भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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९९०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आषोडशा तु प्रासादे कर्तव्या नाधिका ततः।<br>मध्योत्तमकनिष्ठा तु कार्या वित्तानुसारतः॥ २३<br>द्वारोच्छ्रायस्य यन्मानमष्टधा तत् तु कारयेत्।<br>भागमेकं ततस्त्यक्त्वा परिशिष्टं तु यद् भवेत्॥ २४<br>भागद्वयेन प्रतिमा त्रिभागीकृत्य तत्पुनः।<br>पीठिका भागतः कार्या नातिनीचा न चोच्छ्रिता॥ २५<br>प्रतिमामुखमानेन नव भागान् प्रकल्पयेत्।<br>चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा भागेन हृदयं पुनः॥ २६<br>नाभिस्तस्मादधः कार्या भागेनैकेन शोभना।<br>निम्नत्वे विस्तरत्वे च अङ्गुलं परिकीर्तितम्॥ २७<br>नाभेरधस्तथा मेढ्रं भागेनैकेन कल्पयेत्।<br>द्विभागेनायतावरू जानुनी चतुरङ्गुले॥ २८<br>जङ्घे द्विभागे विख्याते पादौ च चतुरङ्गुलौ।<br>चतुर्दशाङ्गुलस्तद्वन्मौलिरस्य प्रकीर्त्तितः॥ २९<br>ऊर्ध्वमानमिदं प्रोक्तं पृथुत्वं च निबोधत।<br>सर्वावयवमानेषु विस्तारं शृणुत द्विजाः॥ ३०किंतु देवमन्दिरोंमें सोलह बीतातककी प्रतिमा प्रतिष्ठित की जा सकती है, पर उससे बड़ी वहाँ भी नहीं। इन प्रतिमाओंको अपनी आर्थिक स्थितिके अनुसार उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ कोटिकी बनानी चाहिये। मन्दिरके प्रवेशद्वारकी जो ऊँचाई हो उसे आठ भागोंमें विभक्त कर दे। उसमें एक भाग छोड़कर शेष दो भागोंसे प्रतिमा बनवाये। फिर उन दो भागोंकी संख्याको तीन भागोंमें विभक्त कर दे। उसके एक भागके बराबर पीठिका बनाये। वह न बहुत ऊँची हो, न बहुत नीची। फिर प्रतिमाके मुखमानको नौ भागोंमें विभक्त करे। उसमें चार अङ्गुलमें ग्रीवा तथा एक भागके द्वारा हृदय होना चाहिये। उसके नीचेके एक भागमें सुन्दर नाभि बनानी चाहिये। वह गहराई और विस्तारमें एक अंगुलकी कही गयी है। नाभिके नीचे एक भागमें लिंग, दो भागोंमें विस्तृत ऊरु, चार अंगुलमें घुटने, दो भागसे जंघे और चार अंगुलके पैर हों। उसी प्रकार मूर्तिका सिर चौदह अंगुलका बनाना चाहिये। यह तो मूर्तिकी ऊँचाई बतायी गयी, अब उसकी मोटाई सुनिये। ब्राह्मणगण! अब क्रमशः सभी अवयवोंका विस्तार सुनिये॥ २०—३०॥
चतुरङ्गुलं ललाटं स्यादूर्ध्वं नासा तथैव च।<br>द्व्यङ्गुलस्तु हनुर्ज्ञेय ओष्ठौ द्व्यङ्गुलसम्मितौ॥ ३१<br>अष्टाङ्गुलं ललाटं च तावन्मात्रे भ्रुवौ मते।<br>अर्धाङ्गुला भ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवानता॥ ३२<br>उन्नताग्रा भवेत् पार्श्वे श्लक्ष्णतीक्ष्णा प्रशस्यते।<br>अक्षिणी द्व्यङ्गुलायामे तदर्धं चैव विस्तरे॥ ३३<br>उन्नतोदरमध्ये तु रक्तान्ते शुभलक्षणे।<br>तारकार्धविभागेन दृष्टिः स्यात् पञ्चभागिकी॥ ३४<br>द्व्यङ्गुलं तु भ्रुवोर्मध्ये नासामूलमथाङ्गुलम्।<br>नानाग्रविस्तरं तद्वत् पुटद्वयमथानतम्॥ ३५<br>नासापुटविलं तद्वदर्धाङ्गुलमुदाहृतम्।<br>कपोले द्व्यङ्गुले तद्वत् कर्णमूलाद् विनिर्गते॥ ३६प्रतिमाके ललाटकी मोटाई चार अंगुल, नासिकाकी चार अंगुल, दाढ़ीकी दो अंगुल और ओठकी भी दो अंगुल जाननी चाहिये। यदि ललाटका विस्तार आठ अंगुल हो तो उतनेमें ही दोनों भौंहोंको भी बनानी चाहिये। भौंहोंकी रेखा आधे अंगुलकी हो। वह बीचमें धनुषाकार हो। दोनों छोरोंपर उसके अग्रभाग उठे हुए हों, बनावट चिकनी तथा सुन्दर होनी चाहिये। आँखोंकी लम्बाई दो अंगुल, चौड़ाई एक अंगुल, उनके मध्य भागमें ऊँची रक्ताभ एवं शुभ लक्षणोंसे युक्त पुतलियाँ होनी चाहिये। तारकाके आधे भागसे पाँचगुनी दृष्टि बनानी चाहिये। दोनों भौंहोंके मध्यमें दो अंगुलका अन्तर रखना चाहिये, नासिकाका मूलभाग एक अंगुलमें रहे। इसी प्रकार नीचेकी ओर झुकी हुई नासिकाके अग्रभाग एवं दोनों पुटोंको बनाना चाहिये। नासिकाके पुटोंके छिद्र आधे अंगुलके बताये गये हैं। कपोल दो अंगुलके हों जो कानोंके मूल भागतक विस्तृत हों।