मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अरुणः सारथिश्चास्य पद्मिनीपत्रसंनिभः।<br>अश्वौ सुवलयग्रीवावन्तस्थौ तस्य पार्श्वयोः॥ ७<br>भुजङ्गरज्जुभिर्बद्धाः सप्ताश्वा रश्मिसंयुताः।<br>पद्मस्थं वाहनस्थं वा पद्महस्तं प्रकल्पयेत्॥ ८<br><br>वह्नेस्तु लक्षणं वक्ष्ये सर्वकामफलप्रदम्।<br>दीप्तं सुवर्णवपुषमर्धचन्द्रासने स्थितम्॥ ९<br>बालार्कसदृशं तस्य वदनं चापि दर्शयेत्।<br>यज्ञोपवीतिनं देवं लम्बकूर्चधरं तथा॥ १०<br>कमण्डलुं वामकरे दक्षिणे त्वक्षसूत्रकम्।<br>ज्वालावितानसंयुक्तमजवाहनमुज्ज्वलम् ॥ ११<br>कुण्डस्थं वापि कुर्वीत मूर्ध्नि सप्तशिखान्वितम्।<br>तथा यमं प्रवक्ष्यामि दण्डपाशधरं विभुम्॥ १२<br>महामहिषमारूढं कृष्णाञ्जनचयोपमम्।<br>सिंहासनगतं चापि दीप्ताग्निसमलोचनम्॥ १३<br>महिषश्चित्रगुप्तश्च करालाः किंकरास्तथा।<br>समन्ताद् दर्शयेत् तस्य सौम्यान्सौम्यान् सुरासुरान्॥ १४<br>राक्षसेन्द्रं तथा वक्ष्ये लोकपालं च नैर्ऋतम्।<br>नरारूढं महाकायं रक्षोभिर्बहुभिर्वृतम्॥ १५<br>खड्गहस्तं महानीलं कज्जलाचलसंनिभम्।<br>नरयुक्तविमानस्थं पीताभरणभूषितम्॥ १६<br>वरुणं च प्रवक्ष्यामि पाशहस्तं महाबलम्।<br>शङ्खस्फटिकवर्णाभं सितहाराम्बरावृतम्॥ १७<br>झषासनगतं शान्तं किरीटाङ्गदधारिणम्।<br>वायुरूपं प्रवक्ष्यामि धूम्रं तु मृगवाहनम्॥ १८<br>चित्राम्बरधरं शान्तं युवानं कुञ्चितभ्रुवम्।<br>मृगाधिरूढं वरदं पताकाध्वजसंयुतम्॥ १९ | सूर्यदेवके सारथि अरुण हैं जो कमलदलके सदृश लाल वर्णके हैं। उनके दोनों बगलमें चलते हुए लंबी गरदनवाले अश्व हों। उन सातों अश्वोंको सर्पकी रस्सीसे बाँधकर लगामयुक्त रखना चाहिये। सूर्य-मूर्तिको हाथोंमें कमल लिये हुए कमलपर या वाहनपर स्थित रखना चाहिये॥ १—८॥<br>अब मैं सभी प्रकारके अभीष्ट फलोंको देनेवाले अग्निकी प्रतिमाका स्वरूप बतला रहा हूँ। अग्निकी प्रतिमा कनकके समान उदीप्त कान्तिवाली बनानी चाहिये। वह अर्धचन्द्राकार आसनपर स्थित हो। उनका मुख उदयकालीन सूर्यकी भाँति दिखाना चाहिये। अग्निदेवको यज्ञोपवीत तथा लम्बी दाढ़ीसे युक्त बनाना चाहिये। उनके बायें हाथमें कमण्डलु और दाहिने हाथमें रुद्राक्षकी माला हो। उनका वाहन बकरा ज्वालामण्डलसे विभूषित और उज्ज्वल होना चाहिये। मस्तकपर (या मुखमें) सात जिह्वारूपिणी ज्वालाओंसे युक्त इस प्रतिमाको देवमन्दिर अथवा अग्निकुण्डके मध्यमें स्थापित करना चाहिये।<br>अब मैं यमराजकी प्रतिमाके निर्माणकी विधि बतला रहा हूँ। उनके शरीरका रंग काले अंजनके समान हो। वे दण्ड और पाश धारण करनेवाले, ऐश्वर्ययुक्त और विशाल महिषपर आरूढ़ हों अथवा सिंहासनासीन हों। उनके नेत्र प्रदीप्त अग्निके समान हों। उनके चारों ओर महिष, चित्रगुप्त, विकराल अनुचरवर्ग, मनोहर आकृतिवाले देवताओं तथा विकृत असुरोंकी प्रतिमाओंको भी प्रदर्शित करना चाहिये।<br>अब मैं लोकपाल राक्षसेन्द्र निर्ऋतिकी प्रतिमाकी निर्माण-विधि बतला रहा हूँ। वे मनुष्यपर आरूढ़, विशालकाय, राक्षससमूहोंसे घिरे हुए और हाथमें तलवार लिये हुए हों। उनका वर्ण अत्यन्त नील और कज्जलगिरिके समान दिखायी पड़ता हो। उन्हें पालकीपर सवार और पीले आभूषणोंसे विभूषित बनाना चाहिये।<br>अब मैं महाबली वरुणकी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ। वे हाथमें पाश धारण किये हुए स्फटिकमणि और शङ्खके समान श्वेत कान्तिसे युक्त, उज्ज्वल हार और वस्त्रसे विभूषित, झष* (बड़ी मछली)—पर आसीन, शान्त मुद्रासे सम्पन्न तथा बाजूबन्द और किरीटसे सुशोभित हों।<br>अब मैं वायुदेवकी प्रतिमाका स्वरूप बतला रहा हूँ। उन्हें धूम्र वर्णसे युक्त, मृगपर आसीन, चित्र-विचित्र वस्त्रधारी, शान्त, युवावस्थासे सम्पन्न, तिरछी भौंहोंसे युक्त, वरदमुद्रा और ध्वज-पताकासे विभूषित बनाना चाहिये॥ ९—१९॥ |
* शतपथ १।८।४ आदिके अनुसार बड़ी मछली ही झष है।