भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २५८ *१८९

| अधस्तात् पृथिवी तस्य कर्तव्या पादमध्यतः।<br>दक्षिणे प्रणतं तद्वद् गरुत्मन्तं निवेशयेत्॥ ११<br><br>वामतस्तु भवेल्लक्ष्मीः पद्महस्ता शुभानना।<br>गरुत्मानग्रतो वापि संस्थाप्यो भूतिमिच्छता॥ १२<br><br>श्रीश्च पुष्टिश्च कर्तव्ये पार्श्वयोः पद्मसंयुते।<br>तोरणं चोपरिष्टात् तु विद्याधरसमन्वितम्॥ १३<br><br>देवदुन्दुभिसंयुक्तं गन्धर्वमिथुनान्वितम्।<br>पत्रवल्लीसमोपेतं सिंहव्याघ्रसमन्वितम्॥ १४<br><br>तथा कल्पलतोपेतं स्तुवद्भिरमरेश्वरैः।<br>एवंविधो भवेद्विष्णोस्त्रिभागेनास्य पीठिका॥ १५<br><br>नवतालप्रमाणास्तु देवदानवकिंनराः।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि मानोन्मानं विशेषतः॥ १६<br><br>जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजः स्फुटम्।<br>त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥ १७<br><br>तदष्टकेन लिक्ष्या तु यूका लिक्ष्याष्टकैर्मता।<br>यवो यूकाष्टकं तद्वदष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥ १८<br><br>स्वकीयाङ्गुलिमानेन मुखं स्याद् द्वादशाङ्गुलम्।<br>मुखमानेन कर्तव्या सर्वावयवकल्पना॥ १९ | विष्णुभगवान्‌के दोनों चरणोंके मध्यमें नीचेकी ओर पृथ्‍वीकी मूर्ति और दाहिनी ओर प्रणाम करते हुए गरुड़की मूर्ति रखनी चाहिये। बायीं ओर हाथमें कमल लिये हुए सुन्दर मुखवाली लक्ष्मीकी स्थापना करनी चाहिये। कल्याणकामी पुरुष गरुड़को आगे भी स्थापित कर सकता है। प्रतिमाके दोनों ओर हाथमें कमल लिये श्री और पुष्टिकी मूर्ति भी बनानी चाहिये। प्रतिमाके ऊपर विद्याधरोंसे चित्रित गोलाकार तोरणका निर्माण करना चाहिये। देवताओंके नगाड़े बजाते हुए गन्धर्व-दम्पत्तिको भी वहाँ चित्रित करना चाहिये। साथमें वहीं यह लता और पत्तोंसे युक्त कल्पलतासे समन्वित हो और व्याघ्र-सिंहोंकी भी प्रतिमासे सम्पन्न। स्तुति करते हुए बड़े-बड़े देवगण सामने खड़े हों। इस प्रकार विष्णुकी प्रतिमा हो तथा प्रतिमाकी पीठिकाका विस्तार प्रतिमामानके तृतीयांशसे निर्मित हो। देवता, दानव तथा किन्नरोंकी प्रतिमा नौ ताल¹ परिमाणकी होनी चाहिये। अब मैं कौन-सी प्रतिमा कितनी ऊँची, नीची, मोटी और लम्बी हो, यह बतलानेके लिये मापविवरण बतला रहा हूँ। जालीके भीतरसे सूर्यकी किरणोंके प्रविष्ट होनेपर जो उड़ता धूलिकण स्पष्ट दिखायी पड़ता है, उसे 'त्रसरेणु' कहते हैं। इन आठ त्रसरेणुओंके बराबर एक बालाग्र होता है। उससे आठगुने बड़े आकारके पदार्थकी लिक्ष्या और आठ लिक्ष्याकी एक यूका होती है। आठ यूकाका एक यव और आठ यवोंके मापका एक अंगुल होता है। अपनी अँगुलीके परिमाणसे बारह अंगुलका मुख होता है और मुखके परिमाणानुसार ही देवताके सभी अवयवोंकी कल्पना करनी चाहिये ॥ ११–१९॥ | | सौवर्णी राजती वापि ताम्री रत्नमयी तथा।<br>शैली दारुमयी चापि लोहसीसमयी तथा॥ २०<br><br>रीतिकाधातुयुक्ता वा ताम्रकांस्यमयी तथा।<br>शुभदारुमयी वापि देवतार्चा प्रशस्यते॥ २१<br><br>अङ्गुष्ठपर्वादारभ्य वितस्तिर्यावदेव तु।<br>गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधैः॥ २२ | देव-प्रतिमा सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, रत्न, पत्थर, देवदारु, लोहा-सीसा, पीतल, ताँबा और काँसमिश्रित अथवा शुभ काष्ठोंकी बनी हुई प्रशस्त मानी गयी है।² गृहस्थोंके घरोंमें अँगूठेके एक पर्वसे लेकर एक बीते प्रमाणमात्र ही प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये; क्योंकि विद्वानोंने इससे बड़ीको गृहस्थके लिये प्रशस्त नहीं माना है। |


१. अंगूठेसे मध्यमा अंगुलीतक फैले करतलको ताल कहते हैं।
२. भागवतीय क्रियायोगोंमें भी कहा है—
'शैली दारुमयी लौही लेप्यालेख्या च सैकती। मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता॥ (११। २७। १२)