भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५४२ मार्क्सवाद और रामराज्य उदाहरण १ ( क ) मनुष्यकी बाल्यावस्थासे वृद्धावस्था । ( ख ) खनिज पदार्थ—प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक वस्तुके रूपमें । ( ग ) जमीनका टुकड़ा जिसका व्यावहारिक मूल्य सामाजिक विकासके कारण बढ़ गया हो । २ आस्ट्रेलियामें भेजा गया खरगोशका पहला जोड़ा, जहाँ अब उनका ढेर एक उत्पात बन गया है । ३ एक धूपका 'दिन', बहुत-से धूपके दिन सूखा । ४ इसमे सभी वे उदाहरण हैं जिनमें समूह टूटकर अलग-अलग हो जाते हैं, जैसे एक परिवारका टूटना । “परिवर्तनकी कल्पनाके लिये ये उदाहरण सहायक हैं, लेकिन यह ध्यान रहे कि ये सभी उदाहरण द्वन्द्वात्मक परिवर्तनके उदाहरण नहीं । इसी प्रकार लेवीने उद्भिज्जराज्यके दो उदाहरण दिये हैं । १—जंगलमे सोतोके पास एक प्रकारकी काई जमती है स्फैगमनसास, जो धीरे-धीरे जंगलको उजाड़ देती है । २—एक झील है। उसकी तहपर उद्भिज्ज सड़ते रहते हैं । तह ऊपरको उठती है और उसकी सतहपर लता तैरने लगती है । झील दलदल बन जाती है । लताओंकी जड़े जमकर धीरे-धीरे घासका मैदान बन जाती है । हवाके झोकोसे बीज उड़कर लगनेसे पेड़ पोदे जम जाते हैं, फिर एक जंगल बन जाता है ।” अच्छे बीजसे, अच्छे खेतसे, अच्छी खादसे भी, उपजके परिमाणका बढ़ना सर्वसम्मत है, परंतु यहाँ भी बीजादिकी अच्छाई रूप, गुणसे उपजका विस्तार होता है । यहाँ गुणका परिमाणके रूपसे परिवर्तन नहीं कहा जा सकता । गुण गुण ही रहता है, वह गुण रहकर ही उपजके परिमाणकी वृद्धिका कारण बनता है । दूसरी दृष्टिसे बीजादिकी अच्छाईसे उपजकी अच्छाई होती है, उपजकी अच्छाईके स्वरूपमें ही वस्तुकी अच्छाई और संख्यावृद्धि आ जाती है । लेवीके गुण-परिवर्तनके कणिकसे कणिकका उदाहरण भी कोई चीज नहीं है । मनुष्यकी बाल्यावस्था मे वृद्धावस्था, खनिज पदार्थोंका प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक अवस्थाके रूपमें परिवर्तन होना, सामाजिक विकासके कारण भूमिके टुकड़ेका व्यावहारिक मूल्य बढ़ जाना आदिका षड्भाव-विकारमे अन्तर्भाव हो जाता है । बाल्यावस्था मे वृद्धावस्थाका परिवर्तन, वृद्धि और विपरिणामके भीतर ही है । दूसरा उदाहरण भी इसी तरहका है । तीसरा उदाहरण तो माँगपूर्तिके सिद्धान्तानुसार माँग बढ़ जानेसे मूल्य बढ़ जाना है ।