मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१०१० | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शिरसा च सदा निम्नं मनोज्ञं लक्षणान्वितम्।<br>सौम्यं तु दृश्यते यत्तु लिङ्गं तद् वृद्धिदं भवेत्॥ २३<br><br>अथ मूले च मध्ये तु प्रमाणे सर्वतः समम्।<br>एवंविधं तु यल्लिङ्गं भवेत् तत् सार्वकामिकम्॥ २४<br><br>अन्यथा यद् भवेल्लिङ्गं तदसत् सम्प्रचक्षते।<br>एवं रत्नमयं कुर्यात् स्फाटिकं पार्थिवं तथा।<br>शुभं दारुमयं चापि यद् वा मनसि रोचते॥ २५ | चौड़ा होता है, वह पूजनीय नहीं रह जाता। जो लिङ्ग सिरकी ओरसे सदा निम्न, मनोहर, उत्तम लक्षणोंसे युक्त तथा सौम्य दिखायी पड़ता है, वह समृद्धिको देनेवाला होता है। जो लिङ्ग मूल तथा मध्यभागमें एक समान रहता है, वह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होता है। जो लिङ्ग इन उपर्युक्त लक्षणोंसे भिन्न होते हैं, वे असत् कहे जाते हैं अर्थात् वे अपूज्यनीय लिङ्ग हैं। इस प्रकार ऊपर बताये गये प्रमाणोंके अनुसार रत्न, स्फटिक, मिट्टी अथवा शुभ काष्ठका लिङ्ग अपनी रुचिके अनुकूल स्थापित करना चाहिये॥ २२—२५॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवतार्चानुकीर्तनं नाम त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवतार्चानुकीर्तन नामक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६३॥
दो सौ चौंसठवाँ अध्याय
प्रतिमा-प्रतिष्ठाके प्रसङ्गमें यज्ञाङ्गरूप कुण्डादिके निर्माणकी विधि
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>देवतानामथैतासां प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम्।<br>वद सूत यथान्यायं सर्वेषामप्यशेषतः॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! अब आप इन सभी देवताओंकी प्रतिमाके स्थापनकी उत्तम विधि यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि प्रतिष्ठाविधिमुत्तमम्।<br>कुण्डमण्डपवेदीनां प्रमाणं च यथाक्रमम्॥ २ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं क्रमशः देवप्रतिमाकी प्रतिष्ठाकी उत्तम विधि तथा मण्डप, कुण्ड और वेदीके प्रमाणको बतला रहा हूँ। |
| चैत्रे वा फाल्गुने वापि ज्येष्ठे वा माधवे तथा।<br>माघे वा सर्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा भवेत्॥ ३ | फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ अथवा माघमासमें सभी देवताओंकी प्रतिष्ठा शुभदायिनी होती है। |
| प्राप्य पक्षं शुभं शुक्लमतीते दक्षिणायने।<br>पञ्चमी च द्वितीया च तृतीया सप्तमी तथा॥ ४<br>दशमी पौर्णमासी च तथा श्रेष्ठा त्रयोदशी।<br>आसु प्रतिष्ठा विधिवत् कृता बहुफला भवेत्॥ ५ | दक्षिणायन बीत जानेपर अर्थात् उत्तरायणमें शुभकारी शुक्लपक्षमें द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी, पूर्णमासी तिथियोंमें विधिपूर्वक की गयी प्रतिष्ठा बहुत फल देनेवाली होती है। |
| आषाढे द्वे तथा मूलमुत्तराद्वयमेव च।<br>ज्येष्ठाश्रवणरोहिण्यः पूर्वाभाद्रपदा तथा॥ ६<br>हस्ताश्विनी रेवती च पुष्यो मृगशिरास्तथा।<br>अनुराधा तथा स्वाती प्रतिष्ठादिषु शस्यते॥ ७ | पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, मूल, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, ज्येष्ठा, श्रवण, रोहिणी, पूर्वाभाद्रपद, हस्त, अश्विनी, रेवती, पुष्य, मृगशिरा, अनुराधा तथा स्वाती—ये नक्षत्र प्रतिष्ठा आदिमें प्रशस्त माने गये हैं। |
| बुधो बृहस्पतिः शुक्रस्त्रयोऽप्येते शुभग्रहाः।<br>एभिर्निरीक्षितं लग्नं नक्षत्रं च प्रशस्यते॥ ८ | बुध, बृहस्पति तथा शुक्र—ये तीनों ग्रह शुभकारक हैं। इन तीनों ग्रहोंसे दृष्ट (एवं युक्त) लग्न तथा नक्षत्र |