य एव आदर्श निश्चित करनेका प्रयत्न करते हैं।' उनके मतानुसार 'सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि दार्शनिकोंने भी अपनी जीवनस्थितिके अनुसार ही अपने विचार व्यक्त किये।' इन बातोमे यह स्पष्ट है कि इन विचारकों ने प्रमाणके आधारपर तत्त्वकी दृष्टिमे किसी सत्यवस्तुका विचार नहीं किया। मार्क्सकी भी यही हालत थी, वह भी गरीबोंकी श्रेणीमें उत्पन्न हुआ था। अतः उसे भी अपनी परिस्थितिके अनुसार ही विचार करना पड़ा। इससे स्पष्ट है कि इन किन्ही भी विचारोंका वस्तु- स्थितिसे कोई सम्बन्ध नहीं। किंतु भारतीय दर्शनोंकी स्थिति ऐसी नहीं। यहाँ तत्त्वके सम्बन्धमें परिस्थितिका प्रभाव रोककर भी प्रमाणके बलसे काम लिया जाता है। प्रामाणिक निर्णय अमीर-गरीब, सुखी-दुःखी, सम्पन्न-विपन्न, नौकर-मालिक- सबका एक-सा ही रहता है। आलोकसहकृत मनःसंयुक्त निर्दोषचक्षुद्वारा सभी लोग रूपवान् पदार्थके सम्बन्धमें एक मत ही होगे। उसी प्रकार निर्दोष श्रोत्रादिसे शब्दादि ज्ञान भी सबको एक-से ही होगे। इस सम्बन्धमे परिस्थिति अकिंचित्कर ही रहेगी। इसीलिये शुक-जैसे महाविरक्त, वसिष्ठ-जैसे महान् श्रोत्रिय एव राम-जैसे सम्राट् आदिकोके धर्म, दर्शन आदिके सम्बन्धमें एक ही ढगके विचार थे। उनके तत्त्व-निर्णयपर परिस्थितियों या सम्पत्ति-विपत्ति आदिका कुछ भी प्रभाव नही पडता था। कम्युनिष्ट कहते हैं कि 'मनुष्य सर्वज्ञ परमेश्वर एव शास्त्रोके अनुसार होनेवाली सामाजिक व्यवस्थापर संतुष्ट नहीं होता। अपनी व्यवस्थामें उसे त्रुटियाँ मालूम पड़ती हैं, वह उनमें परिवर्तन कर फिर आगे बढता है। पुनश्च उनमें आनेवाली रुकावटोंका अनुभव कर उसमें रद्दोबदल करता है। इस प्रकारके परिवर्तनोंसे ही विकास होता है।' परंतु अल्पज्ञ मनुष्यकी बनायी हुई व्यवस्थासे कभी भी शान्तिकी आशा नहीं की जा सकती। मार्क्सवादी अपनी व्यवस्थाको 'अन्तिम व्यवस्था' कहते हैं। मजदूरों-पूँजीपतियोंके संघर्षको ही वे संघर्षकी अन्तिम कडी कहते हैं। परंतु विकास-क्रममें इसे भी अन्तिम कैसे कहा जा सकता है? वस्तुतः जैसे समय-समयपर असत्य-अधर्मके विस्तारसे सत्य एव धर्म भी कुछ समयके लिये दब जाता है, तथापि अन्तमें सत्य और धर्मकी ही विजय होती है, वैसे ही ईश्वरीय व्यवस्था भी जो सर्वज्ञद्वारा सर्वदेश-काल एव सर्वहितकी दृष्टिसे निर्धारित की गयी है, कभी-कभी दब-सी जाती है। पर अन्तमें उसीकी विजय एवं स्थिरता रहती है। अल्पज्ञोद्वारा निर्धारित व्यवस्था थोड़े ही दिनोंमें
मार्क्स-दर्शन ५४९ दोषपूर्ण प्रतीत होने लगती है। अतः उसमें परिवर्तन आवश्यक प्रतीत होता है। इस तरह कोई भी मनुष्य मार्क्सके समान ही अपनी व्यवस्थाको ही सर्वोत्कृष्ट एव अन्तिम समझता है, परंतु उससे भी उत्तम योजना लेकर दूसरे भी सामने आ ही जाते हैं। कई तार्किक बड़े-बड़े प्रयत्नसे दिव्य तर्कोंद्वारा कोई व्यवस्था उपस्थित करते हैं, पुनश्च उससे भी अच्छा तर्क लेकर दूसरे महाशय सामने आ जाते हैं- यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ (ब्रह्म० शां० भा० २।१।११) पर ईश्वरीय व्यवस्था हजारों नही लाखो वर्षोंसे सफल होती हुई चली आ रही है। संसारकी सभी सरकारोंने उसे मान्यता भी दी है। प्रायः सभी सरकारोंने व्यक्तियों एवं जातियोंकी धार्मिक स्वाधीनता एव दायभाग आदिके सम्बन्धमें धार्मिक व्यवस्थाओको स्वीकृत किया है। धर्म-नियन्त्रित मनुष्य सदा ही एक दूसरेका पोषक रहा। उच्छृङ्खल होते ही उसमें 'मात्स्यन्याय' फैलता और वह एक दूसरेका शोषक बन जाता है। उसी
