मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स-दर्शन ५४९ दोषपूर्ण प्रतीत होने लगती है। अतः उनमें परिवर्तन आवश्यक प्रतीत होता है। इस तरह कोई भी मनुष्य मार्क्सके समान ही अपनी व्यवस्थाको ही सर्वोत्कृष्ट एवं अन्तिम समझता है, परंतु उससे भी उत्तम योजना लेकर दूसरे भी सामने आ ही जाते हैं। कई तार्किक बड़े-बड़े प्रयत्नसे दिव्य तर्कोंद्वारा कोई व्यवस्था उपस्थित करते हैं, पुनश्च उससे भी अच्छा तर्क लेकर दूसरे महाशय सामने आ जाते हैं- यत्नेनानुमितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः । अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते ॥ ( ब्रह्म० शा० भा० २ । १ । ११ ) पर ईश्वरीय व्यवस्था हज़ारों नहीं लाखों वर्षोंसे सफल होती हुई चली आ रही है। संसारकी सभी सरकारोंने उसे मान्यता भी दी है। प्रायः सभी सरकारोंने व्यक्तियों एवं जातियोंकी धार्मिक स्वाधीनता एवं दायभाग आदिके सम्बन्धमें धार्मिक व्यवस्थाओंको स्वीकृत किया है। धर्म-नियन्त्रित मनुष्य सदा ही एक दूसरेका पोषक रहा। उच्छृङ्खल होते ही उसमें 'मात्स्यन्याय' फैलता और वह एक दूसरेका शोषक बन जाता है। उसी अवस्थामें प्रबल दुर्बलका घातक बनता है, धनवान्, शक्तिमान् निर्धन एवं शक्तिहीनका शोषक या भक्षक बन जाता है। जीवरूपसे सब समान होते हुए भी एक जीव दूसरे जीवोंको अपने उपयोगमें लाता है। उसी तरह मनुष्यता- के नाते सब समान होनेपर भी एकका दूसरेके उपयोगमें आना पहले भी और आज भी अनिवार्य ही है। अङ्गाङ्गिभाव, शेष-शेषिभावको उपकार्योपकारकरूपसे आदरणीय बना लिया जा सकता है। जैसे बेगार पहले कुछ शूद्रोंसे ही ली जाती थी, आज श्रमदानके रूपमें वही बेगार बड़े से-बड़े लोगोंसे भी ली जा रही है। पाप-पुण्य और शोषण मार्क्सवादी कहते हैं कि 'प्रबल मनुष्य दुर्बल मनुष्योंको अपनी गुलामीमें जकड़े रखनेके लिये ही अपनी शक्तियोंका प्रयोग करता था और तदर्थ ही उसने अनेक सिद्धान्त बनाये। बहुतोंने निर्बलोंको सन्तोषका पाठ पढ़ाया और साधन- सम्पन्नोंको भी दया, सहानुभूति एवं त्यागका उपदेश किया, इस जीवनमें एवं मृत्युके बाद दूसरे जीवनमें सुखादि लानेका विश्वास दिलाया। व्यक्तियोंको समझाया गया कि 'ये गुण व्यक्तिगत पूर्णताके लक्षण हैं और ऐहलौकिक-पारलौकिक सुखके साधक हैं। इन सभी उपदेशोंकी तहमें शान्ति एवं व्यवस्थाकी इच्छा और उद्देश्य ही मुख्य है।' उनके मतानुसार 'इसी इच्छाने धर्मको जन्म दिया है। फिर भी समाजके भीतर आनेवाली असमानताके कारण असंतोष एवं अशान्तिकी सम्भावना बनी ही रहती है। इसीलिये समाजहितैषियोंने सदा ही असमानता दूर करने और समानता लानेका प्रयत्न किया। सभी संतों एवं धर्मोंने समानताका गुण गाया है।' उपर्युक्त कथनका सार यह है कि वस्तुतः धर्म, संतोष, दया, त्याग, सहानुभूति वास्तवमें कोई महत्त्वकी चीज नहीं। केवल शोषकोंके