भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 1017, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1017
* अध्याय २६३ *१००७

| आयुष्प्रदा भवेद् वज्रा पद्मा सौभाग्यदा भवेत्।<br>पुत्रप्रदार्थचन्द्रा स्यात् त्रिकोणा शत्रुनाशिनी ॥ १८<br>देवस्य यजनार्थं तु पीठिका दश कीर्तिताः।<br>शैले शैलमयीं दद्यात् पार्थिवे पार्थिवीं तथा ॥ १९<br>दारुजे दारुजां कुर्यान्मिश्रे मिश्रां तथैव च।<br>नान्ययोनिस्तु कर्तव्या सदा शुभफलेप्सुभिः ॥ २०<br>अर्चायामासमं दैर्घ्यं लिङ्गायामसमं तथा।<br>यस्य देवस्य या पत्नी तां पीठे परिकल्पयेत्।<br>एतत् सर्वं समाख्यातं समासात् पीठलक्षणम् ॥ २१ | वज्रा दीर्घायु प्रदान करनेवाली तथा पद्मा सौभाग्यदायिनी कही गयी है। अर्धचन्द्रा पुत्र प्रदान करनेवाली तथा त्रिकोणा शत्रुनाशिनी होती है। इस प्रकार देवताकी पूजाके लिये ये दस पीठिकाएँ कही गयी हैं। पत्थरकी प्रतिमामें पत्थरकी तथा मिट्टीकी मूर्तिमें मिट्टीकी पीठिका देनी चाहिये। इसी प्रकार काष्ठकी मूर्तिमें काष्ठकी तथा मिश्रित धातुओंकी प्रतिमामें धातुमिश्रितकी पीठिका रखनी चाहिये। शुभ फलकी कामना करनेवालोंको दूसरे प्रकारकी पीठिका कभी नहीं देनी चाहिये। पीठिकाकी लम्बाई मूर्तिमें तथा लिङ्गमें बराबर नहीं रखी जाती। जिस देवताकी जो पत्नी हो, उसे उसी पीठपर स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार यह मैंने आपलोगोंको संक्षेपमें पीठिकाका लक्षण बतलाया है॥ ११—२१॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तने पीठिकानुकीर्तनं नाम द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन-प्रसङ्गमें पीठिका-वर्णन नामक दो सौ बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६२॥


दो सौ तिरसठवाँ अध्याय

शिवलिङ्गके निर्माणकी विधि

| सूत उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि लिङ्गलक्षणमुत्तमम्।<br>सुस्निग्धं च सुवर्णं च लिङ्गं कुर्याद् विचक्षणः॥ १<br>प्रासादस्य प्रमाणेन लिङ्गमानं विधीयते।<br>लिङ्गमानेन वा विद्यात् प्रासादं शुभलक्षणम् ॥ २<br>चतुरस्रे समे गर्ते ब्रह्मसूत्रं निपातयेत्।<br>वामेन ब्रह्मसूत्रस्य अर्चा वा लिङ्गमेव च॥ ३<br>प्रागुत्तरेण लीनं तु दक्षिणापरमाश्रितम्।<br>पुरस्यापरदिग्भागे पूर्वद्वारं प्रकल्पयेत्॥ ४<br>पूर्वेण चापरं द्वारं माहेन्द्रं दक्षिणोत्तरम्।<br>द्वारं विभज्य पूर्वं तु एकविंशतिभागिकम्॥ ५<br>ततो मध्यगतं ज्ञात्वा ब्रह्मसूत्रं प्रकल्पयेत्।<br>तस्यार्धं तु त्रिधा कृत्वा भागं चोत्तरतस्त्यजेत्॥ ६<br>एवं दक्षिणतस्त्यक्त्वा ब्रह्मस्थानं प्रकल्पयेत्।<br>भागार्धेन तु यल्लिङ्गं कार्यं तदिह शस्यते॥ ७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं लिङ्गके उत्तम लक्षणका वर्णन कर रहा हूँ। चतुर पुरुष अत्यन्त चिकने एवं श्रेष्ठ (श्वेत) रंगके शिवलिङ्गका निर्माण करे। मन्दिरके प्रमाणके अनुसार ही शिवलिङ्गका प्रमाण बतलाया गया है। अथवा शिवलिङ्गके प्रमाणानुसार शिव-मन्दिरका निर्माण शुभ जानना चाहिये। सर्वप्रथम चौकोर एवं समतल गर्तमें ब्रह्मसूत्र गिराना चाहिये। ब्रह्मसूत्रकी बायीं ओर अर्चा या लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। वहाँ पूर्वोत्तर या दक्षिणपूर्वकी ओर पूर्वद्वार बनाना चाहिये। वह द्वार कुछ दक्षिणाश्रित या ईशानमें लीन रहना चाहिये। पूर्वका यह द्वार माहेन्द्रद्वार कहलाता है। प्रथमतः पूर्वद्वारको इक्कीस भागोंमें विभक्तकर मध्य भागमें ब्रह्मसूत्रकी कल्पना करनी चाहिये। इसके अर्धभागको तीन भागोंमें विभक्तकर उत्तरकी ओर तथा दक्षिणकी ओर एक-एक भाग छोड़कर ब्रह्मस्थानकी कल्पना करनी चाहिये। उस अर्धभागमें लिङ्गकी स्थापना प्रशस्त मानी गयी है। |