कुछ पिट्ठुओंने शोषितोंके आँसू पोंछने, उन्हें शान्त रखने, विद्रोह न करनेके लिये ही इन सबको गढ रखा है। चार्वाकोंने भी धर्मके सम्बन्धमे ऐसी ही उल्टी-सीधी कल्पना की है। वस्तुतः महात्मा, आप्तकाम, परम विरक्त महर्षियोंने परम सूक्ष्म ऋतम्भरादृष्टिसे अपौरुषेय वेदादिशास्त्रोंके आधारपर कर्मका निर्णय किया है। श्रीकृष्ण एव शङ्कराचार्य-जैसे तार्किकों, दार्शनिकोंने जिसका पूर्णरूपसे समर्थन किया है, भौतिकवादियोंकी बहिर्मुख दृष्टिमें वह समझमें न आये तो क्या आश्चर्य ? सृष्टिमें ही सत्त्व, रज, तम तीनों गुणोंका क्रमेण अभि- भा-उद्भव होता रहता है। फलस्वरूप दैवी, आसुरी शक्तियाँ देश-विदेशमें समय-समयपर उद्भूत होती रहीं। दैवी शक्तिके लोग आत्मा, ईश्वर, शास्त्र तथा धर्म लेकर चलते थे और दूसरे उसके विरुद्ध। हिरण्यकशिपुने भी जैसी विधिकी व्यवस्था थी, उससे विपरीत व्यवस्था बनानेकी प्रतिज्ञा की। 'अन्यथेदं विधा- स्येऽहमयथापूर्वमोजसा ।' जर्मनीमे हीगेल, एडवर्ड आदि विचारकोने भी इस सम्बन्धमें अपना मत व्यक्त किया है।
समाज-विकास की कुंजी
'सोशलिज्म' का अर्थ है 'समाजवाद' और साम्यवादका अर्थ है समाजमें समानता लाना। समाजवादका अभिप्राय यह है कि 'समाज ही उत्पादन-साधनोंका स्वामी हो। व्यक्तिके स्थानपर समाजका शासन होना ही समाजवाद है।' फ्रांसके सेंट साइमन और इंगलैंडके राबर्टस् ओवेनने (जिनका जन्म क्रमशः १७६० और १७७१ में हुआ था) पहले-पहल साम्यवादी विचारधारा फैलायी। उनके विचार थे कि 'सरकारकी बागडोर महात्माओं एवं वैज्ञानिकोंके हाथमें होनी चाहिये।' मार्क्सवादी कहते हैं कि 'चूँकि ये विचार धार्मिक भावनाके थे, इसलिये वे लोग वास्तविकतासे परिचित न हो सके।' फ्रांसके लुई ब्ला (जिसका जन्म सन् १८११ में हुआ था) ने आधुनिक समाजवादका रूप व्यक्त किया और मजदूरोंके हाथमें राजनैतिक सत्ता देना आवश्यक समझा। फिर भी मार्क्सवादी अपने समाजवादको उन सबसे विलक्षण कहते हैं। एंजिल्सका कहना है कि 'समाज- वाद शब्दका प्रयोग अनेक बे-सिर-पैरकी हवाई आयोजनाओके लिये हुआ है। परोपकारकी भावनाओंद्वारा मजदूरोंकी अवस्था सुधारनेके ऐसे सैकड़ों प्रयत्नोंसे भी इस शब्दका सम्बन्ध रहा है जो एक तरफ मजदूरोंके कल्याणकी फिक्र करते हैं और दूसरी ओर पूँजी तथा उसके मुनाफेको भी सुरक्षित रखना चाहते हैं।' इसीलिये 'कम्युनिष्ट मैनीफेस्टो' का 'समाजवादी मैनीफेस्टो' नाम नहीं रखा गया। फ्रांसके प्रौधोंने भी कहा कि 'मजदूरोंके साधनहीन होनेसे उन्हें अपने परिश्रमका पूरा फल नहीं मिलता। साधनोंसे मालिक बिना परिश्रम किये ही मजदूरोंके परिश्रमका फल हथिया लेता है।' अतः प्रौधोने 'समाजको सब सम्पत्तिका मालिक' होना ठीक समझा। इनमेंसे अनेकोंने स्त्री-पुरुषोंके सामाजिक
