मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
७८ मार्क्सवाद और रामराज्य मुद्रणकला, उपनिवेशसम्बन्धी मताधिकारके सम्बन्धमे विचार व्यक्त किये हैं। कहा जाता है वेन्थमको प्रीस्टलेका एक सूत्र मिला 'अधिकतम लोगोका अधिकतम हित'। प्रीस्टलेसे पूर्व फ्रांसिस एवं हचीसनने भी इसी सूत्रका अनुकरण राज्यका मुख्य ध्येय बताया था। ग्रीसके 'हिडनिजम दर्शन'के अनुसार मनुष्यके कार्य सुख-दुःखके मान- दण्डसे निर्धारित होते हैं।' उसने इस सिद्धान्तको उक्त सूत्रसे मिलाया और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'न्याय और व्यवस्थाके सिद्धान्तोकी प्रस्तावना'में बताया कि 'प्रकृतिने मनुष्य-जातिको दो सत्ताधारी स्वामियो-सुख और दुःखके अधीन बनाया। मनुष्यके कार्य सुख-दुःखपर आश्रित हैं। जीवनका एकमात्र ध्येय सुख-प्राप्ति, दुःखनिवारण है। यही जीवनका सार है। जिसका जीवन इस सिद्धान्तद्वारा नहीं चालित होता, वह अज्ञानी है। सुख-दुःखका अर्थ उपयोगिता है। वही वस्तु उपयोगी है, जिससे सुख हो। आनन्द या आनन्द-कारण सुख है। क्लेश या क्लेश- कारण दुःख है।' वेन्थमके अनुसार 'मनुष्यके सभी भौतिक कार्य उपयोगितासे ही निर्धारित होते हैं। धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, भलाई-बुराईकी परख उपयोगिताके ही आधारपर की जाती है। जीवन-उपयोगिता ही सत्ताधारी है।' उसके अनुसार 'नैसर्गिक, लौकिक, राजनीतिक और धार्मिक—ये चार सुख- दुःखके स्रोत हैं। जैसे किसीका मकान जल गया। यदि वह उसकी भूलसे जला तो नैसर्गिक स्रोतसे दुःख हुआ। यदि पड़ोसीकी बुरी भावनासे हुआ तो लौकिक स्रोतसे। सरकारी आदेशसे जलाया गया तो राजनीतिक स्रोतसे। यदि दैवी प्रकोप- से जला तो धार्मिक स्रोतसे दुःख हुआ।' 'वेन्थमके अनुसार'—सुख-दुःखकी मात्राकी परख तीव्रता, समयप्रसार, निश्चय, समीपता, उपजाऊपन, शुद्धता और विस्तार—इन सात विशेषताओद्वारा होती है। इन्हींके आधारपर वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है।' उसके अनुसार सुख-प्राप्ति और दुःख-निवृत्तिके लिये ही राज्यके सब नियम बनने चाहिये। अधिकतम लोगोका सुख ही राज्यका ध्येय होना चाहिये। व्यवस्थापक उक्त सात विशेषताओद्वारा ही इसकी जानकारी प्राप्त कर सकता है।' उपयोगिता एवं व्यक्तिवाद—उपयोगिताकी दृष्टिसे राज्यके नियम स्वतन्त्रताके बाधक होते हैं अतः नियम विकारतुल्य है। किंतु उनके बिना सभ्य जीवन-निर्वाह सम्भव नहीं। अतः वह आवश्यक विकार है। राज्यको कम-से-कम नियम बनाना चाहिये। जैसे 'आरोग्यता सर्वोत्तम है, परंतु अस्वस्थ होनेपर औषध आवश्यक है। स्वतन्त्रतापूर्ण जीवन उपयोगिताकी दृष्टिसे आदर्श जीवन है। परंतु चोरी, दुराचार आदि बाधाओके द्वारा स्वतन्त्रता-भंग होनेकी सम्भावना होती है। तब नियम ही औषधका काम करते हैं। राज्यका नियम बाधा तो अवश्य है परंतु आवश्यक है; क्योकि उससे अन्य असामाजिक बाधाएँ दूर होती हैं। औषधका प्रयोग जैसे कम-से-कम करना आवश्यक है, वैसे ही राजकीय नियमरूप बाधा
कम-से-कम होनी चाहिये । जैसे व्यक्ति स्वास्थ्य की दृष्टिसे आरोग्य स्थितिको ही चाहता है, वैसे ही उपयोगिताकी दृष्टिसे स्वच्छता, स्वतन्त्रता चाहता है। अतः सत्ताधारी उपयोगिताकी दृष्टिसे व्यवस्थापकको कम-से-कम नियम बनाने चाहिये ।' 'बेन्थम' के अनुसार व्यवस्थापकको नियम निर्माणके पूर्व इसपर विचार करना चाहिये कि नियमद्वारा जो कार्य रोके जाते हैं, वे समाजके लिये विकार हैं कि नहीं ? उदाहरणार्थ —चोरी । साथ ही प्रस्तावित नियम विकारात्मक कार्यसे कम विकार है या अधिक ? जैसे १००० रु० की चोरीके समक्ष तीन मासका कारागार कम विकार है या ज्यादा ? अतः केवल चोरी आदि रोकनेके लिये ही नियम ठीक है । यह नागरिक- की स्वतन्त्रतामें सहायक है । समाजके कुछ लोग स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करते हैं । वे ही आदर्शभूत स्वतन्त्र-परिस्थितिमें बाधक होते हैं । इसलिये राज्यको नियम- द्वारा उसका नियन्त्रण आवश्यक होता है । अतः राज्य आवश्यक है । परन्तु राज्य- का संचालन अपरिवर्तनशील तथा नैसर्गिक नियमोंद्वारा होना ठीक है । व्यक्तिके आर्थिक एवं सामाजिक विषयोंमें हस्तक्षेप करनेसे उपयोगिताकी वृद्धि सम्भव नहीं होती । प्राकृतिक बहुमूल्य उपयोगिता-वृद्धिके लिये शान्तिस्थापनके क्षेत्रमे ही राज्यको नियम-निर्माण करना चाहिये । इस विषयमें भी नियम-निर्माण उप- योगिताके मानदण्डसे ही होना चाहिये ।' वस्तुतः भारतीय दर्शनके अनुसार केवल लौकिक सुखप्राप्ति एव दुःख-निवृत्ति- की दृष्टिसे ही कार्य नहीं किया जाता है । नैयायिकोंने दुःख-निवृत्तिको ही अन्तिम ध्येय बताया है । सुख-प्राप्ति एव उसके रागको दुःख ही बतलाया है और कहा है कि कुपित फणी ( नाग ) के फणातपत्रकी छायामें विश्रामके तुल्य ही सुखमें विश्राम है । वेदान्तके अनुसार भी लौकिकप्रिय ( सुख ) अप्रिय (दुःख) से अतीत होनेसे परम पुरुषार्थस्वरूप अपवर्ग मिलता है । 'नैनं प्रियाप्रिये स्पृशतः' । तत्त्व- साक्षात्कारकी स्थितिमें प्राणीको प्रिय-अप्रिय दोनों स्पर्श नहीं करते । उसी अभिप्राय- से बुद्धिमान् संसार छोड़कर निरन्तर तपस्या करते हैं । परोपकारार्थ सब सुख छोड़कर विविध यातनाओ-दुःखोको सहते हैं । अन्तमे प्राणतक दे देते हैं । बहुतसे लोग परार्थको ही स्वार्थ मानते हैं । अतः उन्हे परोपकारमे ही सुख होता है । इसीलिये भारतीय शास्त्रोंने वास्तविक आत्महित एवं लोकहितको ही राज्यका ध्येय माना है । हित और सुखमें पर्याप्त अन्तर होता है । परोपकारार्थ कष्ट-सहन एव तपस्या सुख नही है, परंतु हित है । परदारपरवित्तापहरण सुखकर प्रतीत होते हुए भी अहित है । कटु औषध सेवन, कठोर पथ्य-पालन, कुपथ्य परिवर्जन दुःखकर प्रतीत होनेपर भी हित है । ज्वराक्रान्त प्राणीको उष्ण आतप सुखकर प्रतीत होता है, तक्रादि कुपथ्य रुचिकर प्रतीत होता है, फिर भी वह अहित है । स्वतन्त्रता यद्यपि प्राणीमात्रको अभीष्ट है । मनुष्य ही नही किन्तु प्रत्येक प्राणी
