भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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८४ मार्क्सवाद और रामराज्य स्वतन्त्रता ठीक है। यदि मद्यपायी अपने अनुभवसे मद्यपानको हानिकारक समझेगा तो उसे छोड़ देगा। राज्यके प्रतिबन्धसे भी मद्यपान छूट सकता है, परन्तु इसमे चारित्रिक सङ्घटन नही आता। जो निर्णय अपने अनुभवसे होता है, वही दृढ होता है ! राज्य-प्रतिबन्धसे छिपकर भी मनुष्य मद्य पीता रह सकता है। शिक्षा-प्रोत्साहन, चित्रप्रदर्शन आदि परोक्ष रीतियोद्वारा बुरे कामोके रोकनेका प्रयत्न अनुचित नही।' इसी तरह द्यूत खेलनेको भी वह प्रतिबन्धद्वारा रोकना ठीक नही समझता था। ये सब काम बुरे हैं सही, परन्तु आत्मसंघर्षसे ही उनका छूटना चरित्रबलका वर्धक होता है। वह सामाजिक परम्परागत रीति-रिवाजोके बन्धनको भी प्रगतिका बाधक समझता था। सामाजिक नियन्त्रणसे व्यक्तित्त्वका विकास नहीं हो पाता। मिल आविष्कार एवं नवमार्गदर्शक शक्तिको महत्त्वपूर्ण मानता था। उसके मतानुसार 'जनसाधारणकी मनोवृत्ति सामान्यताकी दर्शिका होती है।' परंतु वह इस मनोवृत्तिका विरोधी था। वह तो 'अपूर्व नवीन बुद्धिवालोको प्रोत्साहनसे नवीन विचारधाराकी सम्भावना होती है' ऐसा मानता था। वह अधिक कवियोका होना समाजकी उन्नतिका लक्षण मानता था। 'इससे रुचियोंकी विभिन्नता विदित होती है और यह स्वतन्त्र वातावरणमे ही सम्भव है। यदि एक कक्षाके विद्यार्थियोके प्रश्नोत्तरमे विभिन्नता होती है तो वह कक्षाकी प्रगति समझता था। जो जिसे हितकर प्रतीत हो उसे वैसा करनेकी छूट होनी चाहिये। एक ढंगसे जीवन-निर्वाहार्थ किसीको बाध्य करना उचित नही, इसीलिये शिक्षाके राज्यनियन्त्रित होनेका भी वह विरोधी था। हाँ, नागरिकोको अपने बच्चोको स्कूल भेजनेके लिये बाध्य करना राज्यका कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त शिक्षापर राज्यका हस्तक्षेप न होना चाहिये। शिक्षा प्राप्त करनेकी स्वतन्त्रता नागरिकोको ही होनी चाहिये। विद्यालयमे बालक कैसी शिक्षा प्राप्त करे, यह नागरिकोकी रुचिपर ही छोड़ना चाहिये।' उसके मतानुसार 'व्यक्तिवादियोकी भाँति ही व्यक्तिगत लाभके लिये भी मनुष्य भलीभाँति अपना कार्य सचालन करता है। उसमे राज्यके हस्तक्षेप हितकर न होगे। सरकारी कर्मचारियोद्वारा होनेवाले कार्योंमे उनकी उतनी तत्परता नहीं होती जितनी किसीको व्यक्तिगत कार्योंमे तत्परता होती है। जब व्यक्ति कोई काम स्वयं करता है तो उसकी ज्ञानवृद्धि होती है। इसीलिये मनुष्यको स्वय ही अधिकाधिक कार्य करना चाहिये। हाँ, समाचार-पत्रोद्वारा अतीत कार्योंके अनुभवोंकी सूचना सरकारको देते रहना चाहिये। उससे लोग स्वयं सबक सीखेगे। चेतावनीद्वारा भी राज्य परोक्षरूपसे मार्गदर्शक हो सकता है। सरकारी कार्योकी व्यापकतासे नागरिक सदा ही राज्यकी ओर निहारते रहते हैं। इससे आलस्य, प्रमाद एवं प्रगतिका