भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 1025
* अध्याय २६५ *१०१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मूर्तिपान् स्थापयेत् पश्चात् सर्वदिक्षु विचक्षणः ॥ २३<br>चतुरो द्वारपालांश्च द्वारेषु विनिवेशयेत् ।<br>श्रीसूक्तं पावमानं च सोमसूक्तं सुमङ्गलम् ॥ २४<br>तथा च शान्तिकाध्यायमिन्द्रसूक्तं तथैव च।<br>रक्षोघ्नं च तथा सूक्तं पूर्वतो बह्वचो जपेत् ॥ २५<br>रौद्रं पुरुषसूक्तं च श्लोकाध्यायं सशुक्रीयम् ।<br>तथैव मण्डलाध्यायमध्वर्युर्दक्षिणे जपेत् ॥ २६<br>वामदेव्यं बृहत्साम ज्येष्ठसाम रथन्तरम् ।<br>तथा पुरुषसूक्तं च रुद्रसूक्तं सशान्तिकम् ॥ २७<br>भारुण्डानि च सामानि छन्दोगः पश्चिमे जपेत् ।<br>अथर्वाङ्गिरसं तद्वन्नीलं रौद्रं तथैव च ॥ २८<br>तथापराजितादेवीसप्तसूक्तं सरौद्रकम् ।<br>तथैव शान्तिकाध्यायमथर्वा चोत्तरे जपेत् ॥ २९<br>शिरःस्थाने तु देवस्य स्थापको होममाचरेत् ।<br>शान्तिकैः पौष्टिकैस्तद्वन्मन्त्रैर्व्याहृतिपूर्वकैः ॥ ३०<br>पलाशोदुम्बराश्वत्था अपामार्गः शमी तथा ।<br>हुत्वा सहस्रमेकैकं देवं पादे तु संस्पृशेत् ॥ ३१<br>ततो होमसहस्रेण हुत्वा हुत्वा ततस्ततः ।<br>नाभिमध्यं तथा वक्षः शिरश्चाप्यालभेत् पुनः ॥ ३२तदनन्तर विद्वान् पुरुष सभी दिशाओंमें मूर्तिरक्षकोंको नियुक्त करे तथा चारों द्वारोंपर चार द्वारपालोंको बैठा दे। फिर पूर्व दिशामें बैठकर बह्वृच् नामक ऋत्विज्को श्रीसूक्त पावमान, सुमङ्गलकारी सोमसूक्त, शान्तिकाध्याय, इन्द्रसूक्त तथा रक्षोघ्नसूक्त—इन ऋचाओंका जप करना चाहिये। इसी प्रकार दक्षिण दिशामें बैठकर अध्वर्यु नामक ऋत्विज्‌को रौद्रसूक्त, पुरुषसूक्त, शुक्रीयसहित श्लोकाध्याय तथा मण्डलाध्यायका जप करना चाहिये। सामग नामक उद्गाता ऋत्विज्‌को पश्चिम-दिशामें बैठकर वामदेव्य, बृहत्साम, ज्येष्ठसाम, रथन्तर, पुरुषसूक्त, शान्तिसहित रुद्रसूक्त तथा भारुण्ड सामका जप करना चाहिये। इसी प्रकार अथर्वा नामक ऋत्विज्‌को उत्तर दिशामें बैठकर अथर्वाङ्गिरस, नीलसूक्त, रौद्रसूक्तसहित अपराजिता तथा देवीसूक्तके सात मन्त्र और शान्तिकाध्याय (वा० ३७)-का जप करना चाहिये। देवप्रतिमाके सिरहानेकी ओर स्थापकको व्याहृतिपूर्वक शान्तिक तथा पौष्टिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए हवन करना चाहिये। उस समय पलाश, गूलर, पीपल, अपामार्ग (चिड़चिढ़ा), शमी—इन सबकी एक-एक हजार लकड़ियोंकी अग्निकुण्डमें मन्त्रद्वारा आहुति देते हुए देवताके पैरको स्पर्श किये रहना चाहिये। इसी प्रकार नाभि, वक्षःस्थल और शिरोभागको स्पर्श किये हुए प्रत्येक बार एक-एक सहस्र आहुति प्रदान करनी चाहिये॥ २३—३२॥
हस्तमात्रेषु कुण्डेषु मूर्तिपाः सर्वतोदिशम् ।<br>समेखलेषु ते कुर्युर्योनिवक्त्रेषु चादरात् ॥ ३३<br>वितस्तिमात्रा योनिः स्याद् गजोष्ठसदृशी तथा ।<br>आयता छिद्रसंयुक्ता पार्श्वतः कलयोच्छ्रिता ॥ ३४<br>कुण्डात् कलानुसारेण सर्वतश्चतुरङ्गुला ।<br>विस्तारेणोच्छ्रया तद्वच्चतुरस्त्रा समा भवेत् ॥ ३५<br>वेदीभित्तिं परित्यज्य त्रयोदशभिरङ्गुलैः ।<br>एवं नवसु कुण्डेषु लक्षणं चैव दृश्यते ॥ ३६<br>आग्नेयशाक्रयाम्येषु होतव्यमुदगाननैः ।<br>शान्तये लोकपालेभ्यो मूर्तिभ्यः क्रमशस्तथा ॥ ३७<br>तथा मूर्त्यधिदेवानां होमं कुर्यात् समाहितः ।इस प्रकार एक हाथके बने हुए मेखला एवं योनियुक्त कुण्डमें सभी दिशाओंमें बैठे हुए मूर्तिस्थापकगण आदरपूर्वक हवन करें। कुण्डकी योनि एक बित्ता लम्बी, हाथीके ओठ या पीपलके पत्तेके समान आकारवाली होनी चाहिये। वह आयताकार, छिद्रयुक्त, कुण्डकी कलाके अनुसार दोनों बगल ऊँची, चौकोर और समतल होनी चाहिये। वेदीकी दीवालसे तेरह अंगुल दूर हटकर दूसरे अन्य नौ कुण्डोंको बनाना चाहिये। उनका भी लक्षण पूर्वोक्त प्रकारका समझना चाहिये।* होताओंको अग्निकोण, पूर्व दिशा तथा दक्षिण दिशामें उत्तरकी ओर मुखकर हवन करना चाहिये। शान्तिके लिये होता सावधानचित्त हो लोकपालों, मूर्तियों तथा मूर्तियोंके अधिदेवताके लिये क्रमसे

* मण्डप, कुण्ड, मेखला, योनि, वेदी आदिके निर्माणकी विस्तृत विधि कुण्डोद्योत, कुण्डमण्डपसिद्धि, गायत्रीपुरश्चरण-पद्धतिमें विस्तारसे निर्दिष्ट है।