मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ मार्क्सवाद और रामराज्य आज भी नैतिकताके नामपर कितने ही सज्जन सत्य बोलकर अपनेको संकटमे डालते हैं । एक देशभक्त सारा जीवन दुःखमय बिताता है । अतः यदि व्यवस्थापक उपयोगिताके आधारपर ही नियम बनायेगा तो वह अवश्य त्रुटिपूर्ण होगा । भारतीय वेदान्तके अनुसार पूर्ण स्वतन्त्रतापूर्ण सुख और आत्मा एक ही वस्तु है; परंतु बेन्थमका तो भौतिक सुख ही ध्येय है । बेन्थमके 'अधिक लोगोंके अधिकतम सुख' के सम्बन्धमें भी समालोचकोंने कहा है कि 'यह अव्यावहारिक है।' उदाहरणार्थ एक 'अ' नियमसे १२ मनुष्योंको दस मात्रा प्रतिमनुष्यके परिमाणसे सुख मिलनेकी सम्भावना है । पूर्ण सुख १२० मात्राका होगा । 'ब' नियमसे २० मनुष्योंको पाँच मात्रासे प्रतिमनुष्य सुख मिलनेकी आशा है । पूर्ण सुख १०० मात्राका होगा । ऐसी परिस्थितिमे व्यवस्थापक क्या करेगा ? 'अ' नियम अधिकतम सुख १२० मात्रासे सम्भव होगा । परंतु मनुष्योंकी संख्या कम (१२) होगी । 'ब' नियमद्वारा अधिकतम मनुष्योंको (२० को) सुख मिलता है, परंतु सुखकी मात्रा अल्प (५ मात्रा) होगी । अब यहाँ अधिकतम लोगोंके सुखकी दृष्टिसे 'ब' नियम बनाना चाहिये, परंतु अधिकतम सुखकी दृष्टिसे 'अ' नियम आवश्यक जान पडता है । ऐसी स्थितिमे न्यायपूर्ण नियम सम्भव नहीं कहा जाता । बेन्थमका उपयोगितावाद उस समयके पूँजीपतियोंके लिये उपयोगी था । पूँजीपति निजी सुख और लाभके हेतु मानवताको भूल जाता है। वह अपने अधिकतम सुखको ही अधिकतम मनुष्योंका सुख समझता है । एक मानवतावादी तो यही चाहेगा कि 'अधिकतम लोगोंको सम्भव हो तो अधिकतम सुख हो नहीं तो जितना भी सुख हो उतना अधिकतम लोगोंको सुख मिलना चाहिये ।' यह नहीं कि अल्प-से-अल्प लोगोंको अधिकाधिक सुख मिले । वैयक्तिक स्वतन्त्रता स्टुअर्टकी पुस्तक 'स्वतन्त्रता' (लिबर्टी, १८५९) व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका सर्वोत्कृष्ट समर्थन करनेवाली है । व्यक्तिकी स्वतन्त्रता एवं व्यक्तित्वके लिये 'मिल' ने व्यक्तिवादको आवश्यक बतलाया । उसका कहना था कि 'मानव- प्रगतिके लिये विचार एवं भाषणकी स्वतन्त्रता अत्यावश्यक है।' कहते हैं, वह सनकी लोगोंकी भी स्वतन्त्रताका समर्थक था । उसका कहना था कि 'इनमेंसे न जाने किसके विचारसे किसी नयी विचारधाराका जन्म हो जाय ।' अतः प्रगतिके लिये प्रत्येक व्यक्तिको विचार एवं भाषणका स्वातन्त्र्य प्राप्त होना चाहिये । मिलके विचारसे स्वतन्त्रता बिना प्रगतिमें बाधा पड़ती है। उसका कहना था कि 'जो विचारधारा एक समयमे प्रचलित है, वही सत्य है, ऐसा नहीं कहा जा सकता । उसके विपरीत किसी व्यक्तिकी विचारधाराका दमन नहीं करना चाहिये । हो सकता है कि वही विचारधारा सत्य हो । अतः विचार एव