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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

मार्क्स-दर्शन ५५१ बन्धनोंको भी अनावश्यक समझा। फलतः इनके बहुत अनुयायी आचारहीन भी हो गये। जिनका समाजपर बुरा असर पड़ा। मार्क्सकी मुख्य विशेषता यह बतायी जा सकती है कि 'उसने मनुष्य समाजके इतिहासकी घटनाओंको कार्य- कारणकी शृङ्खलामें जोड़ दिया। प्रकृतिके समान ही मनुष्य-समाजके विकास एवं परिवर्तनके नियम हैं। समाजका रूप और संघटन किसी बाह्यशक्तिमे नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य समाजके विचारों, निश्चयों और कार्योंसे होता है। आगे भी समाजका रूप आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है। पूँजीवादी प्रणाली अपने विकाससे समाजमें इस प्रकारकी स्थिति उत्पन्न कर देती है कि उसका आगे बढ़ना असम्भव हो जाता है और पूँजीवादी समाजको विनाशकी ओर बढ़ाना है, अतः श्रेणी-संघर्षके द्वारा समाजवाद विकसित होता है।' रामराज्यवादीका इसपर कहना है कि जड प्रकृतिमें समीक्ष्यकारिता नहीं बन सकती। कोई समीक्ष्यकारी व्यक्ति या समूह आक्रमणकारी या आक्रमणका सामना करनेके लिये परस्परविचारसे निश्चित कार्यक्रम बनाता है। अमुक अश्वारोही, अमुक गजारोही, अमुक रथारोही, अमुक वायुयानारोही होकर तलवार, भाला, बर्छा, बंदूक, तोप, विस्फोटक तथा अङ्गार (बम्ब) आदि लेकर आक्रमण या मुकाबला करेगा। अवसर आनेपर वह पूर्वसंकेतानुसार वैसा ही करता है। पर अचेतन प्रकृति या उसके जडकार्योंमें या घटनाओंमें समीक्ष्यकारिता सर्वथा असम्भव है। अतएव प्रकृति या प्रकृति-कार्य किसीमें भी स्वतन्त्रतारूपसे नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती। निरीश्वरवादी सांख्योंमे भी 'नद्याः कूलं पिपतिषति (नदीका किनारा गिरना चाहता है) के समान प्रकृतिके विचार या ईक्षण को गौण या औपचारिक ही माना है। नदीका किनारा जड़ है, उसमें गिरनेकी इच्छा नहीं हो सकती, किंतु आसन्न पतन अर्थात् शीघ्र गिरना देखकर इस प्रकारका वाक्य प्रयोग किया जाता है। जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथ्यादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, वैसे ही अचेतन प्रकृति या उसके कार्य जड-वर्गकी प्रवृत्ति भी चेतन नियन्त्रित ही होती है। घटनाएँ उसी अचेतनकी हलचलमात्र हैं। वे स्वयं भी जड़ हैं। उनके नियम या कार्यकारणभाव—कुछ भी स्वतन्त्र नहीं हो सकते। मीमांसकोंका अचेतन कर्म भी ईश्वराधिष्ठित होकर ही फल देता है, उनके कार्यकारणभाव भी ईश्वरनियन्त्रित ही हैं—'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्रह्मसूत्र १।१।५) शाङ्करभाष्य आदिमें यह विषय विस्तारसे वर्णित है। अचेतन यन्त्रोंकी नियमित प्रवृत्तिके मूलमें भी किसी चेतन को ही अनिवार्यरूप- से सबका नियामक मानना पड़ता है। किसी-किसी घटनाका परस्पर कार्य-कारणभाव होता है, यह कोई मार्क्सकी नयी बात नहीं है। दण्ड, चक्र, चीवर, कुलालादिके व्यापार- की घटना घटनिर्माण (घटना) का कारण है। तन्तु, तूरी, वेमा, तन्तुवायादिकी हलचलें पटनिर्माणका कारण हैं। संग्रामसे धन, जन, शक्तिका अपक्षय होता है। उससे किसीकी