भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 1010, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 1010
१०००* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मोदकं परशुं चैव वामतः परिकल्पयेत्।<br>बृहत्वात्क्षिप्तवदनं पीनस्कन्धाङ्घ्रियाणिकम्॥ ५४<br>युक्तं तु सिद्धिबुद्धिभ्यामधस्तान्मूषिकान्वितम्।<br>कात्यायन्याः प्रवक्ष्यामि रूपं दशभुजं तथा॥ ५५<br>त्रयाणामपि देवानामनुकारानुकारिणीम्।<br>जटाजूटसमायुक्तमर्धेन्दुकृतशेखरम् ॥ ५६<br>लोचनत्रयसंयुक्तां पूर्णेन्दुसदृशाननाम्।<br>अतसीपुष्पवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम्॥ ५७<br>नवयौवनसम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम्।<br>सुचारुदशनां तद्वत् पीनोन्नतपयोधराम्॥ ५८<br>त्रिभङ्गस्थानसंस्थानां महिषासुरमर्दिनीम्।<br>त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात् खड्गं चक्रं क्रमादधः॥ ५९<br>तीक्ष्णवाणं तथा शक्तिं वामतोऽपि निबोधत।<br>खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुशमेव च॥ ६०<br>घण्टां वा परशुं वापि वामतः संनिवेशयेत्।<br>अधस्तान्महिषं तद्वद्विशिरस्कं प्रदर्शयेत्॥ ६१<br>शिरश्छेदोद्भवं तद्वद् दानवं खड्गपाणिनम्।<br>हृदि शूलेन निर्भिन्नं निर्यदन्त्रविभूषितम्॥ ६२<br>रक्तरक्तीकृताङ्गं च रक्तविस्फुरितेक्षणम्।<br>वेष्टितं नागपाशेन भ्रुकुटीभीषणाननम्॥ ६३<br>सपाशवामहस्तेन धृतकेशं च दुर्गया।बायीं ओरके ऊपरके हाथमें मोदक तथा निचले हाथमें परशु हों। बृहत् होनेके कारण मुख नीचेकी ओर विस्तृत तथा स्कन्ध, पाद और हाथ मोटे होने चाहिये। वह सिद्धि-बुद्धिसे युक्त हो, उसके नीचेकी ओर मूषक बना हो। अब मैं भगवती कात्यायनीकी मूर्तिको वर्णन कर रहा हूँ। वह दस भुजाओंसे युक्त, तीनों देवताओंकी आकृतियोंका अनुकरण करनेवाली, जटा-जूटसे विभूषित, सिरपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, तीन नेत्रोंसे युक्त, पूर्णचन्द्रके समान मुखवाली, अलसी-पुष्पके समान नीलवर्णा, तेजोमय, सुन्दर नेत्रोंसे विभूषित, नवयौवनसम्पन्ना, सभी आभूषणोंसे विभूषित, अत्यन्त सुन्दर दाँतोंसे युक्त, स्थूल एवं उन्नत स्तनोंवाली, त्रिभंगी रूपसे स्थित, महिषासुरनाशिनी आदि चिह्नोंसे युक्त हो। दाहिने हाथोंमें क्रमशः ऊपरसे नीचेकी ओर त्रिशूल, खड्ग, चक्र, तीक्ष्ण बाण और शक्ति तथा बायें हाथोंमें ढाल, धनुष, पाश, अङ्कुश, घण्टा अथवा परशु धारण कराना चाहिये। प्रतिमाके नीचे सिररहित महिषासुरको प्रदर्शित करना चाहिये। वह दानव सिर कटनेपर शरीरसे निकलता हुआ दीख पड़े तथा हाथमें खड्ग, हृदय शूलसे विदीर्ण और बाहर निकलती हुई अँतड़ियोंसे विभूषित हो। वह रक्तसे लथपथ शरीरवाला, विस्फारित लाल नेत्रोंसे युक्त, नागपाशसे परिवेष्टित, टेढ़ी भृकुटीके कारण भीषण मुखाकृति और दुर्गाद्वारा पाशयुक्त बायें हाथसे पकड़ा गया केशवाला हो॥ ५२—६३ १/२॥
वमद्रुधिरवक्त्रं च देव्याः सिंहं प्रदर्शयेत्॥ ६४<br>देव्यास्तु दक्षिणं पादं समं सिंहोपरि स्थितम्।<br>किंचिदूर्ध्वं तथा वाममङ्गुष्ठं महिषोपरि॥ ६५<br>स्तूयमानं च तद्रूपममरैः संनिवेशयेत्।देवीके सिंहको मुखसे रक्त उगलते हुए प्रदर्शित करना चाहिये। देवीका दाहिना पैर सिंहके ऊपर समानरूपसे स्थित हो तथा बायाँ कुछ ऊपरकी ओर उठा हो, उसका अंगूठा महिषासुरपर लगा हुआ हो। उनकी प्रतिमाको देवगणोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए दिखाना चाहिये।
इदानीं सुरराजस्य रूपं वक्ष्ये विशेषतः॥ ६६<br>सहस्रनयनं देवं मत्तवारणसंस्थितम्।<br>पृथूरुवक्षोवदनं सिंहस्कन्धं महाभुजम्॥ ६७(यहाँसे अष्टदिक्पाल या लोकपालोंकी प्रतिमाका वर्णन है) अब मैं देवराज इन्द्रके रूपको विशेष रूपसे कह रहा हूँ। हजार नेत्रोंवाले देवेन्द्रको मत्त गयन्दपर विराजमान बनाना चाहिये। उनके ऊरु, वक्षःस्थल और मुख विशाल हों,
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