मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| तालकं च शिलावज्रमञ्जनं श्याममेव च।<br>काञ्जी काशी समाक्षीकं गैरिकं चादितः क्रमात्॥ ११<br>गोधूमं च यवं तद्वत् तिलमुद्गं तथैव च।<br>नीवारमथ श्यामाकं सर्षपं व्रीहिमेव च॥ १२<br>न्यस्य क्रमेण पूर्वादि चन्दनं रक्तचन्दनम्।<br>अगुरुं चाञ्जनं चापि उशीरं च ततः परम्॥ १३<br>वैष्णवीं सहदेवीं च लक्ष्मणां च ततः परम्।<br>स्वर्लोकपालनाम्ना तु न्यसेदोंकारपूर्वकम्॥ १४<br>सर्वबीजानि धातूंश्च रत्नान्योषधयस्तथा।<br>काञ्चनं पद्मरागं तु पारदं पद्ममेव च॥ १५<br>कूर्मं धरां वृषं तत्र न्यसेत् पूर्वादितः क्रमात्।<br>ब्रह्मस्थाने तु दातव्याः संहताः स्युः परस्परम्॥ १६<br>कनकं विद्रुमं ताम्रं कांस्यं चैवारकूटकम्।<br>रजतं विमलं पुष्पं लोहं चैव क्रमेण तु॥ १७<br>काञ्चनं हरितालं च सर्वाभावेऽपि निक्षिपेत्।<br>दद्याद् बीजौषधिस्थाने सहदेवीं यवानपि॥ १८<br>न्यासमन्त्रानतो वक्ष्ये लोकपालात्मकानिह।<br>इन्द्रस्तु सहसा दीप्तः सर्वदेवाधिपो महान्॥ १९<br>वज्रहस्तो महासत्त्वस्तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>आग्नेयः पुरुषो रक्तः सर्वदेवमयः शिखी॥ २०<br>धूमकेतुरनाधृष्यस्तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>यमश्रोत्पलवर्णाभः किरीटी दण्डधृक् सदा॥ २१<br>धर्मसाक्षी विशुद्धात्मा तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>निर्ऋतिस्तु पुमान् कृष्णः सर्वरक्षोऽधिपो महान्॥ २२<br>खड्गहस्तो महासत्त्वस्तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>वरुणो धवलो जिष्णुः पुरुषो निम्नगाधिपः॥ २३<br>पाशहस्तो महाबाहुस्तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>वायुश्च सर्ववर्णों वै सर्वगन्धवहः शुभः॥ २४<br>पुरुषो ध्वजहस्तश्च तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>गौरो यश्च पुमान् सौम्यः सर्वौषधिसमन्वितः॥ २५<br>नक्षत्राधिपतिः सोमस्तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>ईशानपुरुषः शुक्लः सर्वविद्याधिपो महान्॥ २६ | फिर हरताल, शिलाजीत, अंजन, श्याम, कांजी, काशी, मधु और गेरू—इन सबको क्रमसे पूर्वादि दिशाओंमें रखना चाहिये। गेहूँ, जौ, तिल, मूँगा, तीनी, साँवाँ, सरसों और चावल—इन सबको भी पूर्वादि दिशाके क्रमसे रखकर श्वेत चन्दन, लाल चन्दन, अगुरु, अंजन, उशीर (खश), विष्णुक्रान्ता, सहदेई तथा लक्ष्मणा (श्वेत कटहली)—इन्हें भी पूर्वादि दिशाओंमें क्रमशः उन-उन लोकपालोंके नामसे ओंकारपूर्वक स्थापित करना चाहिये। फिर सभी प्रकारके बीज, धातुएँ, रत्न, ओषधियाँ, सुवर्ण, पद्मराग, पारद, पद्म, कूर्म, पृथ्वी तथा वृषभ—इन्हें भी पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे स्थापित करना चाहिये। ब्रह्माके स्थानपर सभी वस्तुओंको परस्पर एकत्र करके रखना चाहिये। सुवर्ण, मूँगा, ताँबा, काँसा, पीतल, चाँदी, निर्मल पुष्प और लौह—इन सबको भी क्रमसे रखना चाहिये। इन सभी वस्तुओंके अभावमें सुवर्ण और हरितालको भी रखा जा सकता है। बीज और ओषधिके स्थानपर सहदेवी और जौ रखा जा सकता है। अब मैं न्यास करनेके लिये प्रत्येक लोकपालके क्रमसे मन्त्रोंको बतला रहा हूँ। पूर्व दिशाके स्वामी महान् दीप्तिशाली, सभी देवताओंके अधिपति वज्रधारी महापराक्रमी इन्द्र हैं, उन्हें नित्य बारंबार नमस्कार है। अग्निकोणमें स्थित पुरुष अग्निदेव लाल वर्णवाले, सर्वदेवमय, धूमकेतु और दुर्जय हैं, उन्हें नित्य बारंबार प्रणाम है। दक्षिण दिशाके स्वामी यमराजका वर्ण कमलके समान है। वे सिरपर किरीट तथा हाथमें सदा दण्ड धारण करनेवाले, धर्मके साक्षी और विशुद्धात्मा हैं, उन्हें नित्य बारंबार अभिवादन है॥ ११—२१ १/२॥<br><br>नैर्ऋत्यकोणके स्वामी निर्ऋति (यातुधान) कृष्णवर्णवाले, महान् पुरुष, सम्पूर्ण राक्षसोंके अधिपति, खड्गधारी और महान् पराक्रमी हैं, उन्हें नित्य बारंबार नमस्कार है। पश्चिमके स्वामी वरुणदेव श्वेत वर्णवाले, विजेतारूप, नदियोंके स्वामी, पाशधारी और महाबाहु हैं, उन्हें नित्य बारंबार प्रणाम है। वायव्यकोणके स्वामी वायुदेवता सब प्रकारके वर्णवाले, सभी प्रकारके गन्धको धारण करनेवाले और ध्वजाधारी हैं, उन्हें नित्य बारंबार अभिवादन है। उत्तरके स्वामी सोमदेव गौरवर्णवाले, सौम्य आकृतिसे युक्त, सभी ओषधियोंसे समन्वित तथा नक्षत्रोंके अधिपति हैं, उन्हें नित्य बारंबार नमस्कार है। ईशानकोणके स्वामी ईशान (महा)-देव शुक्ल वर्णवाले, |