मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २६१ * । १००१
| किरीटकुण्डलधरं पीवरोरुभुजेक्षणम्।<br>वज्रोत्पलधरं तद्वन्नानाभरणभूषितम्॥ ६८<br>पूजितं देवगन्धर्वैरप्सरोगणसेवितम्।<br>छत्रचामरधारिण्यः स्त्रियः पार्श्वे प्रदर्शयेत्॥ ६९<br>सिंहासनगतं चापि गन्धर्वगणसंयुतम्।<br>इन्द्राणीं वामतश्चास्य कुर्यादुत्पलधारिणीम्॥ ७० | कंधे सिंहके समान हों, उनकी भुजाएँ विशाल हों, वे किरीट और कुण्डल धारण किये हों, उनके जघनस्थल, भुजाएँ तथा आँखें स्थूल हों, वे वज्र और कमल धारण किये हों तथा विविध आभूषणोंसे विभूषित हों, देवता और गन्धर्वोंद्वारा पूजित और अप्सराओंद्वारा सेवित हों। उनके पार्श्वमें छत्र और चामर धारण करनेवाली स्त्रियोंको प्रदर्शित करना चाहिये। वे सिंहासनपर विराजमान हों, उनकी बायीं ओर कमल धारण किये हुए इन्द्राणी स्थित हों, वे गन्धर्वोंसे घिरे हों॥ ६४-७०॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रतिमालक्षणे षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रतिमा-लक्षण नामक दो सौ साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६०॥
दो सौ एकसठवाँ अध्याय
सूर्यादि विभिन्न देवताओंकी प्रतिमाके स्वरूप, प्रतिष्ठा और पूजा आदिकी विधि
| सूत उवाच<br>प्रभाकरस्य प्रतिमामिदानीं शृणुत द्विजाः।<br>रथस्थं कारयेद् देवं पद्महस्तं सुलोचनम्॥ १<br>सप्ताश्वं चैकचक्रं च रथं तस्य प्रकल्पयेत्।<br>मुकुटेन विचित्रेण पद्मगर्भसमप्रभम्॥ २<br>नानाभरणभूषाभ्यां भुजाभ्यां धृतपुष्करम्।<br>स्कन्धस्थे पुष्करे ते तु लीलयैव धृते सदा॥ ३<br>चोलकच्छन्नवपुषं क्वचिच्चित्रेषु दर्शयेत्।<br>वस्त्रयुग्मसमोपेतं चरणौ तेजसावृतौ॥ ४<br>प्रतीहारौ च कर्तव्यौ पार्श्वयोर्दण्डिपिङ्गलौ।<br>कर्तव्यौ खड्गहस्तौ तौ पार्श्वयोः पुरुषावुभौ॥ ५<br>लेखनीकृतहस्तं च पार्श्वे धातारमव्ययम्।<br>नानादेवगणैर्युक्तमेवं कुर्याद् दिवाकरम्॥ ६ | सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणगण! अब आपलोग भगवान् सूर्यकी* प्रतिमाके निर्माणकी विधि सुनिये। भगवान् सूर्यदेवको रथपर स्थित, सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित और दोनों हाथोंमें कमल धारण किये हुए बनाना चाहिये। उनके रथमें सात घोड़े और एक पहिया होनी चाहिये। उन्हें विचित्र मुकुटसे युक्त तथा कमलके मध्यवर्ती भागके समान लालवर्णका बनाना चाहिये। वे विविध आभूषणोंसे विभूषित दोनों भुजाओंमें कमल धारण किये हों, वे कमल सदा लीलापूर्वक ऊपर कंधोंतक उठे हुए हों। उनका स्वरूप विशेषकर पैर दो वस्त्रोंसे आवृत हो। प्रायः चित्रोंमें भी उनकी प्रतिमा दो वस्त्रोंसे ढकी हुई प्रदर्शित की जानी चाहिये। उनके दोनों चरण तेजसे आवृत हों। मूर्तिके दोनों ओर दण्डी और पिङ्गल नामक दो प्रतीहारोंको रखना चाहिये। उन दोनों पार्श्ववर्ती पुरुषोंके हाथोंमें तलवार बनायी जानी चाहिये। उनके पार्श्वमें एक हाथमें लेखनी लिये हुए अविनाशी धाताकी मूर्ति हो। भगवान् भास्कर अनेकों देवगणोंसे युक्त हों। इस प्रकार भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका निर्माण करना चाहिये। |
* सूर्यप्रतिमाकी विधि अग्निपुराण, अध्याय ५१, भविष्य, नारद, साम्बादिपुराणों, सुप्रभेदागम, शिल्परत्न, शारदा, विष्णुधर्म तथा टी० गोपीनाथ राव, स्टीलाकमरिश, बनर्जी आदिके ग्रंथोंमें सानुसंधान विस्तारपूर्वक निर्दिष्ट है। तुलनात्मक अध्ययन तथा जिज्ञासाशान्त्यर्थ ये सभी तथा पुराणागमोंके ध्यान-प्रकरण भी द्रष्टव्य हैं। मतान्तरसे सूर्य भी पूर्व दिशाके स्वामी हैं।