भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९८८ * मत्स्यपुराण *


दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय

देव-प्रतिमाका प्रमाण-निरूपण

ऋषय ऊचुः<br>क्रियायोगः कथं सिध्येद् गृहस्थादिषु सर्वदा।<br>ज्ञानयोगसहस्त्राद्धि कर्मयोगो विशिष्यते॥ १ऋषियोंने पूछा—सूतजी! गृहस्थादि आश्रमोंमें सभी युगोंमें क्रियायोगकी* सिद्धि किस प्रकार सम्भव है, क्योंकि क्रिया (भक्ति)-योगको हजारों ज्ञान-योगकी अपेक्षा विशिष्ट माना गया है॥ १॥
सूत उवाच<br>क्रियायोगं प्रवक्ष्यामि देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं यस्मान्नान्यल्लोकेषु विद्यते॥ २<br>प्रतिष्ठायां सुराणां तु देवतार्चानुकीर्तनम्।<br>देवयज्ञोत्सवं चापि बन्धनाद् येन मुच्यते॥ ३<br>विष्णोस्तावत् प्रवक्ष्यामि यादग्रूपं प्रशस्यते।<br>शङ्खचक्रधरं शान्तं पद्महस्तं गदाधरम्॥ ४<br>छत्राकारं शिरस्तस्य कम्बुग्रीवं शुभेक्षणम्।<br>तुङ्गनासं शुक्तिकर्णं प्रशान्तोर्भुजक्रमम्॥ ५<br>क्वचिदष्टभुजं विद्याच्चतुर्भुजमथापरम्।<br>द्विभुजश्चापि कर्तव्यो भवनेषु पुरोधसा॥ ६<br>देवस्याष्टभुजस्यास्य यथास्थानं निबोधत।<br>खड्गो गदा शरः पद्मं देयं दक्षिणतो हरेः॥ ७<br>धनुश्च खेटकं चैव शङ्खचक्रे च वामतः।<br>चतुर्भुजस्य वक्ष्यामि यथैवायुधसंस्थितिम्॥ ८<br>दक्षिणेन गदा पद्मं वासुदेवस्य कारयेत्।<br>वामतः शङ्खचक्रे च कर्तव्ये भूतिमिच्छता॥ ९<br>कृष्णावतारे तु गदा वामहस्ते प्रशस्यते।<br>यथेच्छया शङ्खचक्रे चोपरिष्टात् प्रकल्पयेत्॥ १०सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं देवार्चनकथनस्वरूप क्रियायोगका वर्णन कर रहा हूँ। यह भोग और मोक्ष—दोनोंको देनेवाला है तथा भूलोकके अतिरिक्त इसकी अन्य लोकोंमें सत्ता नहीं है। इन देवताओंकी प्रतिमा-प्रतिष्ठाके प्रसङ्ग-क्रममें प्रतिमा-निर्माण और उनके अङ्गभूत यज्ञकी विधि भी निर्दिष्ट है, जिसके अनुष्ठानसे प्राणी बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अब भगवान् विष्णुकी जैसी प्रतिमा श्रेष्ठ मानी जाती है उसका वर्णन कर रहा हूँ। उनकी प्रतिमाका रूप शान्त हो, हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए हो, उसका सिर छत्रके समान गोल, गला शङ्खके समान, आँखें सुन्दर, नासिका कुछ ऊँची, कान सीपी-सदृश, भुजाएँ विशाल और ऊरु प्रशान्त—चढ़ाव-उतारवाले होने चाहिये। विष्णुभगवान्‌की प्रतिमा कहीं तो आठ भुजाओंवाली होती है और कहीं चार भुजाओंवाली; किंतु गृहस्थको अपने भवनमें दो भुजाओंकी (विष्णु-) प्रतिमा पुरोहितद्वारा स्थापित करानी चाहिये। अष्टभुज मूर्तिमें आयुधोंके यथास्थान क्रमको सुनिये—भगवान् श्रीहरिके दाहिनी ओरके चार हाथोंमें क्रमशः (नीचेसे ऊपरकी ओर) खड्ग, गदा, बाण और कमल तथा बायें हाथमें क्रमशः (नीचेसे ऊपर) धनुष, ढाल, शङ्ख और चक्र स्थापित करना चाहिये। अब चतुर्भुजमूर्तिके हाथोंमें आयुधकी स्थिति बतला रहा हूँ। समृद्धिकी इच्छा रखनेवालेको भगवान् वासुदेवकी प्रतिमामें दाहिनी ओरके दोनों हाथोंमें क्रमशः नीचेसे ऊपर गदा और पद्म तथा बायीं ओर क्रमशः नीचेसे ऊपर शङ्ख और चक्र रखना चाहिये। कृष्णावतारकी प्रतिमामें बायें हाथमें गदा ठीक मानी गयी है। दाहिने हाथमें स्वेच्छानुसार शङ्ख और चक्रको ऊपर-नीचे रखना चाहिये॥ २—१०॥

* यह पाद्मीय क्रियायोग-खण्डका सारांश तथा भाग ११। २७ के क्रियायोगका कुछ विस्तृत रूप है। यहाँ क्रियायोगका तात्पर्य देवपरक भगवद्भक्ति एवं देवार्चनसे है। मन्दिर, प्रतिमा-निर्माण, प्रतिष्ठादिका यह प्रकरण भारतीय धर्म-संस्कृति एवं कला-कौशलका प्राण है। इसकी विस्तृत जानकारीके लिये 'विष्णुधर्मोत्तर' 'शिल्परत्न' 'वास्तुरजवल्लभ'—'प्रतिमा-प्रसादमण्डन' 'काश्यपशिल्प' 'अपराजित-पृच्छा' 'समराङ्गणसूत्रधार' 'प्रतिष्ठामहोदधि' आदि सहायक ग्रन्थ भी अनुसंधेय है।