मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| समुद्रज्येष्ठमन्त्रेण आपोदिव्येति चापरः।<br>यासां राजेति मन्त्रस्तु आपोहिष्ठेति चापरः॥ ९<br><br>एवं स्नाप्य ततो देवं पूज्य गन्धानुलेपनैः।<br>प्रच्छाद्य वस्त्रयुग्मेन अभिवस्त्रेत्युदाहृतम्॥ १० | वे चारों मन्त्र इस प्रकार हैं—'समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य०', (ऋक्० सं० ७।४९।१) 'आपो दिव्याः०', (ऋक्० सं० ७।४९।२) 'यासां राजा०' (वही १।३) तथा 'आपो हि ष्ठाः०' (वाजस सं० ११।५०)। इस प्रकार देवताकी प्रतिमाको स्नान कराकर 'गन्धद्वारा' इस मन्त्रसे सुगन्धित द्रव्य-चन्दनादिसे पूजा करे और दो वस्त्रोंसे ढँककर शयन करावे। यह 'अभिवस्त्र' की विधि है॥ ९-१०॥ | | उत्थापयेत्ततो देवमुत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते।<br>आमूरजेति च तथा रथे तिष्ठेति चापरः॥ ११<br><br>रथे ब्रह्मरथे वापि धृतां शिल्पिगणेन तु।<br>आरोप्य च ततो विद्वानाकृष्णेन प्रवेशयेत्॥ १२<br><br>ततः प्रास्तीर्य शय्यायां स्थापयेच्छनकैर्बुधः।<br>कुशानास्तीर्य पुष्पाणि स्थापयेत्प्राङ्मुखं ततः॥ १३<br><br>ततस्तु निद्राकलशं वस्त्रकाञ्चनसंयुतम्।<br>शिरोभागे तु देवस्य जपन्नेवं निधापयेत्॥ १४<br><br>आपोदेवीति मन्त्रेण आपोऽस्मान् मातरोऽपि च।<br>ततो दुकूलपट्टैश्चाच्छाद्य नेत्रोपधानकम्॥ १५<br><br>दद्याच्छिरसि देवस्य कौशेयं वा विचक्षणः।<br>मधुना सर्पिषाभ्यज्य पूज्य सिद्धार्थकैस्ततः॥ १६<br><br>आप्यायस्वेति मन्त्रेण या ते रुद्र शिवेति च।<br>उपविश्यार्चयेद् देवं गन्धपुष्पैः समन्ततः॥ १७<br><br>सितं प्रतिसरं दद्याद् बार्हस्पत्येति मन्त्रतः।<br>दुकूलपट्टैः कार्पासैर्नानाचित्रैरथापि वा॥ १८<br><br>आच्छाद्य देवं सर्वत्र छत्रचामरदर्पणम्।<br>पार्श्वतः स्थापयेत्तत्र वितानं पुष्पसंयुतम्॥ १९<br><br>रत्नान्योषधयस्तत्र गृहोपकरणानि च।<br>भाजनानि विचित्राणि शयनान्यासनानि च॥ २०<br><br>अभि त्वा शूरमन्त्रेण यथा विभवतो न्यसेत्।<br>क्षीरं क्षौद्रं घृतं तद्वद् भक्ष्यभोज्यान्नपायसैः॥ २१<br><br>षड्विधैश्च रसैस्तद्वत् समन्तात्परिपूजयेत्।<br>बलिं दद्यात् प्रयत्नेन मन्त्रेणानेन भूरिशः॥ २२<br><br>त्र्यम्बकं यजामह इति सर्वतः शनकैर्भुवि। | तदनन्तर विद्वान् पुरुष—'उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०' इस मन्त्रका उच्चारण कर प्रतिमाको उठाये और 'आमूरजा०', (वाजस० सं०) 'रथे तिष्ठ०'—इन दो मन्त्रोंसे रथपर या ब्रह्मरथपर शिल्पियोंद्वारा रखवाकर ले आवे और 'आकृष्णेन' (वाजस० सं० ३३।४५) मन्त्रद्वारा मूर्तिको मन्दिरमें प्रवेश कराये तथा शय्यापर कुश तथा पुष्पोंको बिछाकर बुद्धिमान् पुरुष उसे पूर्वाभिमुख कर धीरेसे स्थापित करे। तदनन्तर वस्त्र और सुवर्णसहित निद्राकलशको देवताके सिरहानेकी ओर—'आपो देवी०', (वही १२।३५) 'आपोऽस्मान् मातरः०'—(वाज० सं० ४।२) इन मन्त्रोंको जपते हुए स्थापित कराना चाहिये। तत्पश्चात् रेशमी वस्त्रद्वारा नेत्रोंको ढककर तकिया दे अथवा रेशमी वस्त्रको प्रतिमाके सिरके नीचे रख दे। फिर बैठकर मधु और घृतद्वारा स्नान कराकर तथा पीली सरसोंसे पूजाकर 'आप्यायस्व०' (वाजस० १२।११२) तथा 'या ते रुद्र शिवा तनू०' (वाजस० सं० १६।२।४९) इन मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक चारों ओरसे चन्दन तथा पुष्पादिसे देवताकी पूजा करे। फिर 'बार्हस्पत्य०' (वही १७।३६) मन्त्रद्वारा श्वेत वर्णके सूतका बना हुआ कंगन अर्पित करे। तदनन्तर अनेक प्रकारके चित्र-विचित्र रेशमी अथवा सूती वस्त्रोंद्वारा प्रतिमाको भलीभाँति ढककर अगल-बगलमें छत्र, चामर, दर्पण, आदि सामग्रियाँ रखे और पुष्पयुक्त चँदोवा स्थापित करे। वहीं विविध प्रकारसे रत्न, औषध, अन्य घरेलू वस्तुएँ, विचित्र प्रकारके पात्र, शय्या, आसन आदि सामग्रियाँ अपनी आर्थिक शक्तिके अनुरूप 'अभि त्वा शूर०' इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए रखे। फिर दूध, मधु, घृत, छहों प्रकारके रसों (खट्टा, मीठा, तीता, कड़वा, नमकीन तथा कसैला)—से संयुक्त भक्ष्य एवं भोज्य अन्न और खीरको भी चारों ओर रखकर पूजा करनी चाहिये। फिर 'त्र्यम्बकं यजामहे०' (वाजस० सं० ३।६०)—इस मन्त्रसे प्रचुर परिमाणमें प्रयत्नपूर्वक भूतलपर सब ओरसे घीसे बलि देनी चाहिये॥ ११–२२ १/२॥ |