मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ मार्क्सवाद और रामराज्य मुद्रणकला, उपनिवेशसम्बन्धी मताधिकारके सम्बन्धमे विचार व्यक्त किये हैं। कहा जाता है वेन्थमको प्रीस्टलेका एक सूत्र मिला 'अधिकतम लोगोका अधिकतम हित'। प्रीस्टलेसे पूर्व फ्रांसिस एवं हचीसनने भी इसी सूत्रका अनुकरण राज्यका मुख्य ध्येय बताया था। ग्रीसके 'हिडनिजम दर्शन'के अनुसार मनुष्यके कार्य सुख-दुःखके मान- दण्डसे निर्धारित होते हैं।' उसने इस सिद्धान्तको उक्त सूत्रसे मिलाया और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'न्याय और व्यवस्थाके सिद्धान्तोकी प्रस्तावना'में बताया कि 'प्रकृतिने मनुष्य-जातिको दो सत्ताधारी स्वामियो-सुख और दुःखके अधीन बनाया। मनुष्यके कार्य सुख-दुःखपर आश्रित हैं। जीवनका एकमात्र ध्येय सुख-प्राप्ति, दुःखनिवारण है। यही जीवनका सार है। जिसका जीवन इस सिद्धान्तद्वारा नहीं चालित होता, वह अज्ञानी है। सुख-दुःखका अर्थ उपयोगिता है। वही वस्तु उपयोगी है, जिससे सुख हो। आनन्द या आनन्द-कारण सुख है। क्लेश या क्लेश- कारण दुःख है।' वेन्थमके अनुसार 'मनुष्यके सभी भौतिक कार्य उपयोगितासे ही निर्धारित होते हैं। धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, भलाई-बुराईकी परख उपयोगिताके ही आधारपर की जाती है। जीवन-उपयोगिता ही सत्ताधारी है।' उसके अनुसार 'नैसर्गिक, लौकिक, राजनीतिक और धार्मिक—ये चार सुख- दुःखके स्रोत हैं। जैसे किसीका मकान जल गया। यदि वह उसकी भूलसे जला तो नैसर्गिक स्रोतसे दुःख हुआ। यदि पड़ोसीकी बुरी भावनासे हुआ तो लौकिक स्रोतसे। सरकारी आदेशसे जलाया गया तो राजनीतिक स्रोतसे। यदि दैवी प्रकोप- से जला तो धार्मिक स्रोतसे दुःख हुआ।' 'वेन्थमके अनुसार'—सुख-दुःखकी मात्राकी परख तीव्रता, समयप्रसार, निश्चय, समीपता, उपजाऊपन, शुद्धता और विस्तार—इन सात विशेषताओद्वारा होती है। इन्हींके आधारपर वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है।' उसके अनुसार सुख-प्राप्ति और दुःख-निवृत्तिके लिये ही राज्यके सब नियम बनने चाहिये। अधिकतम लोगोका सुख ही राज्यका ध्येय होना चाहिये। व्यवस्थापक उक्त सात विशेषताओद्वारा ही इसकी जानकारी प्राप्त कर सकता है।' उपयोगिता एवं व्यक्तिवाद—उपयोगिताकी दृष्टिसे राज्यके नियम स्वतन्त्रताके बाधक होते हैं अतः नियम विकारतुल्य है। किंतु उनके बिना सभ्य जीवन-निर्वाह सम्भव नहीं। अतः वह आवश्यक विकार है। राज्यको कम-से-कम नियम बनाना चाहिये। जैसे 'आरोग्यता सर्वोत्तम है, परंतु अस्वस्थ होनेपर औषध आवश्यक है। स्वतन्त्रतापूर्ण जीवन उपयोगिताकी दृष्टिसे आदर्श जीवन है। परंतु चोरी, दुराचार आदि बाधाओके द्वारा स्वतन्त्रता-भंग होनेकी सम्भावना होती है। तब नियम ही औषधका काम करते हैं। राज्यका नियम बाधा तो अवश्य है परंतु आवश्यक है; क्योकि उससे अन्य असामाजिक बाधाएँ दूर होती हैं। औषधका प्रयोग जैसे कम-से-कम करना आवश्यक है, वैसे ही राजकीय नियमरूप बाधा