भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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१००६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भागैस्त्रिभिस्तथा कण्ठः कण्ठपट्टस्तु भागतः।<br>भागाभ्यामूर्ध्वपट्टश्च शेषभागेन पट्टिका॥ ३<br>प्रविष्टं भागमेकैकं जगतीं यावदेव तु।<br>निर्गमस्तु पुनस्तस्य यावद् वै शेषपट्टिका॥ ४<br>वारिनिर्गमनार्थं तु तत्र कार्यः प्रणालकः।<br>पीठिकानां तु सर्वासामेतत्सामान्यलक्षणम्॥ ५<br>विशेषान् देवताभेदाच्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः।<br>स्थण्डिला वाथ वापी वा यक्षी वेदी च मण्डला॥ ६<br>पूर्णचन्द्रा च वज्रा च पद्मा वार्धशशी तथा।<br>त्रिकोणा दशमी तासां संस्थानं वा निबोधत॥ ७<br>स्थण्डिला चतुरस्त्रा तु वर्जिता मेखलादिभिः।<br>वापी द्विमेखला ज्ञेया यक्षी चैव त्रिमेखला॥ ८<br>चतुरस्रायता वेदी न तां लिङ्गेषु योजयेत्।<br>मण्डला वर्तुला या तु मेखलाभिर्गणप्रिया॥ ९<br>रक्ता द्विमेखला मध्ये पूर्णचन्द्रा तु सा भवेत्।<br>मेखलात्रयसंयुक्ता षडस्रा वज्रिका भवेत्॥ १०उसके ऊपर तीन भागोंसे कण्ठ, एक भागसे कण्ठपट्ट, दो भागोंसे ऊर्ध्वपट्ट तथा शेष भागोंसे पट्टिका बनायी जाती है। एक-एक भाग जगतीपर्यन्त एक-दूसरेमें प्रविष्ट रहते हैं। फिर शेषपट्टिका-पर्यन्त सबका निर्गम होता है। पट्टिकामें जल निकलनेके लिये (सोमसूत्रसे मिली) नाली बनानी चाहिये। यह सभी पीठिकाओंका सामान्य लक्षण है। ऋषिगण! अब देवताओंके भेदसे पीठिकाओंके विशेष लक्षण सुनिये। स्थण्डिला, वापी, यक्षी, वेदी, मण्डला, पूर्णचन्द्रा, वज्रा, पद्मा, अर्धशशी तथा दसवीं त्रिकोणा—ये पीठिकाओंके भेद हैं। अब इनकी स्थिति सुनिये। स्थण्डिला-पीठिका चौकोर होती है, इसमें मेखला आदि कुछ नहीं होती। वापीको दो मेखलाओंसे तथा यक्षीको तीन मेखलाओंसे युक्त जानना चाहिये। चार पहलवाली आयताकार पीठिका वेदी कही जाती है, उसे लिङ्गकी स्थापनामें प्रयुक्त नहीं करना चाहिये।<br>मण्डला मेखलाओंसे युक्त गोलाकार होती है, वह प्रमथगणोंको प्रिय होती है। जो पीठिका लाल वर्णवाली तथा मध्यमें दो मेखलाओंसे युक्त होती है, उसे पूर्णचन्द्रा कहते हैं। तीन मेखलाओंसे युक्त छः कोनेवाली पीठिकाको वज्रा कहते हैं॥ १—१०॥
षोडशास्रा भवेत् पद्मा किंचिद्ध्रस्वा तु मूलतः।<br>तथैव धनुषाकारा सार्धचन्द्रा प्रशस्यते॥ ११<br>त्रिशूलसदृशी तद्वत् त्रिकोणा ह्यूर्ध्वतो मता।<br>प्रागुदक्प्रवणा तद्वत् प्रशस्ता लक्षणान्विता॥ १२<br>परिवेषं त्रिभागेन निर्गमं तत्र कारयेत्।<br>विस्तारं तत्प्रमाणं च मूले चाग्रे तथोर्ध्वतः॥ १३<br>जलमार्गश्च कर्तव्यस्त्रिभागेन सुशोभनः।<br>लिङ्गस्यार्धविभागेन स्थौल्येन समधिष्ठिता॥ १४<br>मेखला तत्रिभागेन खातं चैव प्रमाणतः।<br>अथवा पादहीनं तु शोभनं कारयेत् सदा॥ १५<br>उत्तरस्थं प्रणालं च प्रमाणादधिकं भवेत्।<br>स्थण्डिलायामथारोग्यं धनं धान्यं च पुष्कलम्॥ १६<br>गोप्रदा च भवेद् यक्षी वेदी सम्पत्प्रदा भवेत्।<br>मण्डलायां भवेत् कीर्तिवरदा पूर्णचन्द्रिका॥ १७मूल भागमें कुछ छोटी (पद्मपत्र-सी) सोलह पहलोंवाली पीठिका पद्मा कही जाती है। उसी प्रकार धनुषके आकारवाली पीठिकाको अर्धचन्द्रा कहते हैं। ऊपरसे त्रिशूलके समान दिखायी पड़नेवाली, पूर्व तथा उत्तरकी ओर कुछ ढालू एवं श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त पीठिकाको त्रिकोणा कहते हैं। पीठिकाके तीन भाग परिधिके बाहर रहें और मूल, अग्रभाग तथा ऊपर—इन तीनों भागोंके विस्तार अधिक हों। त्रिभागमें जल निकलनेकी सुन्दर नाली (सोमसूत्र) होनी चाहिये। पीठिका लिङ्गके आधे भागकी मोटाईके परिमाणसे बनानी चाहिये। लिङ्गके तीन भागके बराबर मेखलाका खात बनाना चाहिये। अथवा वह चौथाई भागसे कम रहे, किंतु सर्वदा सुन्दर बनाना चाहिये। उत्तरकी ओर स्थित नाली प्रमाणसे कुछ अधिक ही बनानी चाहिये। स्थण्डिला-पीठिकाके स्थापित करनेसे आरोग्य तथा विपुल धन-धान्यादिकी प्राप्ति होती है। यक्षी गौ देनेवाली तथा वेदी सम्पत्तिदायिनी कही गयी है। मण्डलामें कीर्ति प्राप्त होती है और पूर्णचन्द्रिका वरदान देनेवाली कही गयी है।