मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्त्य राजनीति ८३
भाषणकी स्वतन्त्रताद्वारा किसीको भी अपनी विचारधाराका प्रचार करने देना चाहिये । ईसा एव सुकरातकी विचारधाराएँ प्रचलित विचारधाराओसे विपरीत थीं । सत्ताधारियोने उनके दमनका भरसक प्रयत्न किया । दोनोको प्राणदण्ड दिया गया । परंतु संसारको मानना पडा कि वे सनकी नहीं किंतु महापुरुष थे ।' इसीलिये मिलका कहना था कि 'आज हम जिन्हे सनकी कहते हैं, उनके अनोखे विचारोकी उपेक्षा करते हैं, वे ही भविष्यमे विशिष्ट बुद्धिवाले सिद्ध हो सकते हैं ।' डॉक्टर जानसनका कहना था कि 'दमनसे सच्चाई छिप नहीं सकती, सत्यकी दृढताके लिये दमन एक कठोर कसौटी है ।' परंतु मिल इस दमनको प्रगतिमें बाधक कहता था । मार्टिन लूथर (१४८३-१५४६) के पूर्व धर्मसुधार आन्दोलन बीस बार आरम्भ हुआ, परतु वह दमनद्वारा रोका गया । यदि ऐसा न होता तो सम्भव है कि यूरोपमे १६ वीं शतीसे पूर्व ही धर्मसुधार आरम्भ हुआ होता । लूथरके धर्मसुधार (१६ वीं शती) के फलस्वरूप कई महत्त्वपूर्ण विचारधाराओका बीजारोपण हुआ । यदि उसको पूर्व दमनसे रोका न गया होता तो उससे और अधिक प्रगति हुई होती । अवश्य सत्य अमर है । उसका दमनसे अन्त नही होता, परंतु दमनसे प्रचारमे विलम्ब किया ही जा सकता है । यह विलम्ब समाजके लिये हानिकारक होता है । अतः विचार एवं भाषणकी पूर्ण स्वाधीनता होनी चाहिये । मिलके अनुसार 'सत्यके कई पहलू होते है । वे एक दूसरेके बाधक नहीं किंतु परस्पर सहायक होते हैं । अतः एक पक्षके अनुयायीका दूसरोको सत्यविरोधी समझना ज्ञानवृद्धिमें बाधक है । सत्य किसी एक पक्षकी बपौती नही है । अन्य विचारधाराओमें भी सत्य हो सकता है । अतः विचार-प्रचारकी स्वाधीनता आवश्यक है । ऐसे वातावरणमे निश्चित सत्यका बोध सम्भव होता है । तर्कद्वारा सघर्षसे सत्य बलिष्ठ एव विजयी होता है । इससे अन्धविश्वासकी जड़ नही जमती ।' इस तरह मिलने विचारो, तर्कोंकी पूर्णस्वतन्त्रताके पक्षमे मत प्रकट किया था । ब्राउनके मतानुसार मिलने जीवशास्त्रके—जो योग्य है 'जीवित रहेगा' इस नियमको विचारोकी दुनियामें लागू किया; क्योकि मिलका कहना था कि 'जो विचार तर्क, सघर्षमे बलिष्ठ होता है, वही विचार सत्य सिद्ध होता है ।-अतः राज्यको भाषण, लेख, विचार, तर्ककी पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिये ।' मिलके मतानुसार 'समाजपर असर डालनेवाले चोरी-कलह आदि कार्योंपर तो राज्यको हस्तक्षेप करना चाहिये; परतु व्यक्तिगत कार्योंमे राज्यको हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये । जैसे कोई अपने घरमे रहकर चाहे रातभर पढे, चाहे मद्यपान करे उसे स्वतन्त्रता होनी चाहिये । परतु जोरसे गायन करनेसे दूसरोंके आराममे बाधा पड़ सकती है, अतः समाजके प्रतिकूल व्यक्तिगत कार्यपर प्रतिबन्ध ठीक है । परतु जिसका बुरा असर समाजपर नही पड़ता, ऐसे व्यक्तिगत कार्यक्रम