भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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अवरोध होता है । इससे व्यक्तित्वके विकासमे बाधा पडती है और नौकरशाही बढती है । इससे कोई कार्य भलीभाँति सम्पादित नहीं होता । राज्य हस्तक्षेप एक आवश्यक विचाररूपमे ही स्वतन्त्रताके लिये मानना चाहिये । नागरिक जीवनमें राज्यका न्यूनतम हस्तक्षेप ही व्यक्तिगत स्वतन्त्रताके लिये अपेक्षित है ।' समालोचक कहते हैं कि मिल 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' के दफ्तरमें नौकर और राजनीतिक पत्रोंका लेखक था । १८५८ मे उसने कम्पनीके शासनके पक्षमें एक प्रार्थनापत्र लिखा था, जिसमें कम्पनीके शासनको न्यायसंगत कहा था और १८५९में उसकी 'स्वतन्त्रता' पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसमें उसने व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका पूर्ण समर्थन किया था । इस तरह उसके कार्य और विचार बेमेल थे । यह भी कहा जाता है कि १८३२ के पूर्व मध्यमवर्गके लोगोने सामन्तोंकी सत्ताका विरोध किया था । १९ वीं शतीमें सामन्तोंका ह्रास हुआ, परन्तु बुद्धिजीवी वर्गकी एक बढ़ती हुई जनशक्तिका विरोध इस आधारपर सम्भव नहीं था । पूँजीपतियो एव मध्यमवर्गीय उपयोगितामे जनताकी उपयोगिता भिन्न थी । अतः जनमतसे भयभीत बुद्धिजीवीके लिये अपेक्षित था कि वह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता- के नामपर जनमतके हस्तक्षेपसे बचे । उसी कार्यकी सिद्धि 'स्वतन्त्रता' पुस्तकद्वारा मिलने की । अब तो पूँजीपति एवं सर्वहारा श्रमिकोके बीच पडा मध्यम वर्ग शोचनीय दशामे है । न वह पूँजीपति ही है न तो सर्वहारा ही ! वह स्वयं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहता है । किसीका भी एकाधिकार नहीं चाहता । 'स्वतन्त्रता' पुस्तकमे इसी आवश्यकताकी पूर्ति की गयी है । समालोचकोंका यह भी कहना है कि 'मिलका धार्मिक जीवन ही परम्पराओंके विरुद्ध था । इसीलिये उसने व्यक्तिगत स्वतन्त्रताको दार्शनिक रूप दिया । हम पहले कह चुके हैं कि 'सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् ।' (मनु० । १६०)—पराधीनता ही दुःख और स्वाधीनता ही सुख है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता अवश्य ही आदरकी वस्तु है, परंतु यदि मद्यपान, द्यूत आदिकी स्वतन्त्रता व्यक्तियोको होनी चाहिये, तब तो आत्महत्याकी भी स्वतन्त्रता होनी चाहिये ! इसी तरह यदि कोई स्वेच्छानुसार शराब, द्यूतसे परहेज न करे, माँ, बहन, बेटीसे भी शादी कर ले या मनमानी प्रेमसम्बन्ध करे तब तो मनुष्यता-पशुतामें कोई अन्तर ही नहीं रह जाता । आहार, निद्रा, भय, मैथुन मनुष्य एवं पशुका समान ही होता है । धर्म ही मनुष्यकी विशेषता है । धर्मविहीन स्वतन्त्रता स्वेच्छाचारिता या उच्छृङ्खलताके ही रूपमें परिणत हो जाती है । सर्वोपाधिविनिर्मुक्त ब्रह्मात्मभाव प्राप्त होनेसे पहले प्राणीको अवश्य ही धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक विभिन्न नियन्त्रणोंके परतन्त्र रहना पडता है । वास्तविक पूर्ण स्वतन्त्रताके लिये प्राणीको पर्याप्त स्वतन्त्रताका बलिदान करना पड़ता है । अपौरुषेय वेद एव तदनुसारी शास्त्रोंके अनुसार विनिविहित