मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाश्चात्त्य राजनीति ८१ होती है। वे सब अपने उपकारक हैं।' अतः उनमें प्रेम होता है। परन्तु यहाँ आत्मा शब्दका अर्थ देहादि संघातमात्र नहीं, किंतु देहादिभिन्न विशुद्ध आत्मा है। जो 'स्व' शब्दसे केवल देहादि संघात ही समझते हैं, उनके मतानुसार देहादि संघात- को भोजन, पान, वस्त्र, भूषण, वाहन, सम्पत्ति आदि मिलना ही स्वार्थ या आत्मार्थ है, परन्तु जो देहादि संघातसे भिन्न निर्विकार प्रत्यक्चैतन्याभिन्न आत्माको समझते हैं, उनका स्वार्थ या आत्मार्थ बहुत ऊँचा होता है। वहाँ तो परोपकार, धर्म, तपस्या, उपासना, तत्त्वसाक्षात्कार तथा सकलानर्थनिवृत्तिमय परमानन्दावाप्ति ही स्वार्थ या आत्मार्थ होता है, 'स्व' एवं समाज व्यष्टि एवं समष्टिका भेद समाप्त हो जाता है। इस दृष्टिसे उच्च कोटिकी उपयोगिता एवं स्वार्थमें परार्थ अन्तर्भूत हो जाता है। भले ही राजकीय नियम स्वल्प-से-स्वल्प हो, क्योंकि यह तो भारतीय शास्त्रोको भी सम्मत है। परंतु सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, विविध नियन्त्रण तो तबतक परम अपेक्षित होते हैं, जबतक प्राणी प्रत्यक्चेतन्याभिन्न परम तत्त्वका साक्षात्कार करके पूर्ण कृतार्थ नहीं हो जाता। इतना ही क्यो, उस कालमे भी जीवन्मुक्तोंको भी लोकसंग्रहार्थ बहुत से कर्तव्य-नियम पालन करने पड़ते हैं। विदेह-मुक्तिमें ही पूर्ण स्वतन्त्रता, नियमरहितता सम्भव होती है। स्टुअर्ट मिल भी 'उपयोगितावादी' था। उसने वेन्थमके उपयोगितावादमें संशोधन किया था। वह सुखके मात्रात्मक परिमाणके साथ-साथ गुणात्मक भेद भी मानता है। पहलेका उदाहरण हे—'जितना सुख वीणावादनमें होता है, उतना संगीतमें।' परंतु दूसरेको स्टुअर्ट मिलने बताया कि 'एक असंतुष्ट विद्वान् होना संतुष्ट मूर्खसे अच्छा है। उससे उपयोगिताकी परख केवल सुखकी मात्रापर नहीं किंतु गुणके आधारपर होती है।' किंतु गुणात्मक भेदसे उपयोगिताका मानदण्ड व्यक्ति भी होता है, केवल पदार्थ ही नहीं। वेन्थमने केवल पदार्थको ही मानदण्ड माना है। इसीलिये उसके आलोचक उसे 'संतुष्ट मूर्खका दर्शन' मानते हैं। इस तरह जब व्यक्तिगत दृष्टिकोणसे एक वस्तुकी उपयोगिता निर्धारित होती है, तब व्यक्तिकी रुचिका भी ध्यान रखना आवश्यक है। एवं शंकराचार्य-जैसे निःस्पृह त्यागी विद्वान्के हर्ष एवं सुखकी उपयोगिताका मानदण्ड एवं भौतिकवादी दार्शनिक हाब्स जैसे राजनीतिज्ञकी उपयोगिताका मानदण्ड भिन्न ही होता है। मनुष्य केवल सुख और स्वार्थका ही कठपुतला नहीं—मनुष्य केवल सुख-दुःखसे ही नहीं संचालित होता है। अन्य भावनाओंका भी जीवनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। देशभक्ति, नैतिक, आध्यात्मिक, संतुष्टि आदिकी भावनाओंसे ही मनुष्यके कार्य निर्धारित होते हैं। यदि मनुष्य-जाति उपयोगितावादके अनुसार ही चलती तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, शङ्कर, रामानुज, ईसा आदि-जैसे लोगोंका सम्भव ही न होता। उपयोगिता- वादके अनुसार वेन्थमको ही एक धनी वकील होना था, गरीब दार्शनिक नहीं। पा० रा० ६—