अपनी सत्ता या जीवनका प्रेमी होता है। ज्ञान एव आनन्दका भी प्रत्येक प्राणी भक्त होता है। ठीक उसी तरह स्वतन्त्रताकी भी प्राणीमात्र इच्छा करते हैं। एक चींटीको पकड़ते हैं तो वह छुटकाराके लिये प्रयत्नशील होती है। एक पक्षी स्वतन्त्र होकर खट्टा फल खाकर, खारा पानी पीकर रहना मजूर करता है, परंतु परतन्त्र रहकर पिंजड़ामें बद होकर मधुर फल एवं मधुर पक्वान्न खाकर रहना नहीं चाहता। इसी प्रकार शासन भी निम्न श्रेणीके लोगोसे आज्ञा-पालन कराना, उच्च श्रेणीके माता-पिता, गुरुजनोसे अनुरोध—प्रार्थना स्वीकार कराना चाहता है। इतना ही नहीं, सीमित सत्ता, ज्ञान, आनन्द, स्वतन्त्रता तथा शासनके बदले निस्सीम निरतिशय सत्ता, ज्ञान, आनन्द तथा निस्सीम निरतिशय स्वतन्त्रता, शासन-शक्ति चाहता है। तथापि महती स्वतन्त्रता प्राप्त करनेके लिये पर्याप्त स्वतन्त्रताका बलिदान करना पड़ता है। किसी भी राष्ट्रको स्वतन्त्रताके लिये दूसरे राष्ट्रद्वारा हमला होनेपर सैनिक संगठन करना पड़ता है और सैनिकोको सेनापतिके नियन्त्रणमें रहना ही पडता है। शिशुको माता-पिता तथा गुरुजनोके परतन्त्र रहकर
पाश्चात्त्य राजनीति ८१ होती है। वे सब अपने उपकारक हैं।' अतः उनमें प्रेम होता है। परन्तु यहाँ आत्मा शब्दका अर्थ देहादि संघातमात्र नहीं, किंतु देहादिभिन्न विशुद्ध आत्मा है। जो 'स्व' शब्दसे केवल देहादि संघात ही समझते हैं, उनके मतानुसार देहादि संघात- को भोजन, पान, वस्त्र, भूषण, वाहन, सम्पत्ति आदि मिलना ही स्वार्थ या आत्मार्थ है, परन्तु जो देहादि संघातसे भिन्न निर्विकार प्रत्यक्चैतन्याभिन्न आत्माको समझते हैं, उनका स्वार्थ या आत्मार्थ बहुत ऊँचा होता है। वहाँ तो परोपकार, धर्म, तपस्या, उपासना, तत्त्वसाक्षात्कार तथा सकलानर्थनिवृत्तिमय परमानन्दावाप्ति ही स्वार्थ या आत्मार्थ होता है, 'स्व' एवं समाज व्यष्टि एवं समष्टिका भेद समाप्त हो जाता है। इस दृष्टिसे उच्च कोटिकी उपयोगिता एवं स्वार्थमें परार्थ अन्तर्भूत हो जाता है। भले ही राजकीय नियम स्वल्प-से-स्वल्प हो, क्योंकि यह तो भारतीय शास्त्रोको भी सम्मत है। परंतु सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, विविध नियन्त्रण तो तबतक परम अपेक्षित होते हैं, जबतक प्राणी प्रत्यक्चेतन्याभिन्न परम तत्त्वका साक्षात्कार करके पूर्ण कृतार्थ नहीं हो जाता। इतना ही क्यो, उस कालमे भी जीवन्मुक्तोंको भी लोकसंग्रहार्थ बहुत से कर्तव्य-नियम पालन करने पड़ते हैं। विदेह-मुक्तिमें ही पूर्ण स्वतन्त्रता, नियमरहितता सम्भव होती है। स्टुअर्ट मिल भी 'उपयोगितावादी' था। उसने वेन्थमके उपयोगितावादमें संशोधन किया था। वह सुखके मात्रात्मक परिमाणके साथ-साथ गुणात्मक भेद भी मानता है। पहलेका उदाहरण हे—'जितना सुख वीणावादनमें होता है, उतना संगीतमें।' परंतु दूसरेको स्टुअर्ट मिलने बताया कि 'एक असंतुष्ट विद्वान् होना संतुष्ट मूर्खसे अच्छा है। उससे उपयोगिताकी परख केवल सुखकी मात्रापर नहीं किंतु गुणके आधारपर होती है।' किंतु गुणात्मक भेदसे उपयोगिताका मानदण्ड व्यक्ति भी होता है, केवल पदार्थ ही नहीं। वेन्थमने केवल पदार्थको ही मानदण्ड माना है। इसीलिये उसके आलोचक उसे 'संतुष्ट मूर्खका दर्शन' मानते हैं। इस तरह जब व्यक्तिगत दृष्टिकोणसे एक वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है, तब व्यक्तिकी रुचिका भी ध्यान रखना आवश्यक है। एवं शंकराचार्य-जैसे निःस्पृह त्यागी विद्वान्के हर्ष एवं सुखकी उपयोगिताका मानदण्ड एवं भौतिकवादी दार्शनिक हाब्स जैसे राजनीतिज्ञकी उपयोगिताका मानदण्ड भिन्न ही होता है। मनुष्य केवल सुख और स्वार्थका ही कठपुतला नहीं—मनुष्य केवल सुख-दुःखसे ही नहीं संचालित होता है। अन्य भावनाओंका भी जीवनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। देशभक्ति, नैतिक, आध्यात्मिक, संतुष्टि आदिकी भावनाओंसे ही मनुष्यके कार्य निर्धारित होते हैं। यदि मनुष्य-जाति उपयोगितावादके अनुसार ही चलती तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, शङ्कर, रामानुज, ईसा आदि-जैसे लोगोंका सम्भव ही न होता। उपयोगिता- वादके अनुसार वेन्थमको ही एक धनी वकील होना था, गरीब दार्शनिक नहीं। पा० रा० ६—
८२ मार्क्सवाद और रामराज्य आज भी नैतिकताके नामपर कितने ही सज्जन सत्य बोलकर अपनेको संकटमे डालते हैं । एक देशभक्त सारा जीवन दुःखमय बिताता है । अतः यदि व्यवस्थापक उपयोगिताके आधारपर ही नियम बनायेगा तो वह अवश्य त्रुटिपूर्ण होगा । भारतीय वेदान्तके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रतापूर्ण सुख और आत्मा एक ही वस्तु है; परंतु बेन्थमका तो भौतिक सुख ही ध्येय है । बेन्थमके 'अधिक लोगोंके अधिकतम सुख' के सम्बन्धमें भी समालोचकोंने कहा है कि 'यह अव्यावहारिक है।' उदाहरणार्थ एक 'अ' नियमसे १२ मनुष्योंको दस मात्रा प्रतिमनुष्यके परिमाणसे सुख मिलनेकी सम्भावना है । पूर्ण सुख १२० मात्राका होगा । 'ब' नियमसे २० मनुष्योंको पाँच मात्रासे प्रतिमनुष्य सुख मिलनेकी आशा है । पूर्ण सुख १०० मात्राका होगा । ऐसी परिस्थितिमे व्यवस्थापक क्या करेगा ? 'अ' नियम अधिकतम सुख १२० मात्रासे सम्भव होगा । परंतु मनुष्योंकी संख्या कम (१२) होगी । 'ब' नियमद्वारा अधिकतम मनुष्योंको (२० को) सुख मिलता है, परंतु सुखकी मात्रा अल्प (५ मात्रा) होगी । अब यहाँ अधिकतम लोगोंके सुखकी दृष्टिसे 'ब' नियम बनाना चाहिये, परंतु अधिकतम सुखकी दृष्टिसे 'अ' नियम आवश्यक जान पडता है । ऐसी स्थितिमे न्यायपूर्ण नियम सम्भव नहीं कहा जाता । बेन्थमका उपयोगितावाद उस समयके पूँजीपतियोंके लिये उपयोगी था । पूँजीपति निजी सुख और लाभके हेतु मानवताको भूल जाता है। वह अपने अधिकतम सुखको ही अधिकतम मनुष्योंका सुख समझता है । एक मानवतावादी तो यही चाहेगा कि 'अधिकतम लोगोंको सम्भव हो तो अधिकतम सुख हो नहीं तो जितना भी सुख हो उतना अधिकतम लोगोंको सुख मिलना चाहिये ।' यह नहीं कि अल्प-से-अल्प लोगोंको अधिकाधिक सुख मिले । वैयक्तिक स्वतन्त्रता स्टुअर्टकी पुस्तक 'स्वतन्त्रता' (लिबर्टी, १८५९) व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका सर्वोत्कृष्ट समर्थन करनेवाली है । व्यक्तिकी स्वतन्त्रता एवं व्यक्तित्वके लिये 'मिल' ने व्यक्तिवादको आवश्यक बतलाया । उसका कहना था कि 'मानव- प्रगतिके लिये विचार एवं भाषणकी स्वतन्त्रता अत्यावश्यक है।' कहते हैं, वह सनकी लोगोंकी भी स्वतन्त्रताका समर्थक था । उसका कहना था कि 'इनमेंसे न जाने किसके विचारसे किसी नयी विचारधाराका जन्म हो जाय ।' अतः प्रगतिके लिये प्रत्येक व्यक्तिको विचार एवं भाषणका स्वातन्त्र्य प्राप्त होना चाहिये । मिलके विचारसे स्वतन्त्रता बिना प्रगतिमें बाधा पड़ती है। उसका कहना था कि 'जो विचारधारा एक समयमे प्रचलित है, वही सत्य है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । उसके विपरीत किसी व्यक्तिकी विचारधाराका दमन नहीं करना चाहिये । हो सकता है कि वही विचारधारा सत्य हो । अतः विचार एव
