मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २६६ * | १०१७ |
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दो सौ छाछठवाँ अध्याय
प्रतिमा-प्रतिष्ठाकी विधि
| सूत उवाच | |
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| कृत्वाधिवासं देवानां शुभं कुर्यात् समाहितः।<br>प्रासादस्यानुरूपेण मानं लिङ्गस्य वा पुनः॥ १ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार उपर्युक्त विधिसे देवताओंकी प्रतिमाका शुभ अधिवासन करना चाहिये। यजमानको एकाग्रचित्तसे प्रासादके अनुरूप लिङ्ग (प्रतिमा)-का या लिङ्गके अनुरूप प्रासादका मान रखना चाहिये। |
| पुष्पोदकेन प्रासादं प्रोक्ष्य मन्त्रयुतेन तु।<br>पातयेत् पक्षसूत्रं तु द्वारसूत्रं तथैव च॥ २ | लिङ्गस्थापनके पूर्व पुष्पमिश्रित जलसे मन्दिरको धोकर मन्त्रोच्चारण करते हुए पक्षसूत्र तथा द्वारसूत्रको¹ गिराकर नापना चाहिये। |
| आश्रयेत् किञ्चिदीशानीं मध्यं ज्ञात्वा दिशं बुधः।<br>ईशानीमाश्रितं देवं पूजयन्ति दिवौकसः॥ ३ | बुद्धिमान् पुरुषको देवमण्डपकी मध्यभूमिका निश्चय कर कुछ ईशानकोणकी ओर बढ़ना चाहिये; क्योंकि देवतागण ईशानकी दिशामें अवस्थित भगवान् शंकरकी पूजा करते हैं। |
| आयुरारोग्यफलदमथोत्तरसमाश्रितम् ।<br>शुभं स्यादशुभं प्रोक्तमन्यथा स्थापनं बुधैः॥ ४ | उत्तर दिशामें अधिष्ठित देवता आयु तथा आरोग्यरूपी फल देनेवाले और कल्याणकारी कहे गये हैं। बुद्धिमानोंने इनके अतिरिक्त अन्य दिशाओंमें स्थापनाको अशुभकारी बताया है। |
| अधः कूर्मशिला प्रोक्ता सदा ब्रह्मशिलाधिका।<br>उपर्युपस्थिता तस्या ब्रह्मभागाधिका शिला॥ ५ | लिङ्गके नीचे कूर्म-शिलाकी स्थापना करनी चाहिये। यह ब्रह्मशिलाकी अपेक्षा बड़ी तथा भारी होती है। उसके ऊपर ब्रह्मभागसे बड़ी ब्रह्मशिला स्थापित होती है। |
| ततस्तु पिण्डिका कार्या पूर्वोक्तैर्मानलक्षणैः।<br>ततः प्रक्षालितां कृत्वा पञ्चगव्येन पिण्डिकाम्॥ ६ | उसके ऊपर पूर्वोक्त परिमाणोंके अनुसार पिण्डिकाकी स्थापना करनी चाहिये। |
| कषायतोयेन पुनर्मन्त्रयुक्तेन सर्वतः।<br>देवतार्चाश्रयं मन्त्रं पिण्डिकासु नियोजयेत्॥ ७ | तत्पश्चात् पञ्चगव्यद्वारा पिण्डिकाको धोकर पुनः पञ्चकषायके² जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक प्रक्षालन करे। पिण्डिकाओंमें भी देव-प्रतिमा-सम्बन्धी मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये। |
| तत उत्थाप्य देवेशमुत्तिष्ठ ब्रह्मणेति च।<br>आनीय गर्भभवनं पीठान्ते स्थापयेत् पुनः॥ ८ | तदुपरान्त 'उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०' (वाजसने० ३४।५६) इस मन्त्रसे देव-प्रतिमाको उठाकर मण्डपके मध्यमें लाकर पुनः पीठिकापर स्थापित करे। |
| अर्घ्यपाद्यादिकं तत्र मधुपर्कं प्रयोजयेत्।<br>ततो मुहूर्तं विश्रम्य रत्नन्यासं समाचरेत्॥ ९ | वहाँ अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क आदि समर्पित करे। फिर एक मुहूर्ततक विश्रामकर वहाँ रत्नोंकी स्थापना करनी चाहिये। |
| वज्रमौक्तिकवैदूर्यशङ्खस्फटिकमेव च।<br>पुष्परागेन्द्रनीलं च नीलं पूर्वादिदिक्क्रमात्॥ १० | हीरा, मोती, विल्लौर, शङ्ख, स्फटिक, पुखराज, नीलम और महानील—इन रत्नोंको पूर्व दिशाके क्रमसे स्थापित करना चाहिये॥ १—१०॥ |
१. कारीगरका सूत्र। २. जामुन, सेमल, बकुल, बेर और वटबीजके फलोंका क्वाथ पञ्चकषाय कहलाता है।
(सुश्रुतसंहि० न०, मो० वि०)