मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| तैः पूजा लोकपालानां कर्तव्या च समन्ततः।<br>त्रिरात्रमेकरात्रं वा पञ्चरात्रमथापि वा॥ २४<br>अथवा सप्तरात्रं तु कार्यं स्यादधिवासनम्।<br>एवं सतोरणं कृत्वा अधिवासनमुत्तमम्॥ २५<br>तस्याप्युत्तरतः कुर्यात् स्नानमण्डपमुत्तमम्।<br>तदर्धेन त्रिभागेन चतुर्भागेन वा पुनः॥ २६<br>आनीय लिङ्गमर्चां वा शिल्पिनः पूजयेद् बुधः।<br>वस्त्राभरणरत्नैश्च येऽपि तत्परिचारकाः॥ २७<br>क्षमध्वमिति तान् ब्रूयाद् यजमानोऽप्यतः परम्।<br>देवं प्रस्तरणे कृत्वा नेत्रज्योतिः प्रकल्पयेत्॥ २८ | उन्हीं मन्त्रोंद्वारा चारों ओर लोकपालोंकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् तीन रात, एक रात, पाँच रात अथवा सात राततक उनका अधिवासन करना चाहिये। इस प्रकार तोरण तथा उत्तम अधिवासन कर उक्त मण्डपकी उत्तर दिशामें उसके आधे, तिहाई अथवा चौथाई भागके परिमाणसे उत्तम स्नानमण्डपका निर्माण करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष लिङ्ग या मूर्तिको लाकर कारीगरों तथा उनके सभी अनुचरोंकी वस्त्र, आभूषण और रत्नद्वारा पूजा करे। तदनन्तर यजमान उनसे यह कहे कि 'मेरे अपराधोंको क्षमा कीजिये।' तत्पश्चात् देवताको बिछौनेपर लिटाकर उनकी नेत्रज्योति सम्पादित करे॥ २१—२८॥ | | अक्षणोरुद्धरणं वक्ष्ये लिङ्गस्यापि समासतः।<br>सर्वतस्तु बलिं दद्यात् सिद्धार्थघृतपायसैः॥ २९<br>शुक्लपुष्पैरलङ्कृत्य घृतगुग्गुलुधूपितम्।<br>विप्राणां चार्चनं कुर्याद् दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्॥ ३०<br>गां महीं कनकं चैव स्थापकाय निवेदयेत्।<br>लक्षणं कारयेद् भक्त्या मन्त्रेणानेन वै द्विजः॥ ३१ | अब मैं संक्षेपमें नेत्रों तथा अन्य चिह्नोंके उद्धारका प्रकार बता रहा हूँ। पहले देवताके चारों ओर पीली सरसों, घृत और खीरद्वारा बलि प्रदान करे। फिर श्वेत पुष्पोंसे अलंकृतकर घृत और गुग्गुलसे धूप करनेके बाद ब्राह्मणोंकी पूजा करे और उन्हें अपनी शक्तिके अनुकूल दक्षिणा दे। स्थापना करानेवाले ब्राह्मणको गौ, पृथ्वी तथा सुवर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये। फिर ब्राह्मण भक्तिपूर्वक इस मन्त्रद्वारा देवप्रतिमामें नेत्र (ज्योति)-की स्थापना करे अथवा करवाये। मन्त्र यों है— | | ओं नमो भगवते तुभ्यं शिवाय परमात्मने।<br>हिरण्यरेतसे विष्णो विश्वरूपाय ते नमः॥ ३२<br>मन्त्रोऽयं सर्वदेवानां नेत्रज्योतिष्वपि स्मृतः।<br>एवमामन्त्र्य देवेशं काञ्चनेन विलेखयेत्॥ ३३ | 'ॐ नमो भगवते तुभ्यं शिवाय परमात्मने।<br>हिरण्यरेतसे विष्णो विश्वरूपाय ते नमः।'<br>'विष्णो! आप शिव, परमात्मा, हिरण्यरेता, विश्वरूप और ऐश्वर्यशाली हैं, आपको बारंबार नमस्कार है।' यह मन्त्र सभी देवताओंकी प्रतिमाके नेत्रज्योतिसंस्कारमें उपयोगी माना गया है। इस प्रकार देवेशको आमन्त्रित कर सुवर्णकी शलाकाद्वारा उन्हें चिह्नित करे। | | मङ्गल्यानि च वाद्यानि ब्रह्मघोषं सगीतकम्।<br>वृद्ध्यर्थं कारयेद् विद्वानमङ्गल्यविनाशनम्॥ ३४<br>लक्षणोद्धरणं वक्ष्ये लिङ्गस्य सुसमाहितः।<br>त्रिधा विभज्य पूज्यायां लक्षणं स्याद् विभाजकम्॥ ३५<br>लेखात्रयं तु कर्तव्यं यवाष्टान्तरसंयुतम्।<br>न स्थूलं न कृशं तद्वन्न वक्रं छेदवर्जितम्॥ ३६<br>निम्नं यवप्रमाणेण ज्येष्ठलिङ्गस्य कारयेत्।<br>सूक्ष्मास्ततस्तु कर्तव्या यथा मध्यमके न्यसेत्॥ ३७ | तदुपरान्त विद्वान् पुरुष अपनी समृद्धि तथा अमङ्गलका विनाश करनेके लिये माङ्गलिक वाद्य, गीत और ब्राह्मणोंकी वेदध्वनियोंका समारोह करे। अब मैं स्वस्थचित्त होकर लिङ्गके लक्षणोद्धारणका प्रकार बता रहा हूँ। लिङ्गके तीन भाग करना चाहिये। उसमें विभाजक लक्षण होता है। आठ जौका अन्तर रखते हुए तीन रेखा चिह्नित करनी चाहिये, वे न तो मोटी हों, न सूक्ष्म हों, न टेढ़ी हों और न उनमें छिद्र हो। ज्येष्ठ लिङ्गमें जौके प्रमाणकी निम्न रेखा अंकित करनी चाहिये। उसके |