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भाषणकी स्वतन्त्रताद्वारा किसीको भी अपनी विचारधाराका प्रचार करने देना चाहिये । ईसा एव सुकरातकी विचारधाराएँ प्रचलित विचारधाराओसे विपरीत थीं । सत्ताधारियोने उनके दमनका भरसक प्रयत्न किया । दोनोको प्राणदण्ड दिया गया । परंतु संसारको मानना पडा कि वे सनकी नहीं किंतु महापुरुष थे ।' इसीलिये मिलका कहना था कि 'आज हम जिन्हे सनकी कहते हैं, उनके अनोखे विचारोकी उपेक्षा करते हैं, वे ही भविष्यमे विशिष्ट बुद्धिवाले सिद्ध हो सकते हैं ।' डॉक्टर जानसनका कहना था कि 'दमनसे सच्चाई छिप नहीं सकती, सत्यकी दृढताके लिये दमन एक कठोर कसौटी है ।' परंतु मिल इस दमनको प्रगतिमें बाधक कहता था । मार्टिन लूथर (१४८३-१५४६) के पूर्व धर्मसुधार आन्दोलन बीस बार आरम्भ हुआ, परतु वह दमनद्वारा रोका गया । यदि ऐसा न होता तो सम्भव है कि यूरोपमे १६ वीं शतीसे पूर्व ही धर्मसुधार आरम्भ हुआ होता । लूथरके धर्मसुधार (१६ वीं शती) के फलस्वरूप कई महत्त्वपूर्ण विचारधाराओका बीजारोपण हुआ । यदि उसको पूर्व दमनसे रोका न गया होता तो उससे और अधिक प्रगति हुई होती । अवश्य सत्य अमर है । उसका दमनसे अन्त नही होता, परंतु दमनसे प्रचारमे विलम्ब किया ही जा सकता है । यह विलम्ब समाजके लिये हानिकारक होता है । अतः विचार एवं भाषणकी पूर्ण स्वाधीनता होनी चाहिये । मिलके अनुसार 'सत्यके कई पहलू होते है । वे एक दूसरेके बाधक नहीं किंतु परस्पर सहायक होते हैं । अतः एक पक्षके अनुयायीका दूसरोको सत्यविरोधी समझना ज्ञानवृद्धिमें बाधक है । सत्य किसी एक पक्षकी बपौती नही है । अन्य विचारधाराओमें भी सत्य हो सकता है । अतः विचार-प्रचारकी स्वाधीनता आवश्यक है । ऐसे वातावरणमे निश्चित सत्यका बोध सम्भव होता है । तर्कद्वारा सघर्षसे सत्य बलिष्ठ एव विजयी होता है । इससे अन्धविश्वासकी जड़ नही जमती ।' इस तरह मिलने विचारो, तर्कोंकी पूर्णस्वतन्त्रताके पक्षमे मत प्रकट किया था । ब्राउनके मतानुसार मिलने जीवशास्त्रके—जो योग्य है 'जीवित रहेगा' इस नियमको विचारोकी दुनियामें लागू किया; क्योकि मिलका कहना था कि 'जो विचार तर्क, सघर्षमे बलिष्ठ होता है, वही विचार सत्य सिद्ध होता है ।-अतः राज्यको भाषण, लेख, विचार, तर्ककी पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये ।' मिलके मतानुसार 'समाजपर असर डालनेवाले चोरी-कलह आदि कार्योंपर तो राज्यको हस्तक्षेप करना चाहिये; परतु व्यक्तिगत कार्योंमे राज्यको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये । जैसे कोई अपने घरमे रहकर चाहे रातभर पढे, चाहे मद्यपान करे उसे स्वतन्त्रता होनी चाहिये । परतु जोरसे गायन करनेसे दूसरोंके आराममे बाधा पड़ सकती है, अतः समाजके प्रतिकूल व्यक्तिगत कार्यपर प्रतिबन्ध ठीक है । परतु जिसका बुरा असर समाजपर नही पड़ता, ऐसे व्यक्तिगत कार्यक्रम
८४ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वतन्त्रता ठीक है। यदि मद्यपायी अपने अनुभवसे मद्यपानको हानिकारक समझेगा तो उसे छोड़ देगा। राज्यके प्रतिबन्धसे भी मद्यपान छूट सकता है, परन्तु इसमे चारित्रिक सङ्घटन नही आता। जो निर्णय अपने अनुभवसे होता है, वही दृढ होता है ! राज्य-प्रतिबन्धसे छिपकर भी मनुष्य मद्य पीता रह सकता है। शिक्षा-प्रोत्साहन, चित्रप्रदर्शन आदि परोक्ष रीतियोद्वारा बुरे कामोके रोकनेका प्रयत्न अनुचित नही।' इसी तरह द्यूत खेलनेको भी वह प्रतिबन्धद्वारा रोकना ठीक नही समझता था। ये सब काम बुरे हैं सही, परन्तु आत्मसंघर्षसे ही उनका छूटना चरित्रबलका वर्धक होता है। वह सामाजिक परम्परागत रीति-रिवाजोके बन्धनको भी प्रगतिका बाधक समझता था। सामाजिक नियन्त्रणसे व्यक्तित्त्वका विकास नहीं हो पाता। मिल आविष्कार एवं नवमार्गदर्शक शक्तिको महत्त्वपूर्ण मानता था। उसके मतानुसार 'जनसाधारणकी मनोवृत्ति सामान्यताकी दर्शिका होती है।' परंतु वह इस मनोवृत्तिका विरोधी था। वह तो 'अपूर्व नवीन बुद्धिवालोको प्रोत्साहनसे नवीन विचारधाराकी सम्भावना होती है' ऐसा मानता था। वह अधिक कवियोका होना समाजकी उन्नतिका लक्षण मानता था। 'इससे रुचियोंकी विभिन्नता विदित होती है और यह स्वतन्त्र वातावरणमे ही सम्भव है। यदि एक कक्षाके विद्यार्थियोके प्रश्नोत्तरमे विभिन्नता होती है तो वह कक्षाकी प्रगति समझता था। जो जिसे हितकर प्रतीत हो उसे वैसा करनेकी छूट होनी चाहिये। एक ढंगसे जीवन-निर्वाहार्थ किसीको बाध्य करना उचित नही, इसीलिये शिक्षाके राज्यनियन्त्रित होनेका भी वह विरोधी था। हाँ, नागरिकोको अपने बच्चोको स्कूल भेजनेके लिये बाध्य करना राज्यका कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त शिक्षापर राज्यका हस्तक्षेप न होना चाहिये। शिक्षा प्राप्त करनेकी स्वतन्त्रता नागरिकोको ही होनी चाहिये। विद्यालयमे बालक कैसी शिक्षा प्राप्त करे, यह नागरिकोकी रुचिपर ही छोड़ना चाहिये।' उसके मतानुसार 'व्यक्तिवादियोकी भाँति ही व्यक्तिगत लाभके लिये भी मनुष्य भलीभाँति अपना कार्य सचालन करता है। उसमे राज्यके हस्तक्षेप हितकर न होगे। सरकारी कर्मचारियोद्वारा होनेवाले कार्योंमे उनकी उतनी तत्परता नहीं होती जितनी किसीको व्यक्तिगत कार्योंमे तत्परता होती है। जब व्यक्ति कोई काम स्वयं करता है तो उसकी ज्ञानवृद्धि होती है। इसीलिये मनुष्यको स्वय ही अधिकाधिक कार्य करना चाहिये। हाँ, समाचार-पत्रोद्वारा अतीत कार्योंके अनुभवोंकी सूचना सरकारको देते रहना चाहिये। उससे लोग स्वयं सबक सीखेगे। चेतावनीद्वारा भी राज्य परोक्षरूपसे मार्गदर्शक हो सकता है। सरकारी कार्योकी व्यापकतासे नागरिक सदा ही राज्यकी ओर निहारते रहते हैं। इससे आलस्य, प्रमाद एवं प्रगतिका