मार्क्स-दर्शन ५५१ बन्धनोंको भी अनावश्यक समझा। फलतः इनके बहुत अनुयायी आचारहीन भी हो गये। जिनका समाजपर बुरा असर पड़ा। मार्क्सकी मुख्य विशेषता यह बतायी जा सकती है कि 'उसने मनुष्य समाजके इतिहासकी घटनाओंको कार्य- कारणकी शृङ्खलामें जोड़ दिया। प्रकृतिके समान ही मनुष्य-समाजके विकास एवं परिवर्तनके नियम हैं। समाजका रूप और संघटन किसी बाह्यशक्तिमे नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य समाजके विचारों, निश्चयों और कार्योंसे होता है। आगे भी समाजका रूप आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है। पूँजीवादी प्रणाली अपने विकाससे समाजमें इस प्रकारकी स्थिति उत्पन्न कर देती है कि उसका आगे बढ़ना असम्भव हो जाता है और पूँजीवादी समाजको विनाशकी ओर बढ़ाना है, अतः श्रेणी-संघर्षके द्वारा समाजवाद विकसित होता है।' रामराज्यवादीका इसपर कहना है कि जड प्रकृतिमें समीक्ष्यकारिता नहीं बन सकती। कोई समीक्ष्यकारी व्यक्ति या समूह आक्रमणकारी या आक्रमणका सामना करनेके लिये परस्परविचारसे निश्चित कार्यक्रम बनाता है। अमुक अश्वारोही, अमुक गजारोही, अमुक रथारोही, अमुक वायुयानारोही होकर तलवार, भाला, बर्छा, बंदूक, तोप, विस्फोटक तथा अङ्गार (बम्ब) आदि लेकर आक्रमण या मुकाबला करेगा। अवसर आनेपर वह पूर्वसंकेतानुसार वैसा ही करता है। पर अचेतन प्रकृति या उसके जडकार्योंमें या घटनाओंमें समीक्ष्यकारिता सर्वथा असम्भव है। अतएव प्रकृति या प्रकृति-कार्य किसीमें भी स्वतन्त्रतारूपसे नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती। निरीश्वरवादी सांख्योंमे भी 'नद्याः कूलं पिपतिषति (नदीका किनारा गिरना चाहता है) के समान प्रकृतिके विचार या ईक्षण को गौण या औपचारिक ही माना है। नदीका किनारा जड़ है, उसमें गिरनेकी इच्छा नहीं हो सकती, किंतु आसन्न पतन अर्थात् शीघ्र गिरना देखकर इस प्रकारका वाक्य प्रयोग किया जाता है। जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथ्यादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, वैसे ही अचेतन प्रकृति या उसके कार्य जड-वर्गकी प्रवृत्ति भी चेतन नियन्त्रित ही होती है। घटनाएँ उसी अचेतनकी हलचलमात्र हैं। वे स्वयं भी जड़ हैं। उनके नियम या कार्यकारणभाव—कुछ भी स्वतन्त्र नहीं हो सकते। मीमांसकोंका अचेतन कर्म भी ईश्वराधिष्ठित होकर ही फल देता है, उनके कार्यकारणभाव भी ईश्वरनियन्त्रित ही हैं—'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्रह्मसूत्र १।१।५) शाङ्करभाष्य आदिमें यह विषय विस्तारसे वर्णित है। अचेतन यन्त्रोंकी नियमित प्रवृत्तिके मूलमें भी किसी चेतन को ही अनिवार्यरूप- से सबका नियामक मानना पड़ता है। किसी-किसी घटनाका परस्पर कार्य-कारणभाव होता है, यह कोई मार्क्सकी नयी बात नहीं है। दण्ड, चक्र, चीवर, कुलालादिके व्यापार- की घटना घटनिर्माण (घटना) का कारण है। तन्तु, तूरी, वेमा, तन्तुवायादिकी हलचलें पटनिर्माणका कारण हैं। संग्रामसे धन, जन, शक्तिका अपक्षय होता है। उससे किसीकी