भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 1021
  • अध्याय २६४ *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ग्रहताराबलं लब्ध्वा ग्रहपूजां विधाय च।<br>निमित्तं शकुनं लब्ध्वा वर्जयित्वाऽद्भुतादिकम्॥ ९<br><br>शुभयोगे शुभस्थाने क्रूरग्रहविवर्जिते।<br>लग्ने ऋक्षे प्रकुर्वीत प्रतिष्ठादिकमुत्तमम्॥ १०प्रशंसनीय हैं। ग्रह और ताराका बल प्राप्तकर तथा उनकी पूजाकर शुभ शकुनको देखकर, अद्भुत आदि बुरे योगोंको छोड़कर शुभयोगमें शुभस्थानपर क्रूर ग्रहोंसे रहित शुभ लग्न एवं शुभ नक्षत्रमें प्रतिष्ठा आदि उत्तम कार्योंको करना चाहिये॥ २—१०॥
अयने विषुवे तद्वत् षडशीतिमुखे तथा।<br>एतेषु स्थापनं कार्यं विधिदृष्टेन कर्मणा॥ ११<br><br>प्राजापत्ये तु शयनं श्वेते तूत्थापनं तथा।<br>मुहूर्त्ते स्थापनं कुर्यात् पुनर्ब्राह्मे विचक्षणः॥ १२<br><br>प्रासादस्योत्तरे वापि पूर्वे वा मण्डपो भवेत्।<br>हस्तान् षोडश कुर्वीत दश द्वादश वा पुनः॥ १३<br><br>मध्ये वेदिकया युक्तः परिक्षिप्तः समंततः।<br>पञ्च सप्तापि चतुरः करान् कुर्वीत वेदिकाम्॥ १४<br><br>चतुर्भिस्तोरणैर्युक्तो मण्डपः स्याच्चतुर्मुखः।<br>प्लक्षद्वारं भवेत् पूर्वं याम्ये चौदुम्बरं भवेत्॥ १५<br><br>पश्चादश्वत्थघटितं नैग्रोधं तथोत्तरे।<br>भूमौ हस्तप्रविष्टानि चतुर्हस्तानि चोच्छ्रये॥ १६<br><br>सूपलिप्तं तथा श्लक्ष्णं भूतलं स्यात् सुशोभनम्।<br>वस्त्रैर्नानाविधैस्तद्वत् पुष्पपल्लवशोभितम्॥ १७<br><br>कृत्वैवं मण्डपं पूर्वं चतुर्द्वारेषु विन्यसेत्।<br>अव्रणान् कलशानष्टौ ज्वलत्काञ्चनगर्भितान्॥ १८<br><br>चूतपल्लवसंछन्नान् सितवस्त्रयुगान्वितान्।<br>सर्वौषधिफलोपेतांश्चन्दनोदकपूरितान् ॥ १९<br><br>एवं निवेश्य तद्गर्भे गन्धधूपार्चनादिभिः।<br>ध्वजादिरोहणं कार्यं मण्डपस्य समन्ततः॥ २०अयन (कर्क-मकर), विषुव (तुला-मेष) और षडशीतिमुख (कन्या, मिथुन, धनुर्मीन) संक्रान्तियोंमें विधिपूर्वक अनुष्ठानद्वारा देवस्थापन करना चाहिये। चतुर मनुष्यको चाहिये कि वह प्राजापत्य मुहूर्तमें शयन, श्वेतमें उत्थापन तथा ब्राह्ममें स्थापन करे। अपने महलकी पूर्व अथवा उत्तर दिशामें मण्डप बनवाना चाहिये। उसे सोलह, बारह अथवा दस हाथका बनाना चाहिये। उसके मध्यभागमें वेदी होनी चाहिये, जो चारों ओरसे समान तथा पाँच, सात या चार हाथ विस्तृत हो। चतुर्मुख मण्डपके चारों ओर चार तोरण बने हों। पूर्व दिशामें पाकड़का, दक्षिणमें गूलरका, पश्चिममें पीपलका तथा उत्तरमें बरगदका द्वार होना चाहिये, जो भूमिमें एक हाथ प्रविष्ट हों तथा भूमिसे ऊपर चार हाथ ऊँचे हों। उसका भूतल भलीभाँति लिपा हुआ, चिकना तथा सुन्दर होना चाहिये। इसी प्रकार विविध वस्त्र, पुष्प और पल्लवोंसे सुशोभित करना चाहिये। इस प्रकार मण्डपका निर्माण कर पहले चारों द्वारोंपर छिद्ररहित आठ कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये, जो देदीप्यमान सुवर्णकी भाँति कान्तियुक्त, आमके पल्लवोंसे आच्छादित, दो श्वेत वस्त्रोंसे युक्त, सभी ओषधियों एवं फलोंसे सम्पन्न तथा चन्दनमिश्रित जलसे परिपूर्ण हों। इस प्रकार उन कलशोंको स्थापित कर गन्ध, धूप आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा उनके भीतर पूजन करे। फिर मण्डपके चारों ओर ध्वजा आदिकी स्थापना करनी चाहिये॥ ११—२०॥
ध्वजांश्च लोकपालानां सर्वदिक्षु निवेशयेत्।<br>पताका जलदाकारा मध्ये स्यान्मण्डपस्य तु॥ २१<br><br>गन्धधूपादिकं कुर्यात् स्वैः स्वैर्मन्त्रैरनुक्रमात्।<br>बलिं च लोकपालेभ्यः स्वमन्त्रेण निवेदयेत्॥ २२<br><br>ऊर्ध्वं तु ब्रह्मणे देयं त्वधस्ताच्छेषवासुकेः।<br>संहितायां तु ये मन्त्रास्तद्दैवत्याः शुभाः स्मृताः॥ २३लोकपालोंकी पताका सभी दिशाओंमें स्थापित करे। मण्डपके मध्यभागमें बादलके रंगकी अथवा बहुत ऊँची पताका स्थापित करनी चाहिये। फिर क्रमशः लोकपालोंके पृथक्-पृथक् मन्त्रोंद्वारा गन्ध-धूपादिसे उनकी पूजा करे तथा उन्हींके मन्त्रोंद्वारा उन्हें बलि प्रदान करे। ब्रह्माजीके लिये ऊपर तथा शेष वासुकिके लिये नीचे पूजाका विधान कहा गया है। संहितामें जो मन्त्र जिस देवताके लिये आये हैं, उसीके लिये प्रयुक्त होनेपर मङ्गलकारी माने गये हैं।
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