भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1013

* अध्याय २६१ * । १००३


| कुबेरं च प्रवक्ष्यामि कुण्डलाभ्यामलङ्कृतम्।<br>महोदरं महाकायं निध्यष्टकसमन्वितम्॥ २०<br><br>गुह्यकैर्बहुभिर्युक्तं धनव्ययकरैस्तथा।<br>हारकेयूररचितं सिताम्बरधरं सदा॥ २१<br><br>गदाधरं च कर्तव्यं वरदं मुकुटान्वितम्।<br>नरयुक्तविमानस्थमेवं रीत्या च कारयेत्॥ २२<br><br>तथैवेशं प्रवक्ष्यामि धवलं धवलेक्षणम्।<br>त्रिशूलपाणिनं देवं त्र्यक्षं वृषगतं प्रभुम्॥ २३<br><br>मातृणां लक्षणं वक्ष्ये यथावदनुपूर्वशः।<br>ब्रह्माणी ब्रह्मसदृशी चतुर्वक्त्रा चतुर्भुजा॥ २४<br><br>हंसाधिरूढा कर्तव्या साक्षसूत्रकमण्डलुः।<br>महेश्वरस्य रूपेण तथा माहेश्वरी मता॥ २५<br><br>जटामुकुटसंयुक्ता वृषस्था चन्द्रशेखरा।<br>कपालशूलखट्वाङ्गवरदाढ्या चतुर्भुजा॥ २६<br><br>कुमाररूपा कौमारी मयूरवरवाहना।<br>रक्तवस्त्रधरा तद्वच्छूलशक्तिधरा मता॥ २७<br><br>हारकेयूरसम्पन्ना कृकवाकुधरा तथा।<br>वैष्णवी विष्णुसदृशी गरुडे समुपस्थिता॥ २८<br><br>चतुर्बाहुश्च वरदा शङ्खचक्रगदाधरा।<br>सिंहासनगता वापि बालकेन समन्विता॥ २९<br><br>वाराहीं च प्रवक्ष्यामि महिषोपरि संस्थिताम्।<br>वराहसदृशी देवी शिरश्चामरधारिणी॥ ३०<br><br>गदाचक्रधरा तद्वद् दानवेन्द्रविनाशिनी।<br>इन्द्राणीमिन्द्रसदृशीं वज्रशूलगदाधराम्॥ ३१<br><br>गजासनगतां देवीं लोचनैर्बहुभिर्वृताम्।<br>तप्तकाञ्चनवर्णाभां दिव्याभरणभूषिताम्॥ ३२<br><br>तीक्ष्णखड्गधरां तद्वद् वक्ष्ये योगेश्वरीमिमाम्।<br>दीर्घजिह्वामूर्ध्वकेशीमस्थिखण्डैश्च मण्डिताम्॥ ३३ | अब मैं कुबेरकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। वे दो कुण्डलोंसे अलंकृत, तोंदयुक्त, विशालकाय, आठ निधियोंसे संयुक्त, बहुतेरे गुह्यकोंसे घिरे हुए, धन व्यय करनेके लिये उद्यत करोंसे युक्त, केयूर और हारसे विभूषित, श्वेत वस्त्रधारी, वरदमुद्रा, गदा और मुकुटसे विभूषित तथा पालकीपर सवार हों। इस प्रकार उनकी प्रतिमा निर्मित करानी चाहिये। अब मैं सामर्थ्यशाली ईशानदेवकी प्रतिमाका वर्णन कर रहा हूँ। उनके शरीरकी कान्ति तथा नेत्र श्वेत हों। वे सामर्थ्यशाली देव तीन नेत्रोंसे युक्त तथा हाथमें त्रिशूल लिये हुए वृषभपर आरूढ़ हों। अब मैं मातृकाओंकी प्रतिमाओंका लक्षण आनुपूर्वी यथार्थरूपसे बता रहा हूँ। ब्रह्माणीकी प्रतिमाको ब्रह्माजीके समान चार मुख, चार भुजाएँ, अक्षसूत्र और कमण्डलुसे विभूषित तथा हंसपर आसीन बनानी चाहिये। इसी प्रकार भगवान् महेश्वरके अनुरूप माहेश्वरीकी प्रतिमा मानी गयी है। वे जटा-मुकुटसे अलंकृत, वृषभासीन, मस्तकपर चन्द्रमासे विभूषित, क्रमशः कपाल, शूल, खट्वाङ्ग* और वरमुद्रासे सुशोभित चार भुजाओंसे सम्पन्न हों। कौमारीकी प्रतिमा स्वामिकार्तिकेयके समान निर्मित करानी चाहिये। वे श्रेष्ठ मयूरपर सवार, लाल वस्त्रसे सुशोभित, शूल और शक्ति धारण करनेवाली, हार और केयूरसे विभूषित तथा मुर्गा लिये हुए हों। वैष्णवीकी मूर्ति विष्णुभगवान्‌के समान हो। वे गरुड़पर आसीन हों, उनके चार भुजाएँ हों, जिनमें क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और वरद-मुद्रा हो। अथवा वे एक बालकसे युक्त सिंहासनपर बैठी हुई हों। अब मैं वाराहीकी प्रतिमाका प्रकार बतलाता हूँ। वे देवी महिषपर बैठी हुई वराहके समान रहती हैं। उनके सिरपर चामर झलता रहना चाहिये। वे हाथोंमें गदा और चक्र लिये हुए बड़े-बड़े दानवोंके विनाशके लिये संनद्ध रहती हैं। इन्द्राणीको इन्द्रके समान वज्र, शूल, गदा धारण किये हुए हाथीपर विराजमान बनाना चाहिये। वे देवी बहुत-से नेत्रोंसे युक्त, तप्त सुवर्णके समान कान्तिमती और दिव्य आभरणोंसे भूषित रहती हैं॥ २०—३२॥<br><br>अब मैं भगवती योगेश्वरी चामुण्डाकी प्रतिमाका वर्णन करता हूँ। वे तीखी तलवार, लम्बी जिह्वा, ऊपर उठे केश तथा हड्डियोंके टुकड़ोंसे विभूषित रहती हैं। |


* खट्वाङ्गका तात्पर्य उस गदासे है, जिसकी आकृति कुछ चारपाईके पायेसे मिलती-जुलती है। इसके सिरपर हड्डी जुड़ी रहती है। यह शिव-शक्तिके आयुधोंमें वर्णित है। (द्र०—वैशम्पायननीतिप्रकाशिका, विश्वामित्रधनुर्वेद आदि)