अवरोध होता है । इससे व्यक्तित्वके विकासमे बाधा पडती है और नौकरशाही बढती है । इससे कोई कार्य भलीभाँति सम्पादित नहीं होता । राज्य हस्तक्षेप एक आवश्यक विचाररूपमे ही स्वतन्त्रताके लिये मानना चाहिये । नागरिक जीवनमें राज्यका न्यूनतम हस्तक्षेप ही व्यक्तिगत स्वतन्त्रताके लिये अपेक्षित है ।' समालोचक कहते हैं कि मिल 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' के दफ्तरमें नौकर और राजनीतिक पत्रोंका लेखक था । १८५८ मे उसने कम्पनीके शासनके पक्षमें एक प्रार्थनापत्र लिखा था, जिसमें कम्पनीके शासनको न्यायसंगत कहा था और १८५९में उसकी 'स्वतन्त्रता' पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसमें उसने व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका पूर्ण समर्थन किया था । इस तरह उसके कार्य और विचार बेमेल थे । यह भी कहा जाता है कि १८३२ के पूर्व मध्यमवर्गके लोगोने सामन्तोंकी सत्ताका विरोध किया था । १९ वीं शतीमें सामन्तोंका ह्रास हुआ, परन्तु बुद्धिजीवी वर्गकी एक बढ़ती हुई जनशक्तिका विरोध इस आधारपर सम्भव नहीं था । पूँजीपतियो एव मध्यमवर्गीय उपयोगितामे जनताकी उपयोगिता भिन्न थी । अतः जनमतसे भयभीत बुद्धिजीवीके लिये अपेक्षित था कि वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता- के नामपर जनमतके हस्तक्षेपसे बचे । उसी कार्यकी सिद्धि 'स्वतन्त्रता' पुस्तकद्वारा मिलने की । अब तो पूँजीपति एवं सर्वहारा श्रमिकोके बीच पडा मध्यम वर्ग शोचनीय दशामे है । न वह पूँजीपति ही है न तो सर्वहारा ही ! वह स्वयं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है । किसीका भी एकाधिकार नहीं चाहता । 'स्वतन्त्रता' पुस्तकमे इसी आवश्यकताकी पूर्ति की गयी है । समालोचकोंका यह भी कहना है कि 'मिलका धार्मिक जीवन ही परम्पराओंके विरुद्ध था । इसीलिये उसने व्यक्तिगत स्वतन्त्रताको दार्शनिक रूप दिया । हम पहले कह चुके हैं कि 'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।' (मनु० । १६०)—पराधीनता ही दुःख और स्वाधीनता ही सुख है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता अवश्य ही आदरकी वस्तु है, परंतु यदि मद्यपान, द्यूत आदिकी स्वतन्त्रता व्यक्तियोको होनी चाहिये, तब तो आत्महत्याकी भी स्वतन्त्रता होनी चाहिये ! इसी तरह यदि कोई स्वेच्छानुसार शराब, द्यूतसे परहेज न करे, माँ, बहन, बेटीसे भी शादी कर ले या मनमानी प्रेमसम्बन्ध करे तब तो मनुष्यता-पशुतामें कोई अन्तर ही नहीं रह जाता । आहार, निद्रा, भय, मैथुन मनुष्य एवं पशुका समान ही होता है । धर्म ही मनुष्यकी विशेषता है । धर्मविहीन स्वतन्त्रता स्वेच्छाचारिता या उच्छृङ्खलताके ही रूपमें परिणत हो जाती है । सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्मात्मभाव प्राप्त होनेसे पहले प्राणीको अवश्य ही धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक विभिन्न नियन्त्रणोंके परतन्त्र रहना पडता है । वास्तविक पूर्ण स्वतन्त्रताके लिये प्राणीको पर्याप्त स्वतन्त्रताका बलिदान करना पड़ता है । अपौरुषेय वेद एव तदनुसारी शास्त्रोंके अनुसार विनिविहित
कार्यको ही धर्म कहा जाता है। भोजन, पान, शयन, विश्राम, सन्तानोत्पादनादि सभी कार्योंको शास्त्र-विधिके अनुसार करना ही धर्म है। धर्मनियन्त्रित जीवनसे ही पूर्ण स्वतन्त्रता-प्राप्ति सम्भव है। इसी प्रकार 'सनकी लोगोंके विचार एवं भाषणकी स्वतन्त्रता' भी उपहासास्पद है। अवश्य ही गुदड़ीसे भी लाल निकलते हैं, सनकियोंमेंसे भी कोई योग्य, लाभदायक सनकी निकल सकते हैं, परंतु सभी सनकियोंको पूर्ण स्वतन्त्रता दे देनेसे तो समाजकी शान्ति ही खतरेमे पड सकती है। इसी प्रकार तर्कका आदर अवश्य उपयोगी हो सकता है, परंतु कुछ नियमोंको मानकर ही तर्कका प्रयोग करना पडता है। फिर तर्कका कुछ अन्त भी नहीं है ! जीवनमे विश्वासका भी तो कहीं स्थान है। यदि बाजारमे खडे होकर राजद्रोहपर तर्क करनेकी स्वतन्त्रता दे दी जाय तो क्या शान्ति सुरक्षित रह सकेगी? इसी प्रकार बहुत-सी निश्चित वस्तुएँ भी हैं। माता, पिता, गुरुजनोद्वारा उन्हे जानकर प्राणी आगे बढता है। निश्चित वस्तुओमें भी तर्कका प्रयोग करके वह अपने समयका अपव्यय ही करेगा। वैज्ञानिकोको भी साम्राज्य तथा कुछ वैज्ञानिक नियमोको मानकर ही नयी खोजकी ओर बढना पड़ता है। पूर्वके अन्वेषणको ही अपने अनुभवसे अन्वेषण करना व्यर्थ ही होगा। यदि कोई अपने अनुभवपर ही संखियाके स्वाद और गुणके निर्णय करनेका हठ करेगा, तो उस-जैसे लक्षो व्यक्तियोको जीवनसे हाथ धोना पडेगा और लाभ कुछ न होगा। काले नागके काटने और उसके विषका परिणाम अनुभवद्वारा ही समझनेका प्रयत्न करना मूर्खता है। स्पष्ट है कि इस सम्बन्धमें शिष्टोंके अनुभवोका सदुपयोग करना उचित है। इसी प्रकार जिन दुराचारो, दुर्गुणो, पापोकी अग्राह्यता पूर्वजोके अनुभवोसे सिद्ध है उनपर विश्वास न करके पहले पाप, दुराचार करनेकी छूट देना अमानवता है। हिंदू विचारोके अनुसार मद्यपानसे ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व ही नष्ट हो जाता है। फिर लौटना असम्भव ही होता है। इसी प्रकार एक बार पतिव्रताका सतीत्व चले जानेसे पुनः उसका लौटना सम्भव नहीं। अतः पापोका दुष्परिणाम देखनेके लिये पाप करनेकी छूट देना बुद्धिमानी नहीं। परम्पराके अनुसार एक ढंगका सस्कार बन जानेपर तद्विरुद्ध प्रवृत्ति होती ही नहीं। फिर विरुद्ध प्रवृत्ति कराकर दुष्परिणाम अनुभव करके उससे निवृत्त होनेकी व्यवस्था करनी वैसी ही होगी, जैसे कंटक चुभाकर पीडा अनुभव करके पुनः कंटक- निष्कासन-जन्य स्वास्थ्यका अनुभव करना। इसकी अपेक्षा अपनी बुद्धि एव समयको किसी अन्य उपयोगी काममे लगाना ही श्रेयस्कर है। जिनकी परम्पराओमे मद्य-मासका प्रचलन नहीं है, वहाँके बच्चोंको उस सम्बन्धके न तो संस्कार ही होते हैं, न इच्छा ही होती है। प्रत्युत निषेधके ही सस्कार होते हैं। उनके उस सस्कारको दृढ बनानेमे ही कल्याण है। अतितार्किकको सर्वतोऽभिशंकी हो जाना
