भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २६६ *१०१९
श्लोकअर्थ
शूलहस्तो विरूपाक्षस्तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>पद्मयोनिश्शतुर्मूर्तिर्वेदवासाः पितामहः॥ २७<br>यज्ञाध्यक्षश्चतुर्वक्त्रस्तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>योऽसावनन्तरूपेण ब्रह्माण्डं सचराचरम्॥ २८<br>पुष्पवद् धारयेन्मूर्ध्नि तस्मै नित्यं नमो नमः।<br>ओङ्कारपूर्वका होते न्यासे बलिनिवेदने॥ २९<br>मन्त्राः स्युः सर्वकार्याणां वृद्धिपुत्रफलप्रदाः।<br>न्यासं कृत्वा तु मन्त्राणां पायसेनानुलेपितम्॥ ३०<br>पटेनाच्छादयेच्छुभ्रं शुक्लेनोपरि यत्नतः।<br>तत उत्थाप्य देवेशमिष्टदेशे तु शोभने॥ ३१<br>ध्रुवा द्यौरिति मन्त्रेण श्वभ्रोपरि निवेशयेत्।<br>ततः स्थिरीकृतस्यास्य हस्तं दत्त्वा तु मस्तके॥ ३२<br>ध्यात्वा परमसद्भावाद् देवदेवं च निष्कलम्।<br>देवव्रतं तथा सोमं रुद्रसूक्तं तथैव च॥ ३३<br>आत्मानमीश्वरं कृत्वा नानाभरणभूषितम्।<br>यस्य देवस्य यद्रूपं तद्ध्याने संस्मरेत् तथा॥ ३४समस्त विद्याओंके अधिपति, महान् शूलधारी और विरूपाक्ष हैं, उन्हें नित्य बारंबार प्रणाम है। ऊर्ध्व (ऊपरकी) दिशाके स्वामी पद्मयोनि ब्रह्मा, वेदरूपी वस्त्रसे सुशोभित, यज्ञाध्यक्ष, चार मुखवाले पितामह हैं, उन्हें नित्य बारंबार अभिवादन है। ये जो अनन्तरूपसे निखिल चराचर ब्रह्माण्डको पुष्पकी भाँति अपने मस्तकपर धारण करते हैं, (नीचेकी दिशाके स्वामी) उन शेषको नित्य बारंबार नमस्कार है। इन मन्त्रोंको न्यास करते तथा बलि देते समय ॐकारपूर्वक उच्चारण करना चाहिये। ये सभी कार्योंमें समृद्धि तथा पुत्ररूपी फल देनेवाले हैं। इस प्रकार मन्त्रोंका न्यास कर घृतसे अनुलिप्त गर्तको श्वेत वस्त्रद्वारा यत्नपूर्वक ऊपरसे आच्छादित कर दे। तदनन्तर देवेशको उठाकर सुन्दर इष्ट देशमें ‘ध्रुवा द्यौः०'-(आथर्वण) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए गर्तपर स्थापित कर दे। फिर उसे स्थिर करके उसके मस्तकपर हाथ रखकर अपनेको नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित परब्रह्मका अंश मानकर परम सद्भावपूर्वक निष्कल देवदेवेश्वरका ध्यान करके सोमसूक्त तथा 'रुद्रसूक्त' का पाठ करे। ध्यानके समय जिस देवताका जैसा स्वरूप हो, वैसा ही उसका स्मरण करना चाहिये॥ २२-३४॥
अतसीपुष्पसंकाशं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>संस्थापयामि देवेशं देवो भूत्वा जनार्दनम्॥ ३५मैं देवरूप होकर अलसी-पुष्पके समान कान्तिवाले तथा शङ्ख, चक्र और गदाधारी देवेश जनार्दनको स्थापित कर रहा हूँ।
अक्षरं च दशबाहुं च चन्द्रार्धकृतशेखरम्।<br>गणेशं वृषसंस्थं च स्थापयामि त्रिलोचनम्॥ ३६इसी प्रकार मैं अविनाशी, दस बाहुओंसे सुशोभित, सिरपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, गणोंके स्वामी, वृषभारूढ़, त्रिनेत्रधारी शिवको स्थापित कर रहा हूँ।
ऋषिभिः संस्तुतं देवं चतुर्वक्त्रं जटाधरम्।<br>पितामहं महाबाहुं स्थापयाम्यम्बुजोद्भवम्॥ ३७मैं ऋषिगणोंद्वारा संस्तुत, चार मुखवाले, जटाधारी, महाबाहु, कमलोद्भव ब्रह्मदेवकी स्थापना कर रहा हूँ।
सहस्त्रकिरणं शान्तमप्सरोगणसंयुतम्।<br>पद्महस्तं महाबाहुं स्थापयामि दिवाकरम्॥ ३८मैं सहस्र किरणोंसे सुशोभित, शान्त, अप्सरा-समूहसे संयुक्त, पद्महस्त, महाबाहु सूर्यकी स्थापना कर रहा हूँ।
देवमन्त्रांस्तथा रौद्रान् रुद्रस्य स्थापने जपेत्।<br>विष्णोस्तु वैष्णवांस्तद्वद् ब्राह्मान् वै ब्रह्मणो बुधः॥ ३९बुद्धिमान् पुरुषको रुद्रकी स्थापनामें रौद्र मन्त्रोंका, विष्णुकी स्थापनामें वैष्णव मन्त्रोंका, ब्रह्माकी स्थापनामें ब्राह्म मन्त्रोंका
सौराः सूर्यस्य जप्तव्यास्तथान्येषु तदाश्रयाः।<br>वेदमन्त्रप्रतिष्ठा तु यस्मादानन्ददायिनी॥ ४०तथा सूर्यकी स्थापनामें सूर्यदेवताके मन्त्रोंका जप करना चाहिये। इसी प्रकार अन्य देवताओंकी स्थापनामें उन्हींके मन्त्रोंका जप करना चाहिये; क्योंकि वेदमन्त्रोच्चारणपूर्वक की गयी प्रतिष्ठा आनन्ददायिनी होती है।
स्थापयेद् यं तु देवेशं तं प्रधानं प्रकल्पयेत्।<br>तस्य पार्श्वस्थितानन्यान् संस्मरेत् परिवारितः॥ ४१जिन देवताकी प्रतिमा स्थापित की जाती है, उन्हींको प्रधान मानना चाहिये। उनके अगल-बगलमें स्थित अन्य देवताओंको उनके परिकररूपमें