भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 853, कुल 866 में से

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भूतोंकी स्वयं गति असिद्ध है। अचेतनकी प्रवृत्ति चेतनसे ही अधिष्ठित होती है। सत्त्व, रज आदि गुण; वायु, तेज, जल आदि भूतोंकी स्वयं गति निर्विवाद नहीं है । चेतनाधिष्ठित भूतोंकी गतिका भी गुणात्मक परिणाम सीमित है; निस्सीम नहीं । इसीलिये तैजस परिणाम चक्षुसे ही रूपका दर्शन होता है, पार्थिव घ्राणेन्द्रियसे नहीं । इसीलिये भूतोंका गुणात्मक परिणाम होनेपर भी भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं होती है। जैसे पटात्मक परिणामके लिये तन्तुमें ही शक्ति है, वायुमें नहीं। तिलसे ही तेल होता है, बालूसे नहीं। उसी तरह जड भूतोंका शब्दादि गुण-परिणाम सम्भव है, किंतु चैतन्यभूतोंका परिणाम नहीं सिद्ध होता । भले ही भूत तथा भौतिक देह, दिमाग, मस्तिष्क आदिके होनेपर ही चैतन्यका उपलम्भ होता है, तथापि इतने मात्रसे चैतन्य भूतका धर्म नहीं सिद्ध हो सकता क्योकि यदि अन्वयमात्रसे ही गुण-धर्मनिर्णय हो तब तो आकाशके रहनेपर भी सब कार्य होते हैं, फिर तो गन्धादि भी आकाशके धर्म समझे जाने चाहिये । अतः अन्वय-व्यतिरेक—दोनोके घटनेपर ही कारण-कार्य-भाव या धर्म-धर्मीभावका निर्णय होता है । प्रस्तुत प्रसङ्ग में अन्वय व्यभिचरित है । घटादिमें एव मृत शरीरमें भूत रहता है, किंतु वहाँ चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता। ‘विशिष्ट अवस्थायुक्त अन्नसे मदशक्तिकी तरह विशिष्ट अवस्थावाले भूतोंसे ही चैतन्यकी उत्पत्ति होती है’, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योकि अन्नमें मदशक्ति पहले भी रहती है। यह अनशनके पश्चात् अन्न लेनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि बालूमें तेलकी तरह वह पहले न हो तो किसी भी अवस्थामें उसका प्राकट्य नहीं हो सकता । भूतोंमें चैतन्यका अस्तित्व होता तो अवश्य ही वह घटादिमें भी उपलब्ध होता। व्यतिरेक तो सर्वथा ही संदिग्ध रहता है। भूतोंके न रहनेपर चैतन्य रहता ही नहीं, इसीलिये अनुपलम्भ है, अथवा रहता हुआ भी अभिव्यञ्जक भूत न होनेसे अनुपलम्भ होता है ? सुस्पष्ट है कि लोहा, लक्कड़, तार आदि पार्थिव जलीय पदार्थ अग्निके अभिव्यञ्जक हैं । अतएव उनके न रहनेपर अग्निके रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती । इसी तरह देह, दिल, दिमाग आदि आत्मचैतन्यके व्यञ्जक हैं; अतएव उनके न रहनेपर आत्मचैतन्यकी रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती । भूतोंकी यान्त्रिक गति और व्यापक गतिमें वास्तविक भेद नहीं है । व्यष्टि चेतन मनुष्यादिद्वारा यान्त्रिक गति बनती है । समष्टि ईश्वर चेतनद्वारा व्यापक गति बनती है । सर्वथापि चेतनके बिना भूत या गुण किसीकी स्वाभाविक गति नहीं हो सकती । गुणात्मक परिवर्तन भी यन्त्र-राज्यके बहिर्भूत नहीं है । तन्तुसे पट, जलसे बर्फ या भाप आदिका निर्माण यान्त्रिक गतिसे सम्पन्न होता ही है । वस्तुतः प्रत्यक्षानुमानद्वारा विदित भूत ही प्रकृति नहीं है । किंतु प्रत्यक्षानुमानसे अज्ञात

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