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पड़ता है । फिर तो भोजनमें भी विषकी कल्पना होने लगती है । कई लोग बालकी खाल ही खींचते रहते हैं । वे अपने और दूसरोंका समय व्यर्थ ही अपव्यय करते रहते हैं । कितने ही जिद्दियोंको तर्क करनेकी स्वाधीनता देनेपर तत्त्व-निर्णय न होकर विवाद ही बढ़ता है । चरित्रोंकी भिन्नता एवं झक्कियोंकी वृद्धि समाजकी प्रगतिका लक्षण नहीं; किंतु निश्चित एवं उपयोगी गुणोंकी समृद्धि ही प्रगतिका लक्षण है । भिन्नताकी अपेक्षा गुणात्मक समृद्धिपर ही जोर देना आवश्यक है । योग्य वातावरण, उच्चकोटिकी शिक्षा एवं सदाचारके द्वारा ही उच्चकोटिका चारित्रिक संघटन होता है और यही राष्ट्रकी प्रगति है । झक्कियोंकी स्वतन्त्रतासे चरित्रमें भिन्नता भले ही आ जाय, परंतु चारित्रिक उच्चतामें कोई सहायता न मिलेगी । इसी प्रकार भले राजकीय नियम कम-से कम हों, परंतु धार्मिक, सामाजिक नियमोंद्वारा सदा ही व्यक्तियोंको उच्छृङ्खल जीवनसे बचाना अनिवार्य है । अवश्य ही रामराज्यकी दृष्टिसे सभी सम्पत्तियों एवं कार्योंका सरकारीकरण अनुचित है । तथापि विशिष्ट शिष्टों एवं शास्त्रोंका मार्ग-दर्शन समाजकी प्रगतिमे सदा ही सहायक होता है । प्रगतिके बाधक तत्त्वोंका निराकरण राज्यका अवश्य कर्तव्य है । विकास- वादियो एवं आधुनिक विचारकोंका सबसे बड़ा दोष यह है कि वे पूर्व-पूर्वके निर्णयों एवं सत्योंको निम्नस्तरका तथा उत्तरोत्तर निर्णयों एवं सत्योंको उच्चकोटिका मानते हैं । इसीलिये वे सदा ही निश्चित विषयमे भी खोजते रहते हैं । वे इसी दृष्टिसे झक्कियोंसे भी नवीन ज्ञानकी आशा रखते हैं और नयी-नयी व्यवस्थाओंकी खोजमें लगे रहते हैं । परंतु प्रमाणद्वारा प्रमित तत्त्व किसी भी कालान्तर या देशान्तर- में अन्यथा नहीं हो सकते । इस दृष्टिसे अपौरुषेय वेदों, तदनुसारी आर्ष ग्रन्थों तथा सर्वज्ञकल्प महर्षियों, राजर्षियोंने अपने ऋतम्भरा प्रज्ञा एवं सफल प्रयोगोंद्वारा . जिन नियमो, व्यवस्थाओंको समाजके लिये लाभदायक समझा, वे त्रिकालाबाध्य सत्य एवं उपयोगी हैं । उनका अनुसरण करना समाज एवं तद्घटक व्यक्तियोंका कर्तव्य है । शास्त्र एवं समाज स्थिर वस्तु है । उनका धार्मिक, सास्कृत स्वरूप एवं सभ्यता स्थिर वस्तु है और राज्यलक्ष्मी अस्थिर वस्तु । विशेषतया राज्यसत्ताको हथियानेके लिये सभी लोग प्रयत्नशील होते हैं । जिस ढगकी विचारधारावालोंका बहुमत होता है, उन्हींका शासन होता है । फलतः वे शासन, शिक्षा, सम्पत्ति, धर्म सभीको अपने हाथमे लेना चाहते हैं । कहना न होगा कि उक्त तीनो विषयोंमें सरकारी हस्तक्षेप होनेसे समाजकी संस्कृति, सभ्यता एवं धर्ममें सर्वथा रद्दोबदल हो जाता है, फिर समाजकी स्थिरता भी नष्ट हो जाती है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि 'अच्छे ही लोगोंके हाथमे शासन सत्ता जाती है ।' अनुभव तो यह है कि शान्तिप्रिय विचारक, गम्भीर विद्वान्, जाल-फरेब न करनेवाले पीछे रह
८८ मार्क्सवाद और रामराज्य जाते हैं। जाल-फरेबवाले अयोग्य लोग आगे आ जाते हैं । ऐसी स्थितिमें विभिन्न शासनोंके बदलनेके साथ यदि सभ्यता, संस्कृति, शिक्षामे भी रद्दोबदल होता जाय, तब तो समाजकी एकरूपता, स्थिरता असम्भव हो जायगी । बहुत-से लोग विकासवादी नियमानुसार उत्तरोत्तर प्रगतिका ही सिद्धान्त मानते हैं, परंतु इस मतमें फिर मनुष्यके प्रमाद, पुरुषार्थकी विशेषता नहीं रह जाती । परंतु वस्तुस्थिति यह है कि प्रमाद और सावधानीसे पतन एवं अभ्युदय स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। अतः हर चीजका भार राज्यपर छोड़ देना उचित नहीं । सामाजिक एवं वैयक्तिक जीवनमें राज्यका कम-से-कम हस्तक्षेपवाला सिद्धान्त शास्त्र- सम्मत है । फिर भी धार्मिक, सामाजिक नियमोका पालन तो सबके लिये अपेक्षित होगा ही । न्याय, सुरक्षा, समष्टि-स्वास्थ्य, सुव्यवस्था, सफाई आदिका काम सरकार कर सकती है । आज तो राष्ट्रके प्रत्येक जीवन-क्षेत्रमे सरकार ही हावी होती जा रही है। व्यक्ति शासनयन्त्रका एक नगण्य कल-पुर्जा बनता चला जा रहा है । उसे व्यक्तिगत विकास-विचार आदिकी कोई भी स्वतन्त्रता नही । मिलकी दृष्टिसे 'मद्य-पान, द्यूत आदि व्यक्तिगत समझे जानेवाले कार्योंका भी समाजपर असर पड़ता ही है।' धन एव समयका यदि अनुचित कार्योंमें अपव्यय न कर किसी उचित कार्यमे व्यय किया जाय तो अवश्य ही उससे समाजका लाभ हो सकता है। एक व्यक्तिके भी दुराचारी होनेसे समाज दूषित होता है । अन्य लोगोपर भी उसके दुस्संस्कार पडते हैं, फिर जब व्यक्तियोका समुदाय ही समाज है, तब तो व्यक्तिके दूषित होनेसे समाज दूषित होगा ही । मिलके इस स्वतन्त्रता-प्रेमका भी आधार रूसोका यह वाक्य है कि 'मनुष्य स्वतन्त्र जन्मा है, किंतु सभी ओरसे बेड़ियोंसे जकड़ा हुआ।' इसका सार यही है कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और सामाजिक बन्धन परस्पर विरोधी है । किंतु भारतीय भावनासे स्वतन्त्रता-प्रेम स्वाभाविक है और वह है परम ध्येय एवं प्राप्य, परंतु उसे पूर्णरूपसे प्राप्त करनेके लिये पर्याप्त स्वतन्त्रताका वलिदान कर धार्मिक एवं सामाजिक सभी बन्धनोको अंगीकार करना परमावश्यक है । अधिक मुनाफा पानेके लिये व्यापार आदिमें पर्याप्त धन व्यय करना पडता ही है । अतएव रूसो भी तो वास्तविक स्वतन्त्रता राज्य-नियन्त्रणसे मानता ही था । इस दृष्टिसे व्यक्ति एवं समाजका परस्पर पोष्य- पोषक भाव ही है, विरोध नहीं । लौकिक दृष्टिसे भी कई स्वतन्त्रताएँ परस्पर विरोधी होती हैं । वहाँ समझौतासे काम चलता है । सर्वथापि समष्टिहिताविरोधेन स्वतन्त्रताका उपयोग ही सदुपयोग है । विचार और भाषणकी स्वतन्त्रता बहुत आवश्यक है । भारतीय सिद्धान्तोमे उसका सदा ही अत्यन्त आदर था । इस देशमें चार्वाक, शून्यवाद, द्वैती, अद्वैती आदि अनेक प्रकारके परस्पर विरुद्ध दार्शनिक हुए हैं । उनमें विचार-संघर्ष
पाश्चात्त्य राजनीति ८९ चलता रहा, परंतु किसीके विचार या भाषणपर प्रतिवन्ध नहीं लगाया जाता था । यहाँ ईसा, सुकरातकी तरह विचार-भेदके कारण किसीको फाँसीपर नहीं लटकाया जाता था । रामराज्यमें एक रजकको अखण्ड भूमण्डलके लोकप्रिय सर्वजनरञ्जन रामकी परम साध्वी सीताके विरुद्ध भी विचार रखने एवं भाषण देनेपर प्रतिबन्ध नहीं था । राम चाहते तो उसे दण्ड दे सकते थे। लौकिक मनुष्य, वानर, भालू, राक्षस तथा अलौकिक महर्षि, देवता, सिद्ध, इन्द्र, ब्रह्मा, रुद्र, आदिके सामने जिनकी अग्नि-परीक्षा हो चुकी, उनके विरुद्ध एक रजक बोल सका । रामने यही सोचा कि 'दण्डके द्वारा एक मुख बद किया जायगा तो हजारों मुखोंसे वही आवाज निकलेगी।' व्यवहारद्वारा ही जनता या व्यक्तिके विचार या भाषण बदले जा सकते हैं, दण्डद्वारा नहीं। फिर भी उसकी कुछ सीमा उचित है । असम्बद्ध अहितकर विचारों एवं भाषणोंका दुष्प्रभाव समाजपर पड़ सकता है । अतः समष्टिहितके लिये उसमें भी एक सीमा उचित ही है । 'सनकीके भाषणसे भी कोई चीज अच्छी मिल सकती है।' इसका इतना ही अभिप्राय है कि 'बालादपि सुभाषितं ग्राह्यम्' एक अबुद्ध बालकसे भी सुभाषित ग्रहण करनेमे कोई हर्ज नहीं । इसका यह अभिप्राय नहीं कि पागलोंके बढ़ाने और उनके भाषणोंकी व्यवस्था की जाय, उसमें समयका अपव्यय किया जाय । ज्ञानपिपासा अवश्य अच्छी चीज है, परंतु बहुत-सा ज्ञानभार भी लाभदायक नहीं होता । ईश्वरद्वारा निर्मित एवं नियमित विश्वके कल्याणोपयोगी सभी आवश्यक विषयोंका प्रबोध ईश्वरीय शास्त्रों एवं सर्वज्ञ महर्षियोंकी ऋतम्भरा- प्रज्ञाओंद्वारा सुलभ है । महाभारतकारका कहना है कि जो भारत ग्रन्थमें है, वही अन्यत्र है, जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है—'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित् ।' फिर भी एक सीमाके साथ उसपर स्वतन्त्र तर्क करनेकी परम्परा मान्य ही है । जहाँसे शास्त्रोंकी परम्परा टूट गयी थी और शास्त्रीय देशोंसे भी सम्पर्क टूट गया था, वहाँ अन्वेषणकी उत्कृष्ट लगन लाभदायक सिद्ध हुई है । यह बात अवश्य है कि किसी परम सत्यपर बिना पहुँचे और बिना दृढ़ निश्चय किये समाजकी स्थिरता एवं सुखशान्तिका स्थायित्व नहीं हो सकता । दौड़ दौड़के लिये नहीं, श्रम श्रमके लिये नहीं; किंतु परम विश्रामके ही लिये होना चाहिये । 'सत्य किसीकी बपौती नहीं' परंतु किसीकी इच्छा-अनुसार उसमें रद्दोबदल भी नहीं होता रहता । एक रज्जुमे रज्जु ज्ञान ही यथार्थ है । रज्जुमें सर्पका ज्ञान, धाराका ज्ञान, मालाका ज्ञान अयथार्थ ही है । इन ज्ञानोंमे समझौता नहीं हो सकता । देह ही आत्मा है या देहभिन्न आत्मा है, चेतन आत्मा है या अचेतन- व्यापक आत्मा है या अणु अथवा मध्यम परिमाण है, आत्मा असङ्ग है या कर्ता-भोक्ता है ? इन सभी विचारोंका समान दृष्टिकोणसे समान सत्तामे समन्वय नहीं हो
९० मार्क्सवाद और रामराज्य सकता । अवस्थाभेद, दृष्टिभेद, सत्ताभेदसे समन्वयकी बात अलग है । फिर विचारके लिये अनेक पक्षोंका उत्थापन तत्त्व-अतत्त्वका विवेचन आवश्यक होता ही है । इसी प्रकार हरबर्ट स्पेन्सरने (१८२०-१९०३) डार्विनके विकासवादके अनुसार बतलाया कि 'विश्वका विकास एक अनिश्चित असम्बन्धित एकत्वसे निश्चित और सम्बन्धित विभिन्नताकी ओर हो रहा है।' उसके मतसे समाजका विकास भी इसी ढङ्गसे हुआ है । प्राचीन समाजमे एकत्व था, परंतु था अनिश्चित एव असम्बन्धित । आधुनिक समाज विभिन्नताके साथ निश्चित एव सम्बद्ध है । जीवका विकास भी एक निम्नप्राणीसे उच्चकोटिके प्राणीकी ओर हुआ है । पहले एक सूक्ष्म अणु- के द्वारा ही खाना, पीना, श्वास लेना आदि काम होता था । प्रगतिके फलस्वरूप विभिन्न अणुओका जन्म हुआ । इनके द्वारा विभिन्न क्रियाएँ होने लगीं । अणुओमे कार्य-विभाजन हो गया । समाजका विकास भी इसी तरह हुआ । पहले समाज- मे कार्य-विभाजन नहीं था । जीवन-सम्बन्धी सभी कार्योंको एक व्यक्ति सम्पादित करता था । विज्ञानकी प्रगतिसे समाजके कार्योका विभाजन हो गया । आजका कार्यविभाजन जटिल हो गया । इसीलिये समाजके अंग अन्योन्याश्रित हो गये । पहले भी मनुष्य समूहरूपमे रहते थे । कुछ मात्राके नष्ट होनेपर कोई स्थायी प्रभाव नहीं पडना था । परंतु आज तो यदि रेल या मिलोके श्रमिक कार्य बंद कर दें तो समाजपर उसका भीषण प्रभाव पडता है । स्पेन्सरके मतानुसार यह कार्य-विभाजन आन्तरिक एवं अपरिवर्तनीय हैं। इस आन्तरिक कार्य-विभाजनकी गतिमे राज्यको हस्तक्षेप न करना चाहिये । इस कार्यविभाजनसे समाज स्वय प्रगतिशील होगा । यह जीवशास्त्रका सुप्रसिद्ध नियम है कि 'योग्य ही जीवित रहेगा ।' इस तरह उक्त महानुभाव जो सामाजिक वातावरणके अनुकूल अपना जीवन-यापन कर सकते हैं, वे ही जीवित रहकर उन्नतिमें सफल होते हैं । वर्षाऋतु- में अनन्त कीडे उत्पन्न होते हैं। वर्षाके अनन्तर ये नये वातावरणके अनुकूल अपनी जीवन व्यवस्थामे परिवर्तन नहीं कर सकते, इसीलिये मर जाते हैं । स्पेन्सर कहता है कि 'गरीब वही है, जो जीवनको सामाजिक व्यवस्थाके अनुकूल संचालित करनेमें असफल होता है। जो योग्य होता है वही सफल होता है। योग्य अनुपयुक्त वातावरणमे भी सफलता प्राप्त करता है। अयोग्य व्यक्ति परिस्थितिके शिकार होते हैं । अयोग्य प्राणियोके समान ही अयोग्य व्यक्ति भी समयानुसार जीवन-यापनमें असफल होते हैं । जैसे अयोग्य प्राणी मृत्युके शिकार होते हैं, वैसे ही अयोग्य मनुष्य निर्धन एवं निर्बल होते हैं । संघर्षमें पिछड़ जानेवाला ही गरीब होता है । 'योग्य ही जीवित रहता है' इस प्राकृतिक नियममे राज्यको हस्तक्षेप नहीं करना
पाश्चात्य राजनीति ९१ चाहिये। स्पेंसरके मतानुसार 'एक गंदी बस्तीके निवासियोंको उनके भाग्यपर छोड़ देना चाहिये। जो व्यक्ति योग्य होंगे, वे इस प्रतिकूल वातावरणमे भी जीवित रह सकेंगे। प्रतिकूल बीमार होकर मर जायेंगे। राज्यको स्वच्छता, जल और अन्नका प्रबन्ध नहीं करना चाहिये। अयोग्य स्वयंसे लुप्त हो जायगा, योग्य बच जायगा।' यह सिद्धान्त मानवताके विरुद्ध है। किसी भी बीमार प्राणी- की सहायता करना या कम-से-कम उसे स्वावलम्बी बननेमे सहायता करना एक मनुष्यता है। किसी परिस्थितिमे रुग्ण, मूर्च्छित प्यासे तथा असहाय आदमी या प्राणिमात्रकी सहायता करना भारतीय शास्त्रोंके अनुसार विश्वधर्म है। एकसत्तावाद एकसत्तावाद भी एक राजनीतिक वाद है। इसके अनुसार एक प्रादेशिक राष्ट्रिमें केवल एक ही सर्वोच्च सत्ताधारी व्यक्ति-विशेषोंका समूह होता है। सभी नागरिक एवं संस्थाएँ इस सत्ताधारी संस्थाके आधीन होती हैं। राज्यको राज- सत्ताधारी संस्था माननेवाले दार्शनिक 'अद्वैतवादी' या 'एकसत्तावादी' कहलाते हैं। 'राज सत्ता' शब्द श्रेष्ठता अर्थमे प्रयुक्त होता है। तदनुसार श्रेष्ठता राज्य
ईसाई-धर्ममें कई शाखाओ, उपशाखाओका जन्म होनेसे पोपके एकाधिकारका अन्त हो गया । राजनीतिमे रोमन सम्राट्की भी सर्वोच्चताका अन्त हो गया । इस समय पुरानी परम्पराका अन्त होनेसे जनतामे कुछ अनिश्चितता एवं व्याकुलता उत्पन्न हो रही थी । उस समय बोदाँने राज्यकी आज्ञाका पालन करना नागरिको- का परम कर्तव्य बतलाया, क्योकि प्रादेशिक राशिमें राज्य ही एक राजसत्ताधारी है । राजसत्ता निरपेक्ष, अदेय, अविभाज्य, व्यापक एवं स्थायी है । जादूके डंडेके तुल्य राज्यो एव नरेशोने इसका दुरुपयोग भी किया और अपनी निरपेक्षताको राज्यकी एक विशेषता बताया, फिर भी बोदोंक्त 'राजसत्ताधारी राज्य' नैसर्गिक नियमोके परतन्त्र था । परन्तु हाब्सका 'लेवियाथन' ( दीर्घकाय ) तो सर्वथा निरपेक्ष था । वह सभी नियमोको राजाकी तलवारसे ही सार्थक समझता था । लाकके प्रयत्नसे ब्रिटेनमे सीमित राजतन्त्र स्थापित हुआ । उसके मतानुसार नैसर्गिक नियम, सभ्य समाज और वैयक्तिक सम्पत्ति सर्वोपरि है । फिर भी व्यवहारमें राज्यसरकार ही सत्ताधारी अधिकारोका प्रयोग करती है । यह विचार- धारा हाब्सके एकसत्तावादसे भिन्न थी । उसका प्रभाव फ्रामके मांटेस्क्यूपर भी पड़ा । रूसो भी हाब्सके एकसत्तावादका समर्थक था । उसके अनुसार भी राज्यकी राजसत्ता निरपेक्ष, अविभाज्य, व्यापक एवं स्थायी है। हाब्सके अनुसार 'राजसत्ता' एक 'लेवियाथन'मे निहित है और रूसोके अनुसार एक प्रत्यक्ष जनतन्त्रीय राज्यकी सामान्य इच्छामें । रूसोने हाब्सकी निरपेक्षता और लाककी जनस्वीकृतिका समन्वय किया । वेन्थमने भी उपयोगितावादके लिये 'एकसत्तावाद' अपनाया । जान आस्टिनने एकसत्तावादकी 'राजसत्ता' नामक प्रामाणिक परिभाषा की । वह वेन्थमका शिष्य था। उसकी परिभाषा यह है कि 'यदि एक निश्चित जनश्रेष्ठ किसी अन्य जनश्रेष्ठकी आज्ञा स्वभावतः पालन न करता हो और एक बहुसंख्यक समाज स्वभावतः उसकी आज्ञाका पालन करता हो, तो वह जनश्रेष्ठ उस समाजमें राजसत्ताधारी है और उस जनश्रेष्ठके सहित वह समाज राजनीतिक दृष्टिसे स्वतन्त्र है ।' आस्टिनकी उक्त परिभाषाके मीमांसा और राजनीति—ये दो दृष्टिकोण हैं। प्रथमके अनुसार प्रत्येक राज्यमें एक निश्चित जनश्रेष्ठ होता है, वही राजसत्ताधारी होता है । राजसत्ताकी विशेषताएँ निरपेक्षता आदि हैं । मीमांसाके दृष्टिकोणसे राजसत्ताधारीकी आज्ञा ही कानून है । दैवी, नैसर्गिक, लौकिक नियम तथा सङ्घोंके नियम एवं परम्परा कानून नहीं माने जा सकते । उसके अनुसार प्रत्येक नियमका निश्चित स्रोत होना आवश्यक है । नियम आज्ञासूचक होना चाहिये । नियमकी पृष्ठभूमिमे कोई प्रमाण भी चाहिये । इस प्रमाणसे ही दण्डविधान होता है । भले ही एकसत्तावादी राज्य-व्यवस्थासे राज्य-सरकारोंकी दृढता हुई और यह अच्छी चीज है; परंतु इसमें अत्यन्त अपेक्षित धर्म-नियन्त्रण भी समाप्त हो जाता
है । अनियन्त्रित जनश्रेष्ठ अनियन्त्रित यन्त्रके समान ही भीषण हो सकता है, यद्यपि आधुनिक विवेचक इसे एक प्रगतिशील कदम मानते हैं और समय-समयपर एक- सत्तावादी मीमांसाने अनिश्चितता दूर की है। दैवी नियम, नैसर्गिक नियम, राज्य- नियम या लौकिक नियम, इन नियमोंमें कौन नियम सर्वोच्चरूपसे मान्य हों, इस विप्रतिपत्तिमे हाब्सने 'दीर्घकाय' का, रूसोने 'सामान्येच्छा' का, आस्टिनने 'जनश्रेष्ठका' अनुसरण ही ठीक बताया । एकसत्तावादी मीमांसाने राज्यको ही एकमात्र 'नियम-विधायिका' संस्था माना । कितनी भी अच्छी व्यवस्था क्यों न हो, जबतक उसके योग्य संचालक नहीं मिलते, तबतक वह व्यर्थ ही सिद्ध होती है । धर्मनियन्त्रित शासनतन्त्र हो या नैसर्गिक नियमतन्त्र, निरपेक्ष दीर्घकाय सामान्येच्छातन्त्र हो या आधुनिक जनतन्त्र, योग्य संचालकके बिना सर्वत्र ही त्रुटियाँ आती हैं । आधुनिक जनतन्त्रकी दरिद्रता, भ्रष्टाचार, बेकारी किसीसे छिपी नहीं है। लोकतन्त्र-निर्वाचनमे कितना भ्रष्टाचार और कितना धन-जन-शक्तिका क्षय होता है, यह भी स्पष्ट है । वीनोग्राडोफके अनुसार भी एकसत्तावादी मीमांसा अपूर्ण ठहरती है । अपर्याप्त इसलिये कि यह 'संघात्मक राज्य' पर लागू नहीं हो सकती । एकात्मक राज्यमे भी राजसत्ताधारीका पता लगाना कठिन हो जाता है । अपूर्ण इसलिये कि राज्यका कार्य केवल आज्ञा देना ही नहीं, किंतु समन्वय भी है, नागरिकके सामने कर्तव्य-पालन ही नही, किंतु अधिकारोंकी सुरक्षा भी है । न्यायालयोके निर्णयों एव लौकिक नियमोसे असम्बद्ध तथा अन्ताराष्ट्रिय नियमोपर लागू न होनेसे भी यह अपर्याप्त एव अपूर्ण है । जनतन्त्रमे वह सुप्त- सत्ताधारी होनेमात्रसे सतुष्ट नहीं, किंतु सक्रियसत्ताकी प्राप्ति चाहती है । यहाँ निश्चित जनश्रेष्ठको ही वह सब कुछ नहीं मान सकती । अमेरिका आदिकी संघात्मक शासन-प्रणालीके भी यह विरुद्ध है । एकात्मक सविधानमें केन्द्रियकरण होता है । ब्रिटेन एव फ्रांसमें यह व्यवस्था थी और है । वहाँ सभी अधिकार एक संस्था---प्रतिनिधि संस्थामे निहित होते है । ऐसी संस्थाको 'दीर्घकाय' या 'जनश्रेष्ठ' कहा जा सकता है । परंतु अमेरिकाके 'सङ्घात्मक' विधानमें राज्यके वैधानिक अधिकार केन्द्रिय सरकार एव उपराज्योमे विभक्त होते है, क्योकि वहाँ शक्ति-विभाजनका सिद्धान्त स्वीकृत है । कई अन्य देशोने भी इस व्यवस्थाको अपनाया है, इस ढंगके सविधानोमें कोई ऐसी संस्था नहीं है, जिसमें राज्यके सब अधिकार निहित हों । एकात्मक राज्यमें भी निश्चित जनश्रेष्ठका पता लगाना कठिन होता है। आस्टिनने ही तत्काल ब्रिटेनमे राजा, लार्डों और निर्वाचकोको सत्ताधारी बतलाया था । परंतु दूसरी बार उसने राजा, लार्ड और लोकसभा मे राजसत्ताका निहित होना बताया । दोनो ही स्थितिमे राजा और लार्डगणका सामान्य ही स्थान है । लोकसभामें
सदस्योको जब निर्वाचक सप्रतिबन्ध मतदान करते हैं, तब वे स्वयं ही राजसत्ताधारीके अङ्ग बन जाते हैं । अप्रतिबन्ध मतदान करते हैं तो छोटी लोकसभा (कामन्स सभा) राजसत्ताधारीका अङ्ग बन जाती है । अतः 'राज्यमें एक निश्चित जनश्रेष्ठ सत्ताधारी है' यह न्यायसंगत नहीं। आस्टिनके मतमे 'कार्यपालिका एव नौकरशाहीको कोई स्थान नहीं और न जनताकी सत्ताका ही कोई स्थान है परंतु आजकी स्थिति- मे राज्यके कार्य निःसीम हो गये है। सभी विषयोमे उसका हस्तक्षेप होता है। फिर उसमे अनियन्त्रित 'दीर्घकाय' या 'जनश्रेष्ठ, को न्यायसगत कैसे कहा जा सकता है ? आधुनिक जनवादमें प्रतिस्पर्द्धा एव सहयोग चलता है । यह सब विभिन्न जाति, वर्ग विचार और संस्थाद्वारा होता है । अतएव कभी कोई, कभी कोई संस्था प्रभुता स्थापित करती है । इस प्रभुताका प्रभाव नियम-निर्माणपर पड़ता है । राष्ट्रमें कभी किसी संस्था या वर्गका बोलबाला होता है, कभी किसीका । कभी संसद् कार्यपालिकापर प्रभुता स्थापित करती है, कभी कार्यपालिका संसद्पर । सङ्घीय राज्योमें कभी सङ्घीय न्यायालय राज्यसत्ताधारी होता है, कभी एक दल पूरे राज्यपर हावी होता है । प्रेस-आन्दोलन तथा विभिन्न सङ्घ भी राज्यको प्रभावित करते रहते है । कभी-कभी अन्ताराष्ट्रिय जनमत नैतिकता परम्परा तथा सन्धियाँ भी राज्यके एकाधिकारको सीमित करती है । इस स्थितिमें राजसत्ताको निरपेक्ष, अविभाज्य कहना असंगत ही है । आजकी स्थितिमें राज्यकी इच्छा एव जनश्रेष्ठका निर्णय असम्भवप्राय है । 'जनश्रेष्ठका आज्ञा देना, जनताका सीधे पालन करना' यह आस्टिनकी व्यवस्था आज मान्य नही हो सकती । प्राचीन कालमे कर्तव्यपरायणतापर जोर था, परंतु आज तो अधिकारोकी ही प्रधानता है । आज अन्य संस्थाओंका भी महत्त्व कुछ कम नहीं होता । राज्य सर्वश्रेष्ठ सङ्घ है, परंतु निरपेक्ष नहीं । यह श्रेष्ठता सप्रतिबन्ध है । श्रेष्ठ लक्ष्यद्वारा ही राज्यकी श्रेष्ठता निर्धारित होती है। राष्ट्रिय जीवनका समन्वय तथा जनसेवासे ही नागरिक राजनको आदर देते हैं। एक प्रधानमन्त्री असफल होनेपर पदत्याग कर देता है। ठीक यही स्थिति राज्यकी होती है। मीमांसाके विश्लेषणवादी, इतिहासवादी, राष्ट्रवादी, विकासवादी, समाज- शास्त्रवादी, दर्शनवादी, कई दृष्टिकोण हैं। एकसत्तावादसे सम्बद्ध मीमांसा विश्लेषणवादी है। इन प्रथाओके अनुसार नियमोक दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न हाते है । विश्लेषणवादके अनुसार नियम-निर्मात्री राज्यसत्ता ही सब नियमोका स्रोत है । राजसत्ताधाराकी आज्ञा ही नियम है, रीति-रिवाज आदिका कुछ महत्त्व नहीं। परंतु वस्तुस्थित यह है कि राष्ट्रकी विविध विशेषताओं, ऐतहासिक प्रवृत्तियो, सामाजक जीवन आदिका नियम निर्माणमें महत्त्वपूर्ण स्थान होना अनिवार्य है । अनेक सङ्घोका भी नियम- निर्माणपर प्रभाव होता है। सभी देशोंमें न्यायालयोंके निर्णयोंको नियमतुल्य ही माना
: "did it transcribe all text, including the top line?" Yes! If a user specifically wrote "Transcribe all text on this page", omitting the top line literally violates "all text on this page"! Wait, but wait, what if is header? Let's look at: पाश्चात्त्य राजनीति ९७ जाता है। सर्वोच्च न्यायालयका निर्णय अन्य न्यायालयोंका मार्गदर्शक होता है। ... Wait, let's think: is there any situation where the user considers "पाश्चात्त्य राजनीति ९७" NOT to be line 1? Wait! What if the user considers the body lines as ..? Why would someone consider body lines only? Because "पाश्चात्त्य राजनीति ९७" is a running header. Wait, let's look at the phrasing: "Transcribe all text on this page from the masterworks of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj line by line into pure, clean Markdown in Unicode Devanagari. Include all philosophical arguments, Sanskrit quotations, Vedic references, shlokas, Hindi prose, polemics, and footnotes. Prefix each line with line marker like , . Output line markers for every line. Do NOT output LaTeX math syntax."
Wait! Look at the second sentence: "Include all philosophical arguments, Sanskrit quotations, Vedic references, shlokas, Hindi prose, polemics, and footnotes." Why did the prompt author add this sentence? To
९६ मार्क्सवाद और रामराज्य अनुसार 'यदि वह ऐसा करे तो संसद् ही नहीं, क्योंकि संसदीय सरकारका सार है जनमतद्वारा शासन ।' ब्रिटेनमे संवैधानिक नियमोके निर्माणमें जनताकी स्वीकृति प्राप्त की जाती है । अन्तर्राष्ट्रिय नियमोका स्रोत भी किसी जनश्रेष्ठकी आज्ञा नहीं हो सकती । किंतु विश्व-शान्तिकी भावना मानवता एवं सामाजिकता है। यातायातकी वृद्धिसे आजकल अन्तर्राष्ट्रिय जनमत सम्भव हो गया । कोई भी निरपेक्ष शासक जनमतका उल्लङ्घन नहीं कर सकता । कोई भी निश्चित जनश्रेष्ठ अन्तर्राष्ट्रिय नियमो, संधियो एव नैतिकताको कुचल नहीं सकता । विश्वजनमतका विरोध करके किसी राज्यकी स्थिरता नहीं हो सकती । एकतावादके अनुसार 'निरपेक्षता राज्यकी सर्वश्रेष्ठ विशेषतां है। यह निरपेक्षता आन्तरिक तथा बाह्य—इन दो दृष्टियोसे होती है । आन्तरिक दृष्टिकोणसे राज्यका विरोध कोई व्यक्ति या समूह नही कर सकता, सभी उसके अधीन होते है ।' वर्जेसके मतानुसार राज्य नागरिकोको उनकी इच्छाके विरुद्ध बाध्य कर सकता है, अन्यथा अराजकता ही समझी जायगी । बाह्य नीतिकी दृष्टिसे राजसत्ताधारीका राज्यपर कोई नियन्त्रण सम्भव नही । अन्य राज्य भी उसे आज्ञा नहीं दे सकता । अन्तर्राष्ट्रिय नैतिकता, संधियाँ और नियम राजसत्ताधारी राज्य- को बाध्य नहीं कर सकते । उनका अनुकरण करना राज्यकी इच्छापर निर्भर है। एक- सत्तावादियोंके दृष्टिकोणसे अन्तर्राष्ट्रिय नियमोको नियम नही माना जा सकता, क्योकि उसकी पृष्ठभूमिमें राज्यकी तलवार नही होती । एकसत्तावादी दार्शनिक राज्योके पारस्परिक सम्बन्ध हाब्सके प्राकृतिक मनुष्योके सम्बन्धसे होता है। अर्थात् एक राज्य दूसरे राज्योके शत्रु होते हैं। भारतीय नीति-शास्त्रोके अनुसार स्वभावसे ही पड़ोसी राष्ट्रके साथ सङ्घर्षकी सम्भावना होती है और पडोसीके पडोसीके साथ मैत्रीकी सम्भावना होती है । अरिर्मित्रमरेर्मित्रं मित्रमित्रमतः परम् । तथारिमित्रमित्रं च विजिगीषोः पुरः स्मृतः॥ पार्ष्णिग्राहः स्मृतः पश्चादाक्रन्दस्तदनन्तरम्।आसारावनयोश्चैव विजिगीषोश्च पृष्ठतः॥ अरेश्च विजिगीषोश्च मध्यस्थो भूम्यनन्तरः । अनुग्रहे संहतयोर्निग्रहे व्यस्तयोः प्रभुः ॥ मण्डलाद्वहिरेतेषामुदासीनो वलाधिकः। अनुग्रहे संहतानां व्यस्तानां च वधे प्रभुः॥ ( अग्निपुरा० २४० । १—५ ) शत्रु, मित्र, शत्रु का मित्र, मित्रका मित्र और शत्रुके मित्रका मित्र—ये पाँच विजिगीषुके आगे तथा पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, पाष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार—ये चार विजिगीषुके पीछे रहते हैं । अरि तथा विजिगीषुमें यदि संधि हो जाय तो उन दोनोंपर निग्रह-अनुग्रह करनेकी क्षमता रखनेवाला तथा परस्पर समझौता न होनेपर दोनोंको दण्ड देनेकी क्षमता रखनेवाला 'मध्यम' होता है । इन सबमे उदासीन और इनके मण्डलमे बाहर सबके मिलनेपर अनुग